रविवार, 3 अप्रैल 2011

केजीबी और ब्रिटिश ख़ु़फिया एजेंसी की आंखमिचौली/चौथी दुनिया

खुफिया एजेंसियों की दास्तां जितनी रहस्यमयी होती है, उतनी ही रहस्यमयी होती है उनके एजेंटों की कहानी. हम सभी इस बात से वाक़ि़फ हैं कि ख़ु़फिया एजेंसियों के जाल हर मुल्क में फैले होते हैं. हर जगह उनकी पैनी नज़र होती है. लेकिन ज़रा सोचिए, क्या कोई ख़ु़फिया एजेंसी किसी मुल्क के सबसे शक्तिशाली नेता को भी अपना जासूस बना सकता है? इसी बात का रहस्य छिपा है इस कहानी में. तारीख़ थी 18 जनवरी, 1963.                                        इस दिन एक ब्रिटिश लीडर की मृत्यु हुई. यह लीडर कोई और नहीं, बल्कि ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने वाले नेताओं में शुमार था. लेकिन प्रधानमंत्री बनने से पहले ही इस नेता की हत्या बेहद रहस्यमयी तरीक़े से हो गई. आज तक उस राज़ को बेपर्दा नहीं किया जा सका है. वह राज़ कि आख़िर उसकी हत्या कैसे हुई? हम आपको बता दें कि यह शख्स तत्कालीन प्रधानमंत्री के उत्तराधिकारी के तौर पर माना जाता था. इसकी हत्या एक ऐसी बीमारी से हुई, जिसकी तहक़ीक़ात के बावजूद अभी तक कुछ सा़फ नहीं हो सका है. हत्या के बाद इलाज करने वाले डॉक्टर से काफी पूछताछ की गई, ताकि हत्या की वजहों का पता लगाया जा सके. ब्रिटिश ख़ु़फिया एजेंसी एमआई-फाइव के अधिकारी ने इसकी जांच का ज़िम्मा अपने हाथों में लिया. आर्थर मार्टिन यही नाम था उस ब्रिटिश ख़ु़फिया अधिकारी का. मार्टिन ब्रिटिश एजेंसी में सोवियत संघ के जासूसी अभियानों की निगरानी करता था. यानी उसे सोवियत ख़ु़फिया एजेंसी की जानकारी अच्छी तरह से थी. जब मार्टिन ने डॉक्टर से पूछताछ की तो उसने मौत की जो वजह बताई, उसे सुनकर वह भी हैरान-परेशान रह गया. दरअसल, डॉक्टर ने बताया कि ब्रिटिश नेता की हत्या एक बेहद अनजान बीमारी से हुई. यह एक ऐसी बीमारी थी, जिससे रोगी के शरीर के सभी अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं. और, एक समय के बाद उसकी मौत हो जाती है. यहां तक तो बात सही थी, लेकिन ब्रिटेन में जिस तरह का मौसम होता है, उसमें इस तरह की बीमारी के होने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. इसलिए डॉक्टर ने भी शक़ ज़ाहिर किया कि मुमकिन है, यह किसी की साज़िश हो हत्या की, ताकि उसके दुश्मन की मौत भी हो जाए और उस पर शक़ भी न किया जा सके.
यह शख्स तत्कालीन प्रधानमंत्री के उत्तराधिकारी के तौर पर माना जाता था. इसकी हत्या एक ऐसी बीमारी से हुई, जिसकी तहक़ीक़ात के बावजूद अभी तक कुछ सा़फ नहीं हो सका है. हत्या के बाद इलाज करने वाले डॉक्टर से काफी पूछताछ की गई, ताकि हत्या की वजहों का पता लगाया जा सके.
आर्थर मार्टिन ने इस पूरे मामले की जांच के लिए केमिकल लेबोरेट्री का सहारा लिया, ताकि उसके ज़रिए कोई सुराग मिले और हत्या की साज़िश करने वालों पर शिकंजा कसा जा सके. लेकिन, यहां भी डॉक्टरों ने बताया कि यह एक ऐसी बीमारी है, जिससे शरीर के अंदरूनी अंगों में संक्रमण फैलता है. पर सोचने वाली बात है कि यह बीमारी ब्रिटिश नेता को कैसे हुई? इसका अंदाज़ा अभी तक किसी को नहीं लग पा रहा था. तभी अचानक इस मामले में एक खुलासा हुआ. यह खुलासा किसी और ने नहीं, बल्कि सोवियत ख़ु़फिया एजेंसी केजीबी के एक जासूस ने किया. उसने बताया कि यह ब्रिटिश नेता कुछ दिनों तक केजीबी के डिपार्टमेंट 13 के संपर्क में था. हम आपको बता दें कि केजीबी में कई डिपार्टमेंट होते थे. और, डिपार्टमेंट 13 राजनीतिक हत्या के मिशन को अंजाम देता था. अब आप यह सोच रहे होंगे कि आख़िर इतनी बड़ी साज़िश का ख़ुलासा भला केजीबी का कोई जासूस क्यों करेगा? तो इसकी भी एक वजह थी. केजीबी का यह जासूस बाद में डिफेक्टर निकला. यानी यह जासूस भी केजीबी में किसी और एजेंसी का घुसपैठिया था. इस जासूस ने यह बताया कि केजीबी ने अपने इस मिशन को अंजाम देने के लिए काफी तैयारियां की थीं. डिपार्टमेंट 13 के मुख्य निदेशक जनरल रोडिन ने इस मिशन के लिए कई वर्षों तक ब्रिटेन में रहकर वहां के हालात को जानने-समझने की कोशिश भी की, ताकि ब्रिटेन समेत यूरोप में केजीबी के मिशन को बख़ूबी अंजाम दिया जा सके.
लेकिन इन सबके बीच एक सवाल सामने आता है कि आख़िर केजीबी ने इस ब्रिटिश नेता की हत्या करवाई भी तो क्यों? क्या उससे सोवियत संघ को कोई ख़तरा था? केजीबी को क़रीब से जानने वालों की मानें तो उन दिनों ब्रिटेन में केजीबी का अच्छा- ख़ासा प्रभाव था. अपने इसी वर्चस्व को क़ायम रखने के लिए केजीबी ने उस ब्रिटिश नेता की हत्या की साज़िश रची. एक वजह यह भी थी कि केजीबी उस समय के एक पावरफुल ब्रिटिश नेता को सत्ता की कुर्सी पर बैठाना चाहता था. और, उसके इस काम में यह ब्रिटिश लीडर, जिसकी हत्या की गई, आड़े आ रहा था. यही वजह है कि केजीबी ने उसे रास्ते से हटाने का पूरा प्रबंध कर लिया था. उसने उस लीडर को इस तरह मौत के घाट उतारा कि उस पर शक़ भी न किया जा सके. यही वजह थी कि केजीबी ने उसे मारने की बेहद जुदा साज़िश रची. केजीबी ने अपनी नापाक साज़िश को यहीं तक सीमित नहीं रखा. इस हत्या की गुत्थी को उसने इस तरह उलझा कर रख दिया कि पूरी ब्रिटिश ख़ु़फिया एजेंसी भी उसमें उलझ कर रह गई. अ़फवाह फैला दी गई कि तत्कालीन प्रधानमंत्री भी केजीबी के एजेंट हैं. इसका असर यह हुआ कि लोग अंदरूनी समस्या में ही उलझ कर रह गए. लेकिन इस पूरी साज़िश की असलियत यह थी कि जिस नेता की हत्या की गई थी, वह अमेरिका का कट्टर समर्थक था और ब्रिटेन में वह अमेरिकी हितों को का़फी तरज़ीह देता था. नतीजतन, केजीबी ने उसे अपने रास्ते से हटाकर अपने वर्चस्व को क़ायम रखने की पूरी कोशिश की.
केजीबी की यह कहानी कोई नई नहीं है. न जाने कितनी द़फा उसने ऐसे ख़तरनाक मिशनों को अंजाम दिया और उनमें सफल भी रही. जब किसी मुल्क का प्रधानमंत्री ही किसी ख़ु़फिया एजेंसी के झांसे में आ जाए, तो वह एजेंसी ख़ुद कितनी शातिर होगी, इसका सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है. यही असलियत थी सोवियत संघ की ख़ु़फिया एजेंसी केजीबी की, जिसने एक नहीं, कई राजनीतिक हत्या की वारदातों को अंजाम दिया.

पेरिस में पली-बढ़ी मार्गरेट जेले

माता हारी होने के लिए ख़ूबसूरत होना पहली शर्त नहीं है, आपको बस उपलब्ध होना चाहिए. नीदरलैंड में पैदा हुई और पेरिस में पली-बढ़ी मार्गरेट जेले पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की एक एजेंट थी, जिसने जासूसी को जिस्मानी रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में नई पहचान दी. लेकिन जेले वास्तव में बेडौल शरीर की मलिका थी, जिसे ख़ूबसूरत न होने के कारण एक डांसिंग ग्रुप में जगह नहीं मिली थी और मजबूरी में उसे एक सर्कस में काम करना पड़ा था.
माधुरी गुप्ता के मामले में पाकिस्तान को आंशिक सफलता ही मिली, क्योंकि मामले पर मचे शोरशराबे के विपरीत उसके पास ज़्यादा जानकारियां ही नहीं थीं. यह भी संभव है कि भारतीय अधिकारियों की निगाहों में आने के बाद वह अंजाने में ही ग़लत सूचनाएं पहुंचाने का एक माध्यम बनकर रह गई हो, लेकिन भारत के लिहाज़ से यह एक बड़ी विफलता है.
किसी ने कहा है कि जेले अपने जिस्म पर कपड़ों के साथ भी उतनी ही अच्छी दिखती थी, जितनी उसके बिना. अब यह उसकी प्रशंसा है या कुछ और, यह तो पता नहीं, लेकिन इतना तय है कि जेले को अपने जिस्म की नुमाइश के लिए मजबूर होना पड़ा था. वह अपने पति को छोड़ चुकी थी, जो नीदरलैंड की शाही सेना में अधिकारी था और इंडोनेशिया में तैनात था, लेकिन वह अव्वल दर्जे का शराबी था और शराब के नशे में अक्सर अपनी पत्नी की जमकर पिटाई किया करता था. लेकिन जेले के पास एक अद्‌भुत प्रतिभा थी, हक़ीक़त के साथ सपनों की दुनिया को जोड़ने की. जावा में रहते हुए उसने भारतीय कामकला के रहस्यपूर्ण गूढ़ार्थों को समझा (तभी उसे माता हारी का नाम मिला) और उसके इस नए अवतार का जादू लोगों के दिलोदिमाग़ पर छा गया. सत्य कहें तो वह कोई बहुत बड़ी जासूस नहीं थी, जासूसी से ज़्यादा वह सुख-सुविधाओं की शौक़ीन थी और इसके लिए उसे पैसे चाहिए थे. उसकी इस कमज़ोरी को जर्मन अधिकारियों ने भांप लिया और 1917 में एक फ्रांसीसी दस्ते ने उसे गोलियों से भून डाला.
दोहरा व्यक्तित्व किसी जासूस के लिए पहली शर्त नहीं है, लेकिन यह उपयोगी ज़रूर है. विफलता की हालत में यह दोहरा व्यक्तित्व उसके काम आता है. साथ ही, सपनों की ऊंची उड़ान वास्तविक जीवन में उसे अपने कर्तव्य बोध और नैतिकता से भी दूर ले जाती है. माता हारी के साथ इस तुलना में एक बड़ा अंतर है. माधुरी गुप्ता के हनीट्रैप की इस कहानी में फंसाने का काम मुदस्सर राणा ने किया, हालांकि कामकला में राणा की योग्यता के बारे में कोई जानकारी हमारे पास नहीं है, लेकिन इस मामले में लिंग से कुछ ख़ास फर्क़ नहीं पड़ता. अहं और कामलिप्सा के कपटजाल में मर्दों को फंसाना ज़्यादा आसान होता है. 1980 के दशक में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब कराची में पदस्थापित एक शीर्ष भारतीय सैन्य अधिकारी पाकिस्तानी ख़ु़फिया तंत्र से जुड़ी एक महिला के मोहजाल में फंस गया, लेकिन एक जासूस की मानसिकता नहीं बदल सकती. चूंकि किसी भी हालत में अपने देश के साथ गद्दारी का कोई वाजिब कारण नहीं हो सकता और लोभ, चाहे वह पैसे का हो या सेक्स का, को सही ठहराने के लिए कारणों की ज़रूरत होती है, तो जासूस अपने तर्कों को वास्तविकता की चादर से ढंकने और उसे सत्य साबित करने की कोशिश करता है. इसके अलावा पेशेवर लोगों के लिए पचास की उम्र बड़ी ख़तरनाक होती है. यह उम्र का वह पड़ाव होता है, जहां करियर उम्मीदों और निराशाओं की दहलीज पर खड़ा होता है. माधुरी इस उम्र में विदेश सेवा में ग्रेड बी स्तर की अधिकारी थी, जबकि विदेश सेवा में उसके हमउम्र अधिकारी अब तक राजदूत बन चुके होते. इस्लामाबाद के भारतीय दूतावास का माहौल ऐसा होता है, जिसने उसकी असंतुष्टियों और सपनों की ऊंची उड़ान को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया होगा. गिरफ़्तारी के बाद उसकी पहली प्रतिक्रिया भी यही बताती है कि वह वास्तविकता से कोसों दूर जा चुकी थी. उसने पुलिस अधिकारियों से पहला सवाल यही किया कि उन्हें इसकी भनक लगने में इतनी देर कैसे लग गई. उसे इसका थोड़ा भी अंदाज़ा नहीं था कि संस्थाएं ख़ुद अपने ही अधिकारियों को कठघरे में खड़ा करने से बचती हैं. ख़ासकर इसलिए भी कि माधुरी को इस्लामाबाद भेजने का फैसला ख़ुद उसका नहीं था, इसके लिए मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी ज़िम्मेदार थे.
अब इस कांड के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराना मूर्खता से ज़्यादा कुछ नहीं है. ख़ुद से परेशान और जीवन से असंतुष्ट एक 54 वर्षीय अधिकारी को वहां भेजना आईएसआई एवं उसके प्रशिक्षित गुर्गों के लिए एक खुला आमंत्रण था. उम्मीदों के मुताबिक़ ही आईएसआई ने इस मामले में सोच-समझ कर क़दम उठाए. राणा माधुरी का हमउम्र था और उसने माधुरी की मानसिक अवस्था को पहचानते हुए उसे ऐसे अंदाज़ में मोड़ा कि वह पाकिस्तानी ख़ु़फिया तंत्र के लिए सूचनाएं उपलब्ध कराने का ज़रिया बनने को तैयार हो गई. दिल्ली पुलिस द्वारा माधुरी गुप्ता से पूछताछ तो ज़रूरी है ही, इसके साथ-साथ विदेश मंत्रालय के बंद दरवाज़ों के अंदर भी गहन जांच-पड़ताल की जानी चाहिए. गुप्ता को पाकिस्तान भेजने का फैसला किसने लिया? उसकी मनोदशा को देखते हुए एक साधारण सा मनोवैज्ञानिक परीक्षण भी यह बता देता कि इस्लामाबाद जैसी जगह, जहां अधिकारियों के प्रलोभन में फंसने की आशंका ज़्यादा होती है, में नियुक्ति के लिए वह उपयुक्त नहीं थी. ऐसा हो सकता है कि शीर्ष अधिकारियों को लगा हो कि उर्दू बोलने वाले किसी भारतीय मुस्लिम की अपेक्षा माधुरी के किसी प्रलोभन में आने की आशंका कम है और इसी आधार पर उसे इस्लामाबाद भेजने का फैसला लिया गया हो. यह दिल्ली की सत्ता के ख़िला़फ कोई आरोप नहीं है, लेकिन यह सही है कि इस तरह की सोच अभी भी मौजूद है. जबकि वास्तविकता यह है कि भारत को शत्रु मानने वाले पाकिस्तानी ख़ु़फिया अधिकारियों के लिए भारतीय मुसलमानों को फांसना ज़्यादा मुश्किल होता है, क्योंकि भारतीय मुसलमान द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को ही सिरे से नकार देते हैं.
माधुरी गुप्ता के मामले में पाकिस्तान को आंशिक सफलता ही मिली, क्योंकि मामले पर मचे शोरशराबे के विपरीत उसके पास ज़्यादा जानकारियां ही नहीं थीं. यह भी संभव है कि भारतीय अधिकारियों की निगाहों में आने के बाद वह अंजाने में ही ग़लत सूचनाएं पहुंचाने का एक माध्यम बनकर रह गई हो, लेकिन भारत के लिहाज़ से यह एक बड़ी विफलता है. इस तरह के जाल में फंसने वाले मूर्ख होते हैं, जो अपनी जड़ें ख़ुद ही खोद डालते हैं. लेकिन, यहां तो एक भारतीय अधिकारी जो एक महत्वपूर्ण मिशन का हिस्सा थी, ही इस जाल में फंस गई और धीरे-धीरे उसमें डूबती चली गई (साभार)

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