शनिवार, 29 जनवरी 2011

पत्र पत्रिकाएँ-कथा-चक्र/ सम्पादक : अखिलेश शुक्ल

‘पाखी’
पत्रिका: पाखी, अंक: जनवरी 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: राजेन्द्र परदेसी, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेन्डेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएडा 201303 उ.प्र.
ख्यात साहित्यिक पत्रिका पाखी का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से युक्त है। अंक में  पत्रिकारिता की लक्ष्मण रेखा के तहत एक विचार श्रृंखला प्रकाशित की गई है, जिसमें ख्यात पत्रकारों, विद्वानों ने पेड-न्यूज व वर्तमान पत्रकारिता पर अपने विचार रखे हैं। राम बहादुर राय, पुण्य प्रसून वाजपेयी, एन.के. सिंह, अरविंद मोहन, अरूण त्रिपाठी, विमल कुमार, दिलीप मंडल, विनीत कुमार, कुलदीप नय्यर, श्रवण गर्ग, रामशरण जोशी, आलोक तोमर, संजीव श्रीवास्तव, अली अनवर, शैलेन्द्र एवं ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने पेड-पत्रकारिता पर गंभीर चर्चा व विचार प्रस्तुत किए हैं। प्रकाशित कहानियों में काम (राम स्वरूप अणखी), शाम का भूला (वासुदेव), योग क्षेम (सुषमा मुनीन्द्र) एवं दीमक (गोविंद उपाध्याय) अच्छी व समसामयिक कहानियां हैं। शीबा असलम फहमी न विख्यात कथाकार, उपन्यासकार एवं हंस के संपादक राजेन्द्र यादव से तत्कालीन साहित्य व लेखन पर गंभीर व सार्थक चर्चा की है। वाद-विवाद एवं संवाद के अंतर्गत वंदना राग एवं भरत प्रसाद के विचार सराहनीय हैं। अशोक कुमार पाण्डेय, संदीप अवस्थी, सुशीला पुरी एवं अखिलेश्वर पाण्डेय की कविताएं भूमंडलीकरण के बीच से आम आदमी के जीवन में सुख चैन की आशा जगाती है। तेजेन्द्र शर्मा की ग़ज़ल कुछ खास प्रभावित नहीं कर सकी है। जितने अच्छे वे कहानीकार हैं, उतना अच्छा प्रभाव ग़ज़ल में नहीं छोड़ सके हैं। राजीव रंजन गिरि, विनोद अनुपम एवं अरविंद श्रीवास्तव के लेख स्तरीय हैं व पत्रिका के विविधतापूर्ण स्वरूप को दर्शाते हैं। निर्मला सिंह की लघुकथा सहित पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।
मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का नया अंक
पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डा. वि. रामसंजीवैया, डा. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 60), ई मेल:brsmhpp@yahoo.co.in , फोन/मो. 08023404892, सम्पर्क: 58, वेस्ट आफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर (कर्नाटक)
इस साहित्यिक पत्रिका का स्वरूप हिंदी साहित्य की सभी विधाओं  के साथ समान रूप से न्याय करता है। अंक में एस.पी. केवल, रामचरण यादव, डा. महेश चंद्र शर्मा, प्रो. सुनीता विवेक, डा. एम. शेषन, हितेष कुमार शर्मा, विजय राघव रेड्डी, डा. परमानंद पांचाल, प्रो. बी. बै. ललिताम्बा, डा. टी. जी. प्रभाकर प्रेमी, श्रीमती प्रेमलता मिश्रा, नंदकिशोर शर्मा तथा चतुर्भुज सहाय के लेख प्रभावित करते हैं। देवेन्द्र कुमार मिश्रा की कहानी तथा स्तरीय है। सदाराम सिन्हा, डा. रामनिवास मानव, नरेन्द्र सिंह सिसोदिया, रमेश चंद्र शर्मा चंद्र, लालता प्रसाद मिश्र, रामचरण यादव, त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कविताएं अच्छी हैं। बी. गोविंद शेनाय तथा रामनिवास मानव की लघुकथाएं समयानुकूल हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी अपेक्षित स्तर के हैं।
साहित्य सागर
पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: जनवरी2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 250),फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161 बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, भोपाल म.प्र.
साहित्यिक पत्रिका साहित्य सागर का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार प्रियदर्शी खैरा पर एकाग्र हैं. पत्रिका में उनके व्यक्तित्व पर अखिलेश कुमार चतुर्वेदी, ओम मिश्रा, कांतिकुमार जैन, वैभव कोठारी व महेश श्रीवास्तव के विचार स्वागत योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाओं में नर्मदा प्रसाद मालवीय, गिरिमोहन गुरू, लालबहादुर  चैहान की कविताएं प्रभावित करती है। डा. शरद नारायण खरे, मालती शर्मा गोपिका, अर्चना प्रकाश, सतीश चतुर्वेदी की रचनाएं अच्छी व समयानुकूल हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि स्तरीय बन पड़े हैं।
समावर्तन
पत्रिका: समावर्तन, अंक: जनवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संस्थापक: प्रभात कुमार भट्टाचार्य, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय, कार्यकारी संपादक: श्रीराम दवे, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: अक्षय आमेरिया, मूल्य: 25रू. (वार्षिक 250), ई मेल: samavartan@yahoo.com फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य जगत की स्थापित इस पत्रिका का समीक्षित अंक आंशिक रूप से ख्यात सौन्दर्य कवि शमशेर बहादुर पर एकाग्र है। उनकी कविताओं व अन्य रचनाओं के साथ-साथ पत्रिका के संपादक रमेश दवे, अखिलेश शुक्ल, प्रेम शशांक, रंजना अरगड़े, कृष्ण दत्त पालीवाल, ख्यात आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय, कृष्णगोपाल मिश्र, वरिष्ठ आलोचक प्रो.रमेश चंद्र शाह के आलेख शमशेर बहादुर की कविताओं के साथ-साथ उनके समग्र जीवन पर भलीभांति प्रकाश डालते हैं। पत्रिका के संपादक निरंजन श्रोत्रिय द्वारा बुद्धिलाल पाल की कविताओं का चयन व प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली है। राजी सेठ, नरेन्द्र दीपक, नरेन्द्र गौड़ एवं महेन्द्र गगन की कविताएं समय असमय में न उलझकर सीधे तौर पर अपनी बात पाठकों के सामने रखती हैं। राजेन्द्र परदेसी की कहानी गृहस्थी एक आम मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार की कहानी है। सतीश राठी एवं प्रद्युम्न भल्ला की लघुकथाओं में लघुकथात्मकता की कमी खटकी। एन्तोन चेखव की कथा का रूपांन्तरण ब्रजेश कृष्ण द्वारा पर्याप्त सावधानी से किया गया है। रंगशीर्ष के अंतर्गत सचिदा नागदेव पर उपयोगी व ज्ञानवर्धक सामग्री का प्रकाशन पत्रिका द्वारा किया गया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्थायी स्तंभ व समीक्षाएं भी रूचिकर हैं।
आसपास
पत्रिका: आसपास, अंक: जनवरी2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 32, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com , वेबसाईट:http://www.dharohar.com/ , फोन/मो. 9425007710, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहेता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र.
संवाद पत्रिका आसपास के इस अंक में नवीनतम समाचार प्रकाशित किए गए हैं। अंक में उल्लेखनीय कार्य के लिए पत्रिकाओं को पुरस्कार प्रदान करने का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। समाचार में समावर्तन सहित अन्य पत्रिकाओं के पुरस्कार समाचार सचित्र प्रकाशित किए गए हैं। ख्यात कथाकार उदयप्रकाश  को मिले  साहित्य अकादमी पुरस्कार का विस्तृत समाचार अच्छा व जानकारीपरक है। इसके अतिरिक्त साहित्य अकादमी सिखाएगी हिंदी, गालिब ने पूछा था कि क्या बर्फी हिन्दू है? स्पंदन का सम्मान समारोह, दिव्य समारोह की जानकारी नये विषयों के उपयोगी संदर्भो से साक्षात्कार कराती है। कथाकार संतोष चैबे व कवि आलोक श्रीवास्तव को मिले पुरस्कारों का समाचार जानकर लगता है कि यह पत्रिका का पुरस्कार पर एकाग्र विशेषांक है। ख्यात कवि व आई.ए.एस. अधिकारी पंकज राग को मीरा स्मृति सम्मान का समाचार पत्रिका की अन्य अच्छी व उपयोगी सूचना है। अन्य समाचार भी रचनाकारों को आपस में संवाद स्थापित करने का अच्छा माध्यम बने हैं।
सरस्वती सुमन
पत्रिका: सरस्वती सुमन, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कुंवर विक्रमादित्य सिंह, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100), ई मेल: saraswatisuman@rediffmail.com ,  फोन/मो. 0135.2740060, सम्पर्क: 1, छिब्बर मार्ग, आर्य नगर, देहरादून 248001
उत्कृष्ट साहित्य के लिए समर्पित सरस्वती सुमन का समीक्षित अंक अच्छी रचनाओं से युक्त है। अंक में चंद्रकुंवर बत्र्वाल की 36 कविताएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई हैं। विज्ञान व्रत, बी.पी. दुबे, कुंदन सिंह सजल, शम्मी शम्स वारसी, मेहमूद हमसर अब्बासी, अर्जुन प्रसाद सिंह, सरला भटनागर, नरेश निसार, एम.वसीम अकरम, डा. नलिन तथा शरीफ कुरेशी की ग़ज़लें प्रभावित करती हैं। सत्यनारायण सत्य, अब्बास खान, कंवर विक्रमादित्य सिंह, कमल कपूर, मुकुल सक्सेना, बलजीत सिंह, मनोज अबोध, की कविताएं प्रभावित करती हैं। प्रभुलाल चैध्री, शैलजा अरोड़ा, आकांक्षा यादव, पुष्पपाल सिंह, कृष्ण कुमार यादव, लेख उल्लेखनीय हैं। संजय जनागल, प्रेमचंद्र गोस्वामी, शबनम शर्मा, श्रीमती शुक्ला चैधरी, सत्यनारायण भटनागर की कहानियां आज के समाज व परिवेश पर विचार करती दिखाई पड़ती हैं। रामसहाय वर्मा व आनंद दीवान के व्यंग्य नयापन लिए हुए हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी प्रभावित करती हैं।
अभिनव बालमन
पत्रिका: अभिनव बालमन, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: निश्चल, पृष्ठ: 64, रेखा चित्र/छायांकन/कला सज्जा: दिलीप, पल्लव, मूल्य: 15रू. (वार्षिक 60),फोन/मो. 9719007153, सम्पर्क: शारदायत, 17/238, जेड 13/59, अलीगढ़ 202001 उ.प्र.
बच्चों के लिए निरंतर उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित कर रही पत्रिका के समीक्षित अंक में उपयोगी व ज्ञानवर्धक सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में कुलदीप, विभूति भारद्वाज, अदिति शर्मा तथा अन्य बाल रचनाकारों की अच्छी रचनाएं प्रकाशित की गई हैं। वरिष्ठ रचनाकारों में अभिमेष शर्मा, डा. शंभूनाथ तिवारी, ब्रजनंदन वर्मा, डा. कुलभूषण लाल की रचनाएं बालोपयोगी है। मुकुल व मानव उपाध्याय की कहानियां सच्चे अर्थो में बाल कहानियां कहलाने योग्य हैं। भगवत प्रसाद पाण्डेय की कहानी बच्चों के साथ साथ अधिक उम्र के लोगों के लिए भी उपयोगी है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व पत्र आदि भी बच्चों के समग्र विकास में सहायक हैं।
‘समकालीन अभिव्यक्ति’
पत्रिका: समकालीन अभिव्यक्ति, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ: 64, रेखा चित्र/छायांकन/कला सज्जा: सुनीता वर्मा, मूल्य: 15रू. (वार्षिक 50),फोन/मो. 011.26645001, सम्पर्क: फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली 30
विविध विधाओं के लिए समर्पित पत्रिका समकालीन अभिव्यक्ति का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से स्मृद्ध है। अंक में अशोक प्रजापति, अकबर लाहोरी, चंद्रभान राही, मनीष कुमार सिंह की समकालीन कहानियां प्रकाशित की गई हैं। पत्रिका के लेख साहित्य, समाज तथा कला के लिए समर्पित हैं। विश्वमोहन तिवारी, अनिता एच. भट्ट, नवलकिशोर भट्ट तथा डा. सुरंगमा यादव के लेख विविध विषयों की विवेचना अच्छी तरह से कर सके हैं। राजीव कुमार त्रिगति एवं ऋषिवंश की कविताएं पत्रिका के काव्य स्वरूप को स्पष्ट करती हैं। अनिल डबराल, बुद्धि प्रकाश कोटनाला, कृष्णा श्रीवास्तव की विविध विधाओं की रचनाएं व्यापकता लिए हुए हैं। अनिल शर्मा तथा के.एल.दिवान की लघुकथाओं सहित अन्य रचनाएं भी स्तरीय व विचारणीय है।
शुभ तारिका का मध्यप्रदेश अंक
पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: दिसम्बर 10, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 105, रेखा चित्र/छायांकन: संतोष जडिया , मूल्य: 25रू. (वार्षिक 120),फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी 133001 हरियाणा
ख्यात मासिक पत्रिका शुभ तारिका का समीक्षित अंक मध्यप्रदेश पर एकाग्र है। अंक में मध्यप्रदेश की विरासत के साथ-साथ यहां के रचनाकारों की श्रेष्ठतम रचनाओं का पत्रिका के इस अंक में प्रकाशन किया गया है। बढ़ते कदम मध्यप्रदेश के अंतर्गत महेश श्रीवास्तव, स्वाति तिवारी, सुनीता दुबे, प्रलय श्रीवास्तव व सुरेश गुप्ता के आलेख मध्यप्रदेश की विरासत तथा कला-संस्कृति पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। संजय पतारे, ऋषि कुमार मिश्र, भालचंद्र जोशी, अजातशत्रु, युगेश शर्मा, सच्चिदानंद जोशी, दिलीप चिंचालकर, रामचरण यादव, रुखसाना सिद्दीकी, शैलेन्द्र कुमार शर्मा एवं कृष्णशंकर सोनाने के लेख मध्यप्रदेश की जमीन तथा उसकी सोंधी खुशबू से देश भर के पाठकों का परिचय कराते हैं। निर्मला मांडवीकर, अर्जुन सिंह अंतिम, एवं पदमा राजेन्द्र की रचनाएं सरसता लिए हुए हैं। कांतिलाल ठाकरे, मालती जोशी, डाॅ. रमेशचंद्र की रचनाओं से पाठक लगाव महसूस करता है। शिवदत्त डोगरे, प्रमीला गुप्ता व जगदीश चंद्र जैन की लोक चरित्र की रचनाएं नए पाठकों को हमारे अतीत से परिचित कराती हैं। चंद्रभान राही, मालती बसंत, सीमा शाह जी की कहानियां व अंजना सबि, अखिलेश शुक्ल, अमर गोपालानी, मंगला रामचंद्रन, संतोष सुपेकर, रामशंकर चंचल की लघुकथाएं प्रभावशाली हैं। राम तेलंग, गिरिजा कुलश्रेष्ठ, ऋषिवंश, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, गार्गीशंकर मिश्र, आनंद बिल्थरे, आलोक नेगी तथा महेश श्रीवास्तव की कविताएं मध्यप्रदेश की रचनाशीलता के विविध रूप को सामने लाने के लिए किया गया एक सफल प्रयास है। मध्यप्रदेश के हरदा नगर में उर्मि कृष्ण जी का जन्म हुआ है। उस स्थान का वर्णन बहुत ही मार्मिक व आत्मसात करने योग्य है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि भी स्तरीय व सहेज कर रखने योग्य हैं।
कादम्बिनी क्लब हैदराबाद का ‘पुष्पक’
पत्रिका: पुष्पक, अंक: 16, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डा. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ: 118, रेखा चित्र/छायांकन: , मूल्य: 75रू. (वार्षिक 300), ई मेल:mishraahilya@yahoo.in ,फोन/मो. 040.23703708, सम्पर्क: 93सी, राजसदन, बेंगलराव नगर, हैदराबाद 500038 सी-7, आंध्रप्रदेश
दक्षिण से प्रकाशित प्रमुख साहित्यिक पत्रिका पुष्पक के समीक्षित अंक में विविध साहित्यिक सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित कहानियों में स्नेह स्पर्श (शांति अग्रवाल), बुरे दिन (श्याम कुमार पोकरा), सोच (मधु भटनागर), रिमोट कन्ट्रोल (पवित्रा अग्रवाल) प्रमुख हैं। लघुकथाओं में स्थापना (अखिलेश शुक्ल), काला आखर (आकांक्षा यादव) तथा कुलदीपक (सत्यपाल), लातों के भूत (पंकज शर्मा), प्रेम विवाह (विनोदिनी गोयनका) प्रभावित करती है। डा. अहिल्या मिश्र, ज्ञानेन्द्र साज, रमा द्विवेदी, सुधाकर आशावादी, भानुदत्त त्रिपाठी, ठाकुर खिलवाणी, ज्योति नारायण, रामशंकर चंचल, उमाश्री, सरिता सुराना जैन, पंकज शर्मा, डा. नकवी, कृपाशंकर शर्मा अचूक, मीना गुप्ता, सुरेश चंद्र, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, राजेन्द्र बहादुर सिंह राजन, करण सिंह उढ़वाल, हीरा प्रसाद हरेन्द्र, कुंदन सिंह सजल, ओम रायजादा, कृष्ण कुमार, अशोक अंजुम, साहिल, भगवान दास जैन, सुषमा भण्डारी, मदन मोहन उपेन्द्र, प्रेमलता नीलम, साक्षी भारती, मीना मुथा, सुरेश उजाला की कविताएं, ग़ज़लें, गीत आदि भी उल्लेखनीय हैं। केशव शुक्ला का व्यंग्य अच्छा बन पड़ा है। लेखों में डा. अहिल्या मिश्र, राजकुमारी भटनागर, संपत देवी मुरारका, सीता मिश्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी स्तरीय व पढ़ने योग्य हैं।
‘सनद’
पत्रिका: सनद, अंक: 09, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मंजु मल्लिक मनु, संस्थापक: फजल इमाम मल्लिक पृष्ठ: 128, रेखा चित्र/छायांकन: N.A. , मूल्य: 50रू.यह अंक(वार्षिक 100), ई मेल: manumallick@rediffmail.com ,sanadpatrika@gmail.com , वेबसाईट: http://www.sanad.in/ , फोन/मो. 9868018472, सम्पर्क: 4-बी, फ्रेन्डस अपार्टमेंट, मधु बिहार गुरूद्वारा के पास, पटपड़ गंज, दिल्ली 110092
ख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘सनद’ का समीक्षित अंक प्रभाष जोशी स्मृति अंक के रूप में प्रकाशित किया गया है। स्व. प्रभाष जी के समग्र व्यक्तिव पर पत्रिका ने संग्रह योग्य सामग्री प्रकाशित की हैं। प्रभाष जी ख्यात पत्रकार, संपादक, खेल विशेषज्ञ व साहित्यकार थे। उनके विभिन्न क्रियाकलापों पर पत्रिका में प्रकाशित लेख भलीभांति प्रकाश डालते हैं। जनसत्ता तक उनके अनवरत सफर को लेखों में अच्छे विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया गया है। हरिकृष्ण पाठक, जवाहर लाल कौल, अच्युतानंद मिश्र, रूपेश पाण्डेय, शुभु पटवा, राम बहादुर राय, अनिल बंसल, अंबरीश कुमार, फजल इमाम मल्लिक, जितेन्द्र ठाकुर, संजय सिंह, मेघा पाटकर, नंदिता मिश्रा, डा. सुनीलम, संजय स्वतंत्र, सुरेश कौशिक, संदीप जोशी, मन चतुर्वेदी, जाहिद खान, आशीष गौतम, बनवारीलाल शर्मा, गोविंदाचार्य, विजयन एमजे के लेख संग्रह योग्य व शोध छात्रों के लिए उपयोगी हैं। राजकुमार कुम्भज व प्रेमिला सिंह की कविताएं प्रभाष जी के व्यक्तिव पर पूरी शिद्दत के साथ प्रकाश डालती हैं। पत्रिका के संपादक ने सटीक बात कही है। उनके अनुसार, ‘प्रभाष जोशी का जाना हमारे बीच से एक गांधीवादी चिंतक का जाना है।’ स्व. प्रभाष जोशी जी भारत ही नहीं विश्व पत्रकारिता जगत में वर्षो याद रखे जाएंगे।
‘विश्व हिंदी समाचार’
पत्रिका: विश्व हिंदी समाचार, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र , पृष्ठ: 12, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: उपलब्ध नहीं , ई मेल: whsmauritus@intnet.mu , sgwhs@innet.mu , फोन/मो. 230.6761196 प्रसिद्ध समाचार पत्रिका विश्व हिंदी समाचार के समीक्षित अंक जानकारीपरक व ज्ञानवर्धक समाचारों को स्थान दिया गया है। अंक के मुखपृष्ठ पर मॉरिशस में हिंदी दिवस के आयोजन का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। हिंदी दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में श्री मधुसूदन गणपति ने अपने उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, ‘हिंदी भारत में तथा भारत के बाहर भारतवंशियों को एकता और स्नेह के सूत्र में बांधती है।’ मॉरिशस के कला एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि कुछ ही समय में हिंदी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन जाएगी। इस अवसर पर मॉरिशस के शिक्षा एवं मानवसंसाधन मंत्री माननीय श्री वसंत कुमार बनवारी ने स्पष्ट किया, ‘हिंदी बहुत तेजी से वैश्विक भाषा का रूप ले रही है।’ इंदिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र की निदेशक श्रीमती अनीता अरोड़ा ने अतिथियों की सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया। एक अन्य समाचार के अनुसार, लंदन में हिंदी पुस्तकों का लोकापर्ण कार्याक्रम आयोजित किया गया। यह लोकापर्ण कैलाश बुधवार एवं डॉ. अरूणा अजीतसरिया द्वारा किया गया। भारत नार्वे लेखक सेमिनार का समाचार अच्छा व रूचिकर है। इससे नार्वे में हिंदी के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यो की झलक मिलती है। लंदन में आयोजित सम्मान समारोह में बिहार (भारत) के रंगकर्मी व नाटककार हषिकेश सुलभ को वर्ष 2010 का अंतर्राष्ट्रीय इंदु वर्मा कथा सम्मान से सम्मानित किया गया है। इस कार्यक्रम में महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति व वरिष्ठ साहित्यकार श्री विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया की विश्वविद्यालय विदेशों की हिंदी से संबंधित संस्थाओं के मध्य समन्वय का कार्य करेगा। लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान 2010 तथा ख्यात कथाकार चित्रा मुदगल को मिले दो प्रमुख पुरस्कारों को समाचार पत्रिका ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। अंक में राजस्थान प्रगतिशील लेखक मंच तथा जवाहर कला केन्द्र की पहल पर जयपुर में आयोजित कार्यक्रम का समाचार विस्तृत रूप से प्रकाशित किया गया है।
पत्रिका ने इसे कार्यक्रम की रपट के रूप में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रकाशित किया है। 31जुलाई व 1 अगस्त 10 को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में ख्यात कवि नंद भारद्वाज, जितेन्द्र भाटिया, आदिल रजा मंसूरी, सीमा विजय, दिनेश चारण ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस अवसर पर अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक व कवि श्री नंद भारद्वाज ने कहा, ‘आज पढ़ी गई कहानियों से राजस्थान की समकालीन रचनाशीलता का पता चलता है।’ नई दिल्ली स्थित भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के आडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार श्री मानिक वछावत द्वारा रचित इस शहर के लोग को दिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री रत्नाकर पाण्डेय ने की। प्रो. शिवकुमार मिश्र ने एक कार्याक्रम के दौरान स्पष्ट किया है कि मनुष्यता के लिए साहित्य से जुड़ा रहना होगा।
यह समाचार विचारणीय जानकारी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त मॉरिशस में अनुवाद पर कार्यशाला, अब अ से अनार पढ़ेंगे अमरीकी तथा पोर्टबलेयर में प्रेमचंद जयंती के समचार पत्रिका ने आकर्षक ढंग से विस्तार के साथ प्रकाशित किए हैं। पत्रिका के संपादक राजेन्द्र प्रसाद मिश्र का संपादकीय हिंदी दिवस की धूम के मध्य पाठकों से कुछ अपेक्षा करता है। उनके अनुसार, ‘हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की 7वीं आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी के प्रचार प्रसार से जुड़ी विश्वव्यापी संस्थाएं अपने अभियान को और तेज करे। जिससे संयुक्त राष्ट्र संघ के ज्यादा से ज्यादा सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त करना सहज हो सकेगा।’
‘हिमप्रस्थ’ बाल साहित्य विशेषांक
पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 96, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चौकी, शिमला .4
पत्रिका का स्वरूप व सामग्री देखकर यह कहीं से नहीं लगता है कि यह पत्रिका किसी प्रदेश के प्रकाशन विभाग की होगी। पत्रिका की सामग्री व स्तर प्रभावित करता है। समीक्षित अंक बाल साहित्य पर एकाग्र किया गया है। अंक में बालोपयोगी रचनाएं व विश्लेषणात्मक आलेख प्रकाशित किए गए हैं। समय के साथ बदलता बाल साहित्य (प्रकाश मनु), बाल साहित्य की प्रासंगिकता (जया चौहान), शिशुगीत एवं बाल कविताएं (डॉ. परशुराम शुक्ल), साहित सभी आलेख अच्छे व जानकारीपरक हैं। प्रो. आदित्य प्रचंडिया, ओमप्रकाश गुप्ता, सुशील कुमार फुल्ल, डॉ. दिनेश चमोला, डॉ. अदिति गुलेरी, डॉ. आशु फुल्ल, प्यार सिंह ठाकुर तथा योगराज शर्मा के लेख बाल साहित्य व उसकी वर्तमान उपयोगिता, उपलब्धता पर प्रकाश डालते हैं। रमेश चंद्र पंत, राजेन्द्र परदेसी, साधुराम दर्शक, प्रमिला गुप्ता, डॉ. रामसिंह यादव, डॉ. श्याम मनोहर व्यास, श्याम सिंह घुना, केशव चंद्र, रणीराम गढवाली, द्विजेन्द्र द्विज, नरेन्द्र भारती एवं बालशौरि रेड्डी की बाल कहानियों में बच्चों के लिए अच्छी व मनोरंजक शैली में लेखन कार्य किया गया है। कविताओं में शबाब ललित, रामनिवास मानव, जगदीश चंद्र, ओम प्रकाश सारस्वत, महेन्द्र सिंह शेखावत, पीयूष गुलेरी, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, प्रतापसिंह सोठी, प्रत्यूष गुलेरी, नरेश कुमार उदास, मीना गुप्ता, अरूण कुमार शर्मा, तेजराम शर्मा, हिमेन्द्र बाली, हेमलता गुप्ता, राजकुमार कुम्भज, राजीव कुमार एवं डॉ. रीना नाथ शरण की बाल कविताएं बच्चों के साथ साथ प्रबुद्ध वर्ग को भी अच्छी लगेगी। साथ ही बानो सरताज की एकांकी, प्रेम पखरोल व श्रीनिवास श्रीकांत का चिंतन, प्रदीप कंवर का यात्रा वर्णन अच्छे व रूचिकर हैं।
डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव से पत्रिका के संपादक रणजीत सिंह राणा की बातचीत बाल साहित्य व उसकी प्रासंगिकता पर गंभीरता से विचार करती है। अशोक गौतम व दादुराम शर्मा के व्यंग्य बच्चों को अवश्य ही पसंद आएंगे। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी इसकी लोकप्रियता के संबंध में काफी कुछ कहते हैं।
बाल पत्रिका ‘सुमन सागर’
पत्रिका: सुमन सागर, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: श्याम बिहारी आलोक, संजवी बिहारी आलोक, पृष्ठ: 22, मूल्य: 10रू. (वार्षिक 80), ई मेल:skalok_25dec@rediffmail.com ,फोन/मो. 0983505365, सम्पर्क: विनीता भवन, सवेरा सिनेमा चौक, काजी चक्र , बाढ़ बिहार 803.213
बाल पत्रिका सुमन सागर के समीक्षित अंक में बच्चों के लिए शिक्षाप्रद तथा ज्ञानवर्धक रचनाओं का प्रकाश किया गया है। अंक में राकेश कुमार सिन्हा, पुष्पेश कुमार पुष्प, उमेश कुमार साहू, कंचन सिंह, स्वरूप सिंह, पारस दासोत, सुषमा भण्डारी, तारासिंह, ख्याल नारायण, गाफिल, कृष्णा, ब्रजेश, जमुआर, ईश्वर, नयन कुमार राठी, सहित सभी लेखकों की रचनाएं नयापन लिए हुए हैं।
‘समावर्तन’
पत्रिका: समावर्तन, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ: 114, रेखा चित्र/छायांकन: अक्षय आमेरिया , मूल्य: 25रू.(वार्षिक 300), ई मेल: samavartan@yahoo.com , फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी129, दशहरा मैदान, उज्जैन (म.प्र.)
साहित्य एवं कला पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रभावशाली रचनाओं का समावेश किया गया है। यह जानकार सुखद लगा कि अंक ख्यात लेखक, संपादक व समालोचक विजय बहादुर सिंह पर एकाग्र है। उनके समग्र पर इतनी अच्छी व विविधतापूर्ण सामग्री बहुत दिनों बाद पढ़ने में आयी है। पत्रिका के संपादक रमेश दवे के उन के व्यक्तित्व पर विचार सारगर्भित है। ख्यात कवि अशोक वाजपेयी, कथाकार उदयप्रकाश, कहानीकार जयशंकर  व दिनेश कुशवाहा के विचार एकदम सटीक व संतुलित हैं। पहली बार किसी पत्रिका ने किसी व्यक्तित्व पर बिना किसी पूर्वाग्रह के संतुलित सामग्री का प्रकाशन किया है। उनसे बातचीत व अन्य रचनाएं भी संग्रह योग्य है। लोकप्रिय आलोचक धनंजय वर्मा का लेख, हरि मृदुल की कविताएं समाज का अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करती है। राजकुमार कुम्भज, आशा पाण्डेय, ओम नागर, की कविताएं तथा सिम्मी हर्षिता की कहानी पत्रिका के स्तर में वृद्धि करती है। रंगशीर्ष के अंतर्गत गुन्देचा बंधु के कृतित्व पर नए सिरे से विचार किया गया है। चांदमल गुन्देचा, रमाकांत गुन्देचा के लेख व साक्षात्कार उपयोगी हैं। पत्रिका के अन्य सभी स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं व रचनाएं स्तरीय हैं।
पत्रिका: प्रोत्साहन, अंक: 76 वर्ष2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक:कमला जीवितराम सेतपाल, पृष्ठ: 32, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 60), ई मेल:arts@hotmail.com ,फोन/मो. 022.26365138, सम्पर्क: ई-3/307, इन्लैक्स नगर, यारी रोड़, वर्सोवा अंधेरी पश्चिम मुम्बई 400061
स्व. श्री जीवितराम सेतपाल  द्वारा स्थापित व वर्षो से संपादित पत्रिका प्रोत्साहन का समीक्षित अंक अब पुनः उसी रूप व साज-सज्जा के साथ प्रकाशित हो रहा है, जैसा वह पूर्व में था। अंक में सुदर्शन शर्मा का व्यंग्य, लक्ष्मी यादव की कहानी एवं रामदलाल, नरेन्द्र धड़कन, जसप्रीत कौर जस्सी, हीरालाल जायसवाल एवं रामचरण यादव की कविताएं उल्लेखनीय हैं। डॉ. पूरन सिंह, अशोक मनवानी, सुधा भार्गव की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। शिवशंकर चतुर्वेदी, मिर्जा हसन नासिर एवं बेताब अलीपुरी के गीत अच्छे बन पड़े हैं। स्व.श्री जीवितराम सेतपाल की रचना नेता पुराण आज के संदर्भ पर सटीक बैठती है।                                वाणी प्रकाशन समाचार
पत्रिका: वाणी प्रकाशन समाचार, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अरूण माहेश्वरी, पृष्ठ: 30, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 60), ई मेल:vaniprakashan@gmail.com ,वेबसाईट:http://www.vaniprakashan.in/, फोन/मो. 011.23273167, सम्पर्क: 21ए, दरियागंज, नयी दिल्ली 110002
वाणी प्रकाशन की नवीनतम जानकारी प्रदान करने वाला यह समाचार बुलेटिन साहित्य जगत को नए प्रकाशनों के संबंध में उपयोगी जानकारी प्रदान करता है। समीक्षित अंक में चांद आसमान डाट काम (विमल कुमार), तीसरी ताली (प्रदीप सौरभ), ज़ख्म हमारे(मोहनदास नैमिशराय) उसी शहर में उसका घर(धु्रव शुक्ल), पह-दोपहर (असगर वजाहत), वह जो घाटी ने कहा (पुन्नी सिंह) एवं मुमताज महल (सुरेश कुमार वर्मा) जैसे उत्कृष्ट प्रकाशनों की जानकारी बहुत ही सुन्दर  दर ढंग से प्रकाशित की गई है। अज्ञेय साहित्य की विस्तृत जानकारी एवं आलोचना पुस्तक ‘उत्तर छायावाद काल, दिनकर और उर्वशी’(सं. गोपेश्वर सिंह) इन पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। भील इतिहास के रोमांचकारी एवं मार्मिक उपन्यास ‘मगरी मानगढ़’(राजेन्द्र मोहन भटनागर) की समीक्षा इस उपन्यास को शीघ्र प्राप्त कर पढ़ने की इच्छा जाग्रत करती है। राजस्थान के मेवाड़ इलाके में मोहन गिरि आदिवासियों के मसीहा रहे हैं। उनके साथ (लेखक के अनुसार) लगभग 1500 निहत्थे भील आदिवासियों पर अंग्रेजों ने गोलियां बरसाई थीं। उनमें से 379 आदिवासी मारे गए थे। कर्नल शटन के इस गोलीकांड़ की लोमहर्षक कहानी पाठक की आंखें नम कर देगीं। राघेय राघव के उपन्यास प्रतिदान व कल्पना की जानकारी अच्छी व प्रभावशाली है। अन्य पुस्तकों की जानकारी पाठकों का ज्ञानार्जन करती है।

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रंजन जैदी की ३ कविताएँ


वो अमरीकी लड़की

वो नाज़ुक सी अमेरिकी लड़कीज़ुनैन्न कैम्प के दरवाज़े पर खड़ी            
इस्राएली बुलडोजरों कों रोकना चाहती है            
कैम्प में फिलिस्तीनी शरणार्थी हैं       
सभी हैरत में हैं     
बुश प्रशासन में ये कैसा चमत्कार?  
इसाई धर्म में आस्था रखनेवाले          
टॉम हार्न की डायेरी के पन्ने फडफडाते हैं       
जालिम हुक्मरानों पर युध्ध -अपराध का मुक़दमा चले  
बुश-ब्लेअर अपराधी हैं         
ब्रिटेन और अमेरिका हमारा है             
अपराधियों का नहीं              
रेतीली हवा तेज़ है               
इस्राएली बुलडोज़र अमरीकी लड़की की परवाह न कर    
उसे रौंदते हुए       
फिलिस्तीनियों की ओर बढ़ जाते हैं   
संस्कृतियों का लहू               
फिर रेत से लिपट जाता है
गर्म हवा में हिटलर के अट्टहास गूँज उठते है
गैस-चेंबर की लाशें चलने लगती है  
हवा की सरसराहट में कोई पुकार रहा है           
ओह ओदल्फ़ ऐश्मन            
तुम कहाँ हो?                        
      
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त्तुम नहीं जानते       
ताम हार्न दाल कौन था ?  / वो न फिलिस्तीनी था न अरब   
वो न कौम का लीडर था न मीडिया रिपोर्टर    
वो फूलती साँसों के बीच भाग रहा था    
रफा के फिलिस्तीनी कैम्प के एक बच्चे को गोद में लिए हुए         
लाऊडस्पीकर पर चीखता हुआ       
आग मत बरसाओ   
यहूदियो ! आग मत बरसाओ       
प्लीज़ , डोंट शूट       
लेकिन वो लहू -लुहान होकर गिर पड़ा
उसने आसमान पर देखा    
धूप की चादर ने उसे ढ़क लिया था        
वो उठा , बच्चे को गोद में लिए कैम्प पहुँचा    
वो फिर गिरा और माँ को आवाज़ दी      
मैम ! मैंने दूध का हक अदा कर दिया 
अंग्रेजों को शर्मिंदा नहीं किया        
मैं जानता हूँ            
एक दिन कोई अँगरेज़ आएगा      
फिलिस्तीनियों को बतायेगा की धूप की उम्र नहीं होती है ।

फिलिस्तीन का कबूतर

वो कबूतर था             
मेरे ख्वाब में रोज़ आता था  
मेरे कन्धों पे, मेरे सर पे        
वो चढ़ जाता था         
बारहा चोंच से वो गाल को छू लेता था         
मैं समझता था के पैगाम-ऐ-मोहब्बत लेकर  
वो किसी देस से उड़कर मेरे पास आता है   
मेरे अहसास को गर्माता है
रफ्ता-रफ्ता वो मेरी रूहका हिस्सा बनकर    
मेरी हर साँस में खुशबू की तरह घुलता गया
और मैं रेत के सहरा में बिखरता गया                     
एक दिन वो मेरे आँगन में गिरा खू बनकर  
दौड़कर मैंने उसे बढ़ के हथेली पे लिया         
उसने हसरत से मुझे देख के बस इतना कहा          
माँ मेरी आग के सहरा में बहुत रोती है       
रोज़ वो खून से बिस्तर की हिना धोती है    
उससे कहना के तेरा बेटा एक दिन   
एक दिन आएगा अमन का परचम लेकर     
वादिये-रेग पे फिर आग न लगने देगा                       
और परिंदों को न जलने देगा          
उसके पैगाम को अब हमने कलमबंद किया            
उसके खू-आलूदह बदन को भी सहेज लिया            
है ये उम्मीद के एकदिन वो नज़र आएगा     
शाख-ऐ-जैतून मेरे हाथ पे रख जायेगा।--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

Moharram is not festival to celebrate


Moharram is an annual reminder to mankind to learn the art of defeating mightiest misrule, by humble self sacrifice.
Moharram is not festival to celebrate but an annual reminder to learn the art of defeating mightiest misrule by humble sacrifices. Late Dr. Radha Kishan our former president, and great thinker & philosopher said “ Arms are needed to fight against oppression and injustice, if we are prepared to offer sacrifice like Imam Husain.
Since the start of the history of mankind there had always been confrontation between Dharma(Truth) and Adharma(Falsehood). It may be Ramayana or Mahabharata in which Lord Rama and Pandava attained victory ultimately when Lord Rama  killed Ravana and Pandava killed Kaurava.
However, Imam Husain(A.S) the beloved grandson of  Prophet  Mohammad (P.B.U.H) redefined the concept of victory. Imam Husain fought a battle against Yazeed at Karbala and apparently he was martyred along with his 71 companions. But he won the battle against injustice and oppression. His battle was not to attain any kingdom but was a demonstration against injustice and oppression. And he was successful in setting an example of how to and how much to sacrifice while fighting against injustice. Till the end of mankind any nation who wants to rise against injustice will derive courage from the exemplary martyrdom of Imam Husain.
The list of martyrs of Karbala ranges from a 62 year old Habib ibne Mazahir (companion of Imam Husain) to a toddler, Ali Asghar, the six month old son of Imam Husain. They were surrounded by 30,000 strong army of Yazeed, the tyrant ruler of Arab. The water and food supply routes were cut off and they were subjected to extreme hunger and thirst for three days. Yazeed was confident that Imam Husain will succumb under pressure when his companions will leave him alone due to intensity of thirst and hunger. On the contrary the number of martyrs kept on increasing till the last day. In the night 9th Moharram, Imam Husain gathered all his companions and put off the lights in his camps. He advised his companions to leave him alone since Yazeed was only after his head. He told them that they can use the darkness to hide their faces while leaving if they are feeling ashamed. Yet not a single companion left him but vowed to sacrifice their lives on him. His companions has full faith in him (Imam Husain). Therefore, stuck to him. For Imam Husain cause was supreme, whereas for his companions Husain was the cause
After the martyrdom of Imam Husain and his companions, the camps of Imam Husain were set ablaze and the women and children of his household were arrested. The heads of entire 72 martyrs were raised over spears. They were made to march from Karbala in Iraq to Damascus in Syria. They were presented before Yazeed in his court who had misled his courtiers that he had crushed uprising against a rebel. Zainab, sister of Imam Husain was a courageous daredevil lady inspite of being tortured and oppressed throughout the journey from Karbala to Damascus, rebuked Yazid for his dastardly act in front of his courtiers. Imam Zainul Abideen, the only remaining son of Imam Husain who was sick and in chains introduced his father as the grandson of Prophet Mohammed. Learning this fact the entire court became furious with the action of Yazid. To handle the situation Yazeed shifted the responsibility of Karbala massacre over others, who were directly involved. This was the first victory of Imam Husain over Yazid.
 To give a brief background of this tragedy, Yazeed took over the throne on 22nd Rajab, 60 Hijri, after the death of his father Muaviya and immediately sent his messenger to Medina, ordering Waleed, the Governor of Medina to take allegiance (unconditional approval) from Imam Husain. He was an alcoholic tyrant ruler who wanted to undo the reformations brought by Prophet Mohammed. Imam Husain declined allegiance and left Medina in order to wake up the nation which was silent in the face of injustices of Yazid. He was forced to land at Karbala, Iraq on 2nd Moharram along with his small band of companions and family. From 7th Moharrum, the food and water supply was cutoff and
on 10th Moharrum, Imam Husain was martyred along with his companions and relatives.
 Lord Krishna said I take birth on the earth whenever Adharma reaches to its climax. Holy Quran says God has sent His messengers to every nation. Holy books were revealed in different periods in different parts of World for the reformation of mankind. Ved and Purans maybe are among Holy books sent to mankind. It cannot be denied that Almighty must have sent messengers to India as well.
The message of Imam Husain is for the whole mankind. He has shown us way to fight for our honor and freedom. Graceful death is better than disgraced life. He is torch bearer for freedom movement till this world exists. His message reverberates in this world: “Say No to Humiliation”. Father of the Nation Mahatma Gandhi said, “ Mai Bharat ki azadi ke liye apne deshwasio ke liye koi nai cheez leke nahi aya. Mai ne Karbala ke 72 Janbazo se  jo seekha hai use pesh kar diya”. (I did not come with any thing new for the fight for the freedom for our Nation, but took lesson from 72 martyrs of Karbala.--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

आओ शहद करलें / रंजन जैदी

 कहानी 

कैफेटेरिया के एक कोने में वह मेरे सामने बैठी थी. हम दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छाई हुई थी. दोनों एक-दूसरे प़र अपनी निगाहें टिकाये हुए थे. जब बेयरे ने आकर पूछा कि, "कुछ और साब...?", तो मैं चौंक कर उसकी ओर उन्मुख हो गया. मैंने कहा, "हाँ, दो हॉट काफ़ी और कुछ स्नैक्स भी ...!" मैं जानता था कि दिव्या को काफ़ी पीने का बहुत शौक है,और वह पुनः काफ़ी पीने में संकोच से काम नहीं लेगी. भले ही दो साल गुज़र गए हों, आदतों में भी कुछ बदलाव अगया हो, प़र मुझे विश्वास  था कि काफ़ी के शौक को दिव्या ने इन दो सालों में भी नहीं छोड़ा होगा. मेरा अंदाज़ा सही निकला . उसने स्वतः ही गर्दन झुका ली थी. दरअसल, हम दोनों ही कैफेटेरिया में कुछ देर और बैठना चाहते थे. बहुत कुछ कहना और सुनना चाहते थे. मैंने महसूस किया कि दिव्या के भीतर कहीं कोई उथल-पुथल मची हुई है और उसका हाल उस मल्लाह की तरह है जो तूफ़ान में अपनी किश्ती को भंवर से निकालने की कोशिश कर रहा हो. वह गिलास के कगारों को पकड़े पेपरवेट की तरह गिलास को मेज़ प़र लगातार घुमा रही थी. मैं उसके भीतर की उथल-पुथल को जानना चाहता था. मैंने पूछा, "क्या बात है, कुछ बताओगी नहीं?" सुनकर उसने गर्दन ऊपर उठाकर मुझे टटोलती नज़रों से देखा. कहा, "रग्घू! मैं तुम्हारे पास लौटना चाहती हूँ. लेकिन मेरी प्रेजेट पोजीशन ऐसी है कि शायद तुम.....?" उसने फिर गर्दन झुका ली थी. मैंने पूछा, "क्यों, तुम्हें लगता है कि अब तुम जोब्लेस हो तो मैं...." "नहीं-नहीं रग्घू! यह बात नहीं है." "तो फिर क्या बात है?" "बात यह है कि...कि मैंप्रिगनेंट हूँ....!" उसने निगाह झुका कर कहा कि वह तीन महीनों से गर्भवती है. मुझे ऐसा लगा जैसे समुद्र की एक मोटी सी लहर पूरी ताक़त के साथ मेरे जिस्म से आ टकराई हो और मेरा समूचा वजूद इस टक्कर से थरथरा उठा हो. मैं सामने आईने में पसीने से भीगते अपने  चेहरे  को स्पष्ट रूप से देख रहा था. दिव्या की आंखे मेरे चेहरे प़र टिकी हुई थीं. बेयरा काफ़ी ले आया था. बेयरे के जाते ही दिव्या ने कहा,"सुनकर अच्छा नहीं लगा न? कोई बात नहीं. मैं अभी पेईंग-गेस्ट हूँ. सड़क प़र नहीं आई हूँ. तुम अपने पहले जैसे रूटीन लाईफ को डिस्टर्ब मत होने दो. मैं मैनेज कर लूंगी. वो तो बस...यूँही जो दिल में था, तुमसे कह दिया. वह भी इसलिए कि आज बरसों बाद मुझसे बात करने के लिये तुमने वक्त निकाला है. डोंट वरी, मैं मैनेज कर लूंगी." उसके पूर्ववत अहम् की अनुभूति कर मुझे ऐसा लगा, मानो मेरे गले में छिले हुए बहुत से फफोले  उभर  आये हों. मैं उसे भिंची-भिंची नज़रों से अपलक देखने लगा था. उसने मोबाईल आन कर उसकी घड़ी में समय देखा. फिर, कोई नंबर डायल करने लगी. इसी बीच मेरे मोबायल प़र मेरी निजी सचिव का फोन अगया था. मैंने कहा कि मैं इस समय दिव्या के साथ हूँ. बाद में बात करूंगा लेकिन दिव्या, बात करते-करते लाबी की तरफ निकल गयी थी. टिशु-पेपर से मुंह साफ़ कर मैंने काफ़ी का सिप लिया और लाबी की तरफ देखने लगा जहाँ ग्लास के उसपार दिव्या किसी से मोबाईल प़र हंस-हंस कर बातें कर रही थी. अजीब लड़की है यह दिव्या भी. शायद मैं इसे कभी नहीं समझ पाऊँगा. हर बार यह मुझे सरपरायिज़ देती आई है.  पहली बार जब हम मिले थे तो उसने अचानक मुझसे पूछा था,"विल यू मैरी विद मी?"  और शादी के बाद, "मैं प्रिकाशंस  में बिलीव करती हूँ, मुझे जल्दी प्रिगनेंसी नहीं चाहिए." अब इतने सालों बाद मिली है तो इस खबर के साथ कि वह प्रिगनेंट है. पता नहीं, इसके पेट में किसका वंश पनप रहा है लेकिन कह रही है कि वह अब फिर मेरे पास लौट आना चाहती है. जब लौटना ही था तो गयी ही क्यों थी? मैंने तो नहीं कहा था कि वह घर छोड़ दे. शादी के बाद औरत मकान को घर बनाती है, दिव्या ने क्या किया? कानों में माँ की आवाज़ गूंजी,"बेटा, दुल्हिन को भी समय दिया कर.वह अकेले बहुत घबराती है. कहीं घुमाने लेजा इसे. इसकी भी दिलजोई कर. इसकी आँखों में बहुत सूनापन देख रही हूँ मैं. मेरी बात समझ रहा है न?" मैं ने काफ़ी का कप ठीक वैसे ही ख़ाली कर दिया  जैसे मैं थकहारकर रात को दिव्या को एक घूँट में सिपकर पी जाया करता था. लेकिन मैं नींद में  महसूस करता कि उसकी उंगलियाँ मेरे जिस्म की नाज़ुक जगहों प़र रेंग रही हैं, उसका हिलोरें लेता बदन मेरे बदन से भीगी-भीगी सांसों के साथ शरारते कर रहा है. मैंने यह सब महसूसते हुए भी उसकी सरगोशियों को सुनने की कभी कोशिश नहीं की. वह अक्सर जगती थी, मैं हर रात सोता था. मैं ऐसा क्यों करता था, यह बात मुझे मालूम थी, लेकिन दिव्या नहीं जानती थी. एक दिन उसने साफ शब्दों में कह दिया, "मैं जा रही हूँ. मैं इस तरह तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. हाँ! मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती...." और वह सचमुच एक दिन मेरे घर से चली गयी. मैंने भी उसे नहीं तलाशा. पूरे दो साल गुज़र गए. आज फिर दिव्या के अचानक फोन ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया था, "तुम्हें याद है रग्घू, कल मेरी मैरिजनिवर्सरी है. मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ. मैं नौकरी भी छोड़ रही हूँ, एक सर्परयिज़  देना है". और इस फोन के बाद आज दिव्या मेरे सामने थी, एक नए सर्परायिज़ के साथ. वह लाबी से अपनी जगह प़र लौट आई थी. बता रही थी,"तुम्हारी माता जी का फोन था. मैंने उन्हें समाचार दे दिया है. वह बहुत खुश हैं. मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो....मैं अपना इरादा बदल सकती हूँ. ...चला जाए?" रात, जब मैं घर के बिस्तर प़र पहुंचा तो कानों में दिव्या के शब्द गूंजने लगे,"मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती.... मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो......" --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 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मीडिया को बदनाम मत करो.../नीना गर्ग

मीडिया को लेकर भ्रम की स्थिति बन चुकी है. मीडिया आज चंद लोगों की वजह से शर्मिंदगी झेल रहा है. जिन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, उनके बारे में भी स्पष्ट रूप से कुछ भी कहना मुश्किल है. सीधे-सीधे किसी को दलाल कह देना बहुत बड़ी गाली सी है. जो सत्ता के गलियारे में रह रहे हैं, वे जानते हैं कि पार्टियों में दलाली कौन करते रहे हैं, कुछ जिंदा हैं, कुछ मर गए. कुछ राजनीति में दिवालिये हो गए, कुछ दिवालिये होने के कगार पर है. आरोप-प्रत्यारोपों के सिलसिले कभी ख़त्म नहीं होंगे. भारतीय मीडिया का योगदान कम नहीं है. उसने समाज और देश के हर क्षेत्र में जागरूकता लाने की महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. RTI की भूमिका मीडिया ने ही बनायीं थी. आज पंचायत हो या मंरेगा जैसी योजनाओं का ग्राफ मीडिया ने ही तैयार किया था. उदाहरण बहुत से हैं. उदाहरण ज्वलंत भी हैं. मीडिया को शर्मिंदा मत करें. क्योंकि यह एक ऐसी लगाम है जिससे देश का विकास और प्रगति का आधार  जुड़ा हुआ है. यदि मीडिया कमज़ोर पड़ गया तो देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाएगी. हालाँकि मीडिया में ऐसे जुझारू और प्रतिभाशाली पत्रकार अभी भी पूरे दम-ख़म के साथ सक्रिय हैं और हर स्थिति पर निगाह रख रहे हुए हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य में भी ऐसे पत्रकार आते रहेंगे जो देश की अस्मिता से खिलवाड़ नहीं करेंगे. जो कुछ हुआ है, उसकी अभी जाँच चल रही है. जो होता है, उसके पीछे एक पूरी मशीनरी काम करती है. इसमें औद्योगिक घराने मिले होते हैं और राजनेता भी, जो संसद में औद्योगिक घरानों की सुरक्षा के विकल्प प्रस्तुत करते रहते हैं. दलाली यहाँ से शुरू होती है. ऐसे पोलिटिकल-दलालों के हाथ बहुत फैले होते हैं और उनके पास अकूत धन होता है जिनपर पुलिस और प्रशासन का शिकंजा नहीं कस पाता है. कारण यह है कि पुलिस और प्रशासन पर इतने राजनीतिक दबाव होते हैं कि वे चाह कर भी दलालों को बेनकाब नहीं कर पाते हैं. बाबा रामदेव विदेशी बैंकों में जमा धन लाने कि गुहार तो करते हैं, उन राजनीतिक दलालों के घरों में जो अकूत धन जमा है, उसे बाहर निकलवाने का आन्दोलन क्यों नहीं चलाते? यह अपने आप में एक बहुत बड़ी विडंबना है. खुद उनकी कथित साधू-संतों की बिरादरी के आश्रमों के नाम पर कितनी संपत्ति और कितना काला धन  है, कभी उन्होंने सोचा,  उनके विरुद्ध आवाज़ उठाई है? ज़रा सोचिये तो!--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)       

Air Force Blocks Sites That Posted Secret Cables/By EricSchmitt

Published: December 14, 2010

WASHINGTON — The Air Force is barring its personnel from using work computers to view the Web sites of The New York Times and more than 25 other news organizations and blogs that have posted secret cables obtained by WikiLeaks, Air Force officials said Tuesday.
State’s Secrets
Articles in this series examine American diplomatic cables as a window on relations with the rest of the world in an age of war and terrorism.
When Air Force personnel on the service’s computer network try to view the Web sites of The Times, the British newspaper The Guardian, the German magazine Der Spiegel, the Spanish newspaper El País and the French newspaper Le Monde, as well as other sites that posted full confidential cables, the screen says “Access Denied: Internet usage is logged and monitored,” according to an Air Force official whose access was blocked and who shared the screen warning with The Times. Violators are warned that they face punishment if they try to view classified material from unauthorized Web sites.
Some Air Force officials acknowledged that the steps taken might be in vain since many military personnel could gain access to the documents from home computers, despite admonishments from superiors not to read the cables without proper clearances.
Cyber network specialists within the Air Force Space Command last week followed longstanding procedures to keep classified information off unclassified computer systems. “News media Web sites will be blocked if they post classified documents from the WikiLeaks Web site,” said Lt. Col. Brenda Campbell, a spokeswoman for the Air Force Space Command, a unit of which oversees Air Force cyber systems. “This is similar to how we’d block any other Web site that posted classified information.”
Colonel Campbell said that only sites posting full classified documents, not just excerpts, would be blocked. “When classified documents appear on a Web site, a judgment will be made whether it will be blocked,” she said. “It’s an issue we’re working through right now.”
Spokesmen for the Army, Navy and Marines said they were not blocking the Web sites of news organizations, largely because guidance has already been issued by the Obama administration and the Defense Department directing hundreds of thousands of federal employees and contractors not to read the secret cables and other classified documents published by WikiLeaks unless the workers have the required security clearance or authorization.
“Classified information, whether or not already posted on public websites or disclosed to the media, remains classified, and must be treated as such by federal employees and contractors, until it is declassified by an appropriate U.S. Government authority,” said a notice sent on Dec. 3 by the Office of Management and Budget, which is part of the White House, to agency and department heads.
A Defense Department spokesman, Col. David Lapan, in an e-mail on Tuesday night sought to distance the department from the Air Force’s action to block access to the media Web sites: “This is not DoD-directed or DoD-wide.”
The Air Force’s action was first reported on The Wall Street Journal’s Web site late Tuesday and underscores the wide-ranging impact of the recent release of secret State Department documents by WikiLeaks, and five news organizations, including The Times. It also illustrates the contortions the military and other government agencies appear to be going through to limit the spread of classified information that has become widely available in the public domain.
“It is unfortunate that the U.S. Air Force has chosen not to allow its personnel access to information that virtually everyone else in the world can access,” said a spokeswoman for The Times, Danielle Rhoades Ha. A senior administration official said Tuesday that the administration’s policy contained some leeway, for instance, to allow certain employees to download information in order for them to be able to verify that classified information was leaking into the public domain, and to assess damage to national security and potential danger to sources.
Steven Aftergood of the Federation of American Scientists, a secrecy specialist, said dozens of agencies, as well as branches of the military and government contractors, had issued their own policy instructions based on the Office of Management and Budget memo.
“It’s a self-defeating policy that will leave government employees less informed than they ought to be,” Mr. Aftergood said.
William J. Broad contributed reporting from New York.--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

शब्‍दों का सफ़र : शिमला में हिम की खोज/अजित वडनेरकर

ब्दों के बदलते प्रतिरूप आश्चर्यजनक तरीके से चौंकाते हैं। स्थाननामों की रचना में अक्सर वहाँ की भौगोलिक खूबियाँ महत्वपूर्ण होती हैं। पूर्वांचल के एक प्रांत का नाम मेघालय इसलिए है क्योंकि यहाँ अक्सर बादलों का डेरा रहता है। मेघ अर्थात बादल और आलय अर्थात घर। आलय यानी आश्रय। संस्कृत के लय का अर्थ है आराम करने की जगह जाहिर है दुनियाभर के आरामगाहों में घर को सबसे ऊँचा दर्ज़ा मिला हुआ है। इसी तर्ज़ पर हिमालय को देखें। हिम + आलय = हिमालय अर्थात वह स्थान जहाँ बर्फ़ का बसेरा हो। जहाँ हिम को आश्रय मिले वह है हिमालय। ठेठ पूर्वोत्तर का ही एक और प्रान्त है अरुणाचल प्रदेश। पूर्व दिशा सूर्योदय का प्रतीक है। अरुण का अर्थ होता है प्रातः की लालिमा, लाल रंग। अरुण सूर्य के सारथी का नाम भी है क्योंकि सूर्योदय से पहले उसकी लाल रश्मियों को थामने वाले अरुण के दर्शन होते हैं। यही नहीं, आप्टेकोश में सूर्य का एक पर्याय अरुण भी बताया गया है। संस्कृत में अचल का अर्थ होता है पर्वत। चल् धातु में गति का भाव है। निषेध या नकार की अर्थवत्त वाले अ उपसर्ग के लगने से अचल का अर्थ हुआ जो चलता न हो अर्थात जो स्थिर हो। इस तरह अचल में पर्वत या पहाड़ का भाव स्थिर होता है और अरुण + अचल = अरुणाचल का मतलब हुआ सूर्यपर्वत, सूर्योदय का प्रान्त अथवा वह स्थान जहाँ सबसे पहले सूर्य उगता है।
इसी कड़ी में आता है हिमाचल प्रदेश। अरुणाचल की तरह ही हिमाचल का अन्वय हुआ हिम + अचल = हिमाचल यानी वह प्रदेश जहाँ हमेशा बर्फ़ जमी रहती हो। यह आश्चर्य की बात है कि इस हिमप्रान्त की राजधानी शिमला के नाम के साथ बर्फ़ जैसा कोई शब्द चस्पा नहीं है। शिमला की व्युत्पत्ति श्यामला ( देवी ) से जोड़ी जाती है। श्यामला देवी दुर्गा का एक नाम-रूप है। भारत के ज्यादातर पर्वतीय शहरों की तरह ही शिमला का विकास भी अंग्रेजी राज में हुआ, मगर उनके आने से पहले भी यहाँ बस्ती हुआ करती थी जिसका नाम शिमला था। अठारहवीं सदी के दूसरे दशक में सतलुज घाटी के विस्तृत सर्वेक्षण कार्य के दौरान स्कॉटिश सर्वे दल ने पहाड़ियों से घिरे शिमला ग्राम को खोजा था। आमतौर पर शिमला का नाम श्यामलादेवी से जोड़ा जाता है जिनका प्राचीन मंदिर यहाँ है। 1822 में स्कॉटिश सिविल अफ़सर चार्ल्स केनेडी ने यहाँ अंग्रेज अधिकारियों के लिए पहली आरामगाह बनवाई थी।
संस्कृत के श्याम शब्द का अर्थ काला, धूसर, गहरा भूरा या नीला होता है। श्याम यानी बादल भी और श्याम यानी शिव भी। श्याम से ही बना है श्यामा अर्थात काली रात, काली नदी, काली गाय, तुलसी का पौधा, मादा कोयल आदि। हिन्दी का साँवला शब्द भी इसी कड़ी का है और श्यामल > शामल > साँवल > के क्रम में साँवला हुआ। इसका स्त्री रूप साँवली होता है। श्यामल का स्त्री रूप श्यामला बनेगा। दुर्गा पर्वतवासिनी हैं और इसीलिए इन्हें पहाड़ाँवाली कहा जाता है। पर्वतीय स्थानों पर दुर्गा के विभिन्न नामोंवाले धाम मिलते हैं जैसे कालका जो हरियाणा में है। कालका शिमला रेलमार्ग प्रसिद्ध है। कालका भी देवी दुर्गा का ही रूप है जो श्यामवर्णी है। इसी तरह कई जगह चण्डीदेवी के मंदिर होते हैं। चण्डिका रौद्ररूपधारिणी दुर्गा हैं जिनका वर्ण श्यामल है। इसी तरह दुर्गा का सबसे प्रसिद्ध रूप काली का है। इन्हें कालिका भी कहते हैं जिसका अपभ्रंश ही कालका है। स्पष्ट है कि श्यामला में काले वर्णवाली कालिका का भाव ही है। भाषा वैज्ञानिक व्युत्पत्ति के हिसाब से डॉ रामविलास शर्मा शिमला के शिम में हिम देखते हैं। उनका कहना है कि पूर्ववैदिक भाषाओं में हिम का रूप घिम था। स्लाव और केल्त भाषाओं के ध्वनिरूपों से तुलना करते हुए वे यह स्थापना देते हैं। लात्वियाई भाषा में हिम का एक रूप जीअँम है, लिथुआनी में यह झीअँम है। इसी तरह जब ज का अघोषीकरण हुआ तो पुरानी प्रशियाई में यह सॅमॉ हो जाता है। हिम का पूर्व रूप घिम है इसकी जानकारी इसके ग्रीक रूप खॅइम से होती है। सॅमॉ जैसे रूप से ही शिमला के शिम का विकास समझ में आता है। इसी तरह बर्फ़ के लिए कश्मीरी में शीन है जो हिमा का रूपान्तर ही है।--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)         

शिक्षा की उड़ान का उत्साह../.नीना गर्ग

      लड़कियों की पढाई को लेकर आज की तरह पहले हमारा समाज न तो इतना गंभीर था और न ही वह शिक्षा की अहमियत को महत्त्व दिया करता था.
      आज़ादी के बाद हम ६ दशक पार कर अनुभवों के उस महासागर को पार कर आये है जिसमें लड़कियों को उनके जीवन में कितने ही विषैले सर्पों, मगरमच्छों, शार्कों और ज्वालामुखियों से जूझते हुए हमारे समाज ने देखा और उन्हें बचाया है.         आज परिस्थितियाँ बदली हैं. आज कानून ने भी उन्हें अनेक ऐसे अधिकार दिए हैं की वे खुले आसमान के नीचे बेख़ौफ़ होकर उड़ान भर सकती हैं. पहले लड़कियों को पराया धन मानते हुए यह समझा जाता था कि इन्हें पढ़कर क्या करना है. अंततः इन्हें अपने पति के घर जाकर चूल्हा-चौका ही तो संभालना है.     
     ससुराल में पहुँचते ही सास-ससुर की इच्छा जागृत हो जाती थी कि साल होते ही बहू के पांव भारी हो जाएँ. घर में कृष्ण कन्हईया आ जाएँ. यही उपलब्धि लड़कियों की खुशहाली का मीजान माना जाता था. जिन लड़कियों की संतान नहीं होती थी या देर से होती थी तो ऐसी लड़कियों का भविष्य खतरे में पड़ जाता था. यदि लड़की को मायके भेज दिया जाता तो मायके में भी उसका जीवन नर्क सा हो जाता था. शिक्षित न होने के कारण वह कहीं नौकरी भी नहीं कर पाती थी. जिन लड़कियों को सिलाई-बुनाई, कढाई का हुनर आता था, वे किसी न किसी रूप में एडजस्ट हो जाती थीं. ऐसी स्थिति मध्य और निम्न-मध्य-वर्ग में अधिक होती थी. उच्च-वर्ग में दो तरह की मानसिकता थी, एक-शिक्षा का स्टेटस से सम्बन्ध, दो-शादी तक की पढाई. बाकी मानसिकता वही कि लड़कियों को कौन सी नौकरी करनी है.  
      फिर स्थितियां बदलीं. कुछ सामाजिक कुरीतियों ने भी स्थितियों को और जटिल बना कर सामने ला रखा. बदलते हुए सामाजिक मूल्य, टूटते हुए संयुक्त परिवार और एकल परिवारों का जन्म. यही नहीं बल्कि बढती हुई आर्थिक ज़रूरतों ने दहेज़ जैसी कुरीति को आर्थिक मजबूती का आधार बना दिया.    
      दहेज़ पहले भी चुनौती की ही तरह रहा था, किन्तु औद्योगिक क्रांति के बाद एकल परिवारों की बढ़त ने दहेज़ को नयी ज़रूररत के रूप में देखा और लड़कों की खरीद-फरोख्त के कारण उन लड़कियों के सामने मुश्किलें पैदा कर दीं जो दहेज़ नहीं दे सकती थीं. ऐसी स्थिति में देश भर में सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाएं महिला जागरूकता शिविरों के माध्यम से यह बात प्रचारित करने में कहीं तक कामियाब हुई कि लड़कियों को स्कूल भेजना ज़रूरी है.      
             थोड़ी सी पढाई और व्यावसायिक हुनर ने चमत्कारिक परिणाम दिए. लडकियां जो स्कूल गयीं और पढ़कर अच्छे ओहदों तक जा पहुँचीं तो समाज मे मानो शैक्षिक क्रांति सी आ गयी. यह मुट्ठी  भर बाजरे जैसा था. फिर भी प्रगति का वह पहिया था जो अभी तक जाम पड़ा था, अब चल पड़ा था. अब समस्या ड्रॉप-आउट की थी.  
नीना गर्ग, प्रबंध-संम्पादक:SVM  
       लडकिया स्कूल जाने लगीं तो स्कूल में सीमायें खड़ी हो गयीं. आगे कैसे पढाई की जाए? गाँव-कस्बों में स्कूल आठवीं के बाद विराम लगा देते हैं. दूर जाने के लिये लड़कियों को अनेक खतरों का सामना करना पड़ता था, ऐसे में स्वयंसेवी संस्थाओं ने आगे बढ़कर रास्ते निकाले. शैक्षिक संस्थाओं ने अपनी क्षात्राओं के लिये होस्टलों का निर्माण कराया और जो प्रोफेशनल कोर्सेज़ करने वाली क्षत्राएँ थीं, उनके लिये गर्ल्स-होस्टल्स का भी प्रबंध किया गया. इसमें kendr aur राज्य-सरकारों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. शिक्षा के प्रति बढ़ते इस रुझान से अभिभावकों की रुचियाँ भी बढ़ने लगीं. वे अपनी बेटियों को उनके पैरों प़र खड़ा करने में मदद देने लगे. सरकार ने उनके विकास से सम्बंधित   योजनाओं में आरक्षण का बंदोबस्त किया और आर्थिक सुविधाएँ भी देनी शुरू कीं. लड़कियों की बढती रूचि और शिक्षा में उनके रिज़ल्ट्स के ऊंचे चढ़ते ग्राफ से एक बात साफ़ हुई कि यदि उन्हें सहयोग दिया जाए तो वे हर क्षेत्र में आगे आ सकती हैं. यह वो दिशा थी कि आज लडकियां लगभग हर क्षेत्र में आगे बढ़ चुकी हैं. इसके बावजूद आज भी गाँव-कस्बों या दूर-दराज़ के इलाकों से अभिभावक अपनी बेटियों को शहर तक भेजने में संकोच से काम लेते हैं. इसका कारण है मार्ग-दर्शन का अभाव. उनकी चिंताएं गलत भी नहीं हैं. लड़की को वह अनजान शह्र में अकेला छोड़ भी नहीं सकते हैं. जबकि वे चाहते हैं कि उनकी बेटी भी दूसरों की तरह पढ़े. नगरों या महा-नगरों में (जहा शैक्षिक केंद्र हैं) वहां आज लडकियां पेयिन्गेस्ट के रूप में रह सकती हैं. पयिन्गेस्ट के रूप में लड़कियां जहां रहेगी, वहां उसे रहने और खाने का किराया देना होगा. चूंकि ऐसे गेस्ट हाउसेस की संचालिकाएं वृद्ध महिलाएं ही होती हैं, अतः  बेझिझक लड़की  को वहां दूसरी लड़कियों के साथ रखा जा सकता है. ऐसे हाउसेस में अनुशासन की कमी नहीं होती है जो दूसरे प्राईवेट गर्ल्स-होस्टल्स में भी पाया जाता है. सुरक्षा के एतबार से भी लडकियां यहाँ सुरक्षित रह सकती हैं. लेकिन ऐसे होटल्स या गेस्ट हाउस वहीं हों जहा से यातायात की सुविधा हो, कोचिंग सेंटर्स करीब और  सुरक्षित हों तथा विवाद से परे वीराने में न हों.बेटियों को चाहिए कि वे अपने उद्देश्यों प़र खरी साबित हों. उन्हें याद रखना चाहिए कि माँ-बाप जिस मेहनत और लगन के साथ उसके लिये अपनी ज़रूरतों को काट कर उसके भविष्य को बनाने का स्वप्न देख रहे हैं, वह अगर पूरा नहीं हुआ तो उन्हें मानसिक अघात पहुंचेगा. उन्हें अपने लक्ष्य से नहीं हटना चाहिए. इसी में उनका अपना भविष्य छुपा हुआ है. यदि वह पढ़ कर योग्य हो जायेंगीं तो वह न केवल एक अच्छे जीवन की शुरुआतकर सकती हैं बल्कि अपने माता-पिता के स्वप्न को साकार भी कर सकती हैं. माता-पिता को इस बात प़र भी नज़र रखनी होगी कि उनकी बेटी शहरी चकाचौंध की भूलभुलय्या में तो नहीं फँस गयी है. उसके दोस्तों का सर्किल कैसा है? जहाँ वह रहती है, उसका अपने साथियों के साथ व्यवहार कैसा है, वह पढाई को लेकर कितनी सेरिअस है? उसकी कोचिंग सही चल रही हैं या नहीं? क्या वह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित है? अपनी सेहत को लेकर वह कितनी गंभीर है? उसकी सुबह-शाम कैसी गुज़रती हैं? यह ऐसी ज़रूरत भरी मालूमात की टिक्नामेंटरी है जो बेटी के फ्यूचर के मैथ का अध्यन कराती है. अभिभावकों को इस मैथ प़र गंभीरता से विचार करना चाहिए.                              
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)



मंगलवार, 25 जनवरी 2011

उषा उत्थुप को पद्मश्री

इस बार गणतंत्र-दिवस के अवसर पर पद्मश्री सम्मान से सम्मानित होने वालों में अत्यंत लोकप्रिय पॉप सिंगर श्रीमती उषा उत्थुप का नाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. उनके द्वारा १४ भारतीय भाषाओँ में गाया गया गीत अनन्या (अब हमको आगे बढ़ना है, अपना इतिहास बदलना है...) अब तक देश-विदेश में काफ़ी लोकप्रिय हो चुका है. हिंदी के मूल गीत को श्रेया घोषाल ने फिल्म संगीतकार आदेश श्रीवास्तव के संगीत में गाया है. अन्य अंग्रेजी तथा भारतीय भाषाओँ में ऊषा उत्थुप के संगीत में उनके अतिरिक्त शुभा मालगुडी, चिन्मय, कार्तिक, क्रिष्णमूर्थी, बीसेंट, तथा पंजाबी में ऋचा शर्मा ने गाया है. भारत सरकार में महिला एवं बाल-विकास मंत्रालय के इस थीम-सॉंग को लिखा है  जाने-माने कथाकार, पत्रकार, शायर तथा समाज कल्याण के संपादक डॉ.रंजन जैदी ने. nfpma परिवार की ओर से श्रीमती ऊषा उत्थुप को अनेकानेक शुभकमनाएं.  -------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं.समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. ---प्रबंध संपादक

रविवार, 23 जनवरी 2011

देवबंद में मौलाना वुस्तान्वी 'मोदी-परस्ती' के शिकार/ज़फर नकवी

आजकल देवबंद के न्यू वाइस-चांसलर (मोहतमिम) काफी सुर्ख़ियों मैं हैं. गुजरात के हैं लेकिन मुंबई मैं रहते हैं.  रेलिजिअस      तालीम के साथ-साथ मैनेजमेंट में डिग्री होल्डर भी हैं. उनके इस बयान पर काफी हंगामा मचा हुआ है कि मुसलमानों  को  गुजरात-राइट भूल कर आगे बढ़ना चाहिए और अब गुजरात में मुस्लिम्स के साथ भेदभाव नहीं हो रहा है. उनकी मोदी-  परस्ती पर मुस्लिम्स के साथ सेकुलर-टाइप  की  एन्जिओज़ भी  नाराज़ हैं. अभी-अभी खबर मिली है कि देवबंद में मौलाना वुस्तान्वी को स्टुडेंट्स ने पीटा है और मदरसे में ताला लगा दिया है. लगता है कि मौलाना वुस्तान्वी को अपनी  वाईस-चान्स्लरी से हाथ धोना पड़ सकता है. शायद मदरसों को मॉडर्न और वेस्तर्नायिज़ करने के अभियान को बड़ा झटका  लगा है. वैसे तो यह देवबंद का अपना मामला है लेकिन इसमें  पूरी  इंटरनेश्नल-पोलिटिक्स भी शामिल है. लेकिन मोदी  को  पाक-साफ बताने से सारा मामला बिगड़ गया, शायद  इसका हल मोदी मुसलमानों से माफ़ी मांग कर निकाल सकते हैं लेकिन  उन्हें अपनी पार्टी का हीरो भी बने रहना है. इसलिए वह ऐसा नहीं करेंगे . -------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. प्रबंध संपादक

रविवार, 9 जनवरी 2011

ये शामे-गरीबां है/रंजन जैदी .

यज़ीद अपनी यज़ीदी पे फख्र करता रहा, झुका सका न यकीं को, झुके न बदरे-हुनैन / वो ज़ुल्म करता रहा और इमाम सहते रहे,  हर इक सदी की दुआ बन गए इमाम हुसैन / हुसैनियत की बक़ा को न फिर भी आंच आई, यज़ीद हार गया,ये थे ज़ुल्क़रनैन./ हुसैन क़त्ल  तो  होते  रहेंगे  बरसों-बरस,  हुसैनियत  कभी  पामाल  हो  नहीं  सकती / हरेक  ज़ुल्म  के  पीछे  छुपा  है  एक  यज़ीद, यज़ीदियत को कहीं भी जिला  नहीं  मिलती / छुआ  नमाज़  में  खाके-शिफ़ा  तो  इल्म  हुआ, खुदा  गवाह  कि कर्बोबला  पे  क्या  गुजरी/ ये शाम शामे-गरीबां है आओ मिल-बैठें / न जाने फिर कभी हम हों, न हों कि ये हिजरी / दुआ करो कि  हमेशा मुहब्बतें बरसें, मुहब्बतें हैं इबादत की कीमती गठरी / न कोई ज़ुल्म न ज़ालिम हमारे बीच रहे, ज़मीं पे अम्न  का रुतबा हो, खुश हो हर बशरी--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)  .

पता नहीं वो अकेले में क्यों सुबुकती है/रंजन जैदी


अजीब है कि मुहब्बत पे नाज़ करती है,
पता नहीं वो अकेले में क्यों सुबुकती है.      
गुज़र गई शबे-फुरक़त लो सुब्ह होती है,      
मेरे पड़ोस में दुल्हन अभी भी रोती है.        
मैं बर्फ था तो पहाड़ों ने कर दिया पानी,       
मेरी ज़मीं तो ज़माने से बोझ सहती है.        
वफ़ा का दीप भड़कता है छाई तारीकी,         
बड़े सुकून से फिर भी वो साथ रहती है       
बहुत से लोग हैं कश्ती में जिनसे रिश्ता है,
मेरी निगाह मगर माँ तलाश करती है.         
मैं अपनी आँखें उसे दे तो दूं मगर डर है,    
वो बात-बात पे रोती है, रोती रहती है.  
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शनिवार, 8 जनवरी 2011

सामाजिक एवं प्रासंगिक आलेखों का वाहक weekly/जनार्दन मिश्र

पत्रिका : वीक एंड टाइम्स, संम्पादक : संजय शर्मा, कार्यालय : गोमती नगर , लखनऊ (उत्तर प्रदेश) पृष्ठ :१६, मूल्य : 0५.६०.                                                        किसी भी पत्रिका का सम्पादकीय पक्ष पत्रिका की दृष्टि उजागर करता है. संजय शर्मा के संम्पादन में छपने वाले साप्ताहिकी  'वीक एंड टाइम्स' के सम्पादकीय काफी गौर-तलब होते हैं. मिसाल के तौर पर हम २-८ अक्टूबर,२०१० के सम्पादकीय को सामने रख सकते हैं जिसमें विवादित मंदिर मुद्दे पर उच्च-न्यायलय के निर्णय को फोकस किया गया था. सहमति-असहमति अपनी अलग जगह  है, किन्तु विचारो का सुलझे अंदाज़ में पेश करना दूसरी बात है. यही दृष्टिकोण संपादक को उसके वैचारिक ज़मीन पर लाकर खड़ा करती है. "इसबार धर्मावलम्बियों ने यह कहकर राजनेताओं के मुंह पर ताला लगा दिया कि इस मुद्दे को राजनीति के फड से मत घसीटिए." इस साप्ताहिक पत्र में पाठकों को व्यंग्य, बहस, आपसे संम्वाद, खेल-व्यापार, पुस्तक समीक्षा, कविता, फिल्म आदि को केंद्र में रखकर लिखे गए इस अंक के लेख सामयिक एवं प्रासंगिक हैं. क्षेत्रीय पत्रों के महत्त्व को  यदि गंभीरता से देखा जाए तो हम देखते हैं कि वहां  पत्रिकारिता के पास आज भी मूल्य और उद्देश्य सुरक्षित हैं.                                                                                             --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

*अक्षर-अक्षर सत्य* की भूमिका के रूप में श्री कम्लेश्वेर की ऐतिहासिक टिपण्णी

'डॉ. रंजन जैदी' की रचनात्मकता से सभी सुपरिचित हैं.   
ISBN:978-81-89997-74-8
उनकी रचनात्मकता का दूसरा आयाम पत्रकारिता है जिससे मैं व्यक्तिगत तौर पर परिचित हूँ और उनके पाठक दैनिक पत्रकारिता में उनका नाम न पढ़कर भी उनकी पैनी शैली और अंतर्दृष्टि से परिचित रहे हैं और उन्हें लगातार पढ़ते रहे हैं, इसकी जानकारी भी मुझे है. गंभीर साहित्य और तात्कालिक पत्रकारिता में व्यस्त रहने वाले लेखक के पास समय की कमी हमेशा रहती है, इसके बावजूद डॉ.रंजन जैदी पुस्तकें पढने का समय निकालते हैं और साथ ही समीक्षा जैसी रूखी और अपठित विधा को अपना समय देते हैं
तो ज़ाहिर यही होता है कि वे केवल अपने लेखन को ही नहीं, अपने समकालीनों के लेखन को भी उतना ही सम्मान देते हैं, यह एक दुर्लभ प्रवृति है.जो अब प्रायः अप्राप्य सी हो गई है.       
पुस्तक समीक्षा (विधा) की सबसे पहली कोशिश 'छत्तीसगढ़ मित्र' (रायपुर, म.प्र.) में उसके यशस्वी संपादक पंडित माधव वि सप्रे ने की थी जो पाठक और लेखक के बीच सेतु का काम करती थी, कालांतर में यह विधा लेखक, प्रकाशक और समीक्षक के त्रिकोण में सिमट गई, पाठक को निर्वासित कर दिया गया.     
'समीक्षायन' से लगता है कि पाठक की वापसी होगी, क्योंकि इस पुस्तक में जिन रचनाओं पर विचार किया गया है, वे बड़े प्रकाशनों के प्रकाशन नहीं हैं, साथ ही अपेक्षाकृत कम चर्चित लेखकों पर या फिर अन्य भाषाओँ की रचनाओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया है.. इससे ज़ाहिर होता है कि उन्होंने बड़े प्रकाशक या बड़े लेखक को वरीयता न देकर संभवति: बड़े लेखन को रेखांकित करना श्रेयस्कर समझा है.          
इसलिए  मुझे लगा कि उन्हें धन्यवाद दिया जाए--क्योंकि प्रायोजित समीक्षाओं के इस दौर में अपने मन की कृति को उठाना, उसे पढना और पाठकों के लिए संप्रेषित करना भी आज के अवमूल्यित  दौर में ज़रूरी हो गया है.--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)