यह प्रवासियों का देश है. 92 फीसदी लोग जो आज यहां रह रहे हैं, उनके पुरखे विदेश से आए थे. हम सबके पुरखे विदेश से आए थे. हमारे देश में लोग पिछले दस हजार साल से आते रहे हैं. क्यों आते जा रहे हैं? यहां के लोग नहीं जाते थे बाहर. आधुनिक मशीनीकरण के आने के पहले कृषि प्रधान समाज होता था तो खेती के लिए जो चाहिए था, जैसे समतल उपजाऊ ज़मीन और पानी, वह यहां इफरात में था. आप रावलपिंडी से बांग्लादेश और कन्याकुमारी चले जाइए तो आपको यही सब मिलेगा. लोग पलायन करते हैं विषम से आरामदायक जगह. हर आदमी चाहता है आराम. कोई क्यों यहां से अफगानिस्तान जाएगा, जो बर्फीला है, पथरीला है, तकलीफदेह है. तो सब यहां पलायन करते थे, क्योंकि यहां बड़ा आराम था. कृषि के लिए यह जगह जन्नत थी. पूरे एशिया और खासकर उत्तर पश्चिम से लोग आते थे. रशिया से, अफगानिस्तान से हज़ारों सालों से आते जा रहे हैं. इसीलिए इस मुल्क में इतनी विविधता है, इतने मज़हब, इतनी जातियां, इतनी भाषाएं, इतनी सभ्यताएं. कोई लंबा है, कोई नाटा है, कोई गोरा है, कोई काला है, कोई भूरा है. कोई कोकेशियन है तो किसी के मोंग्लायड नाक नक्श हैं.
यह देश सेकुलर होकर ही चल सकता है. एक दिन भी नहीं चल पाएगा, अगर ऐसा न हो. यही हमारे संविधान में लिखा गया और संविधान बनाने वालों का मंसूबा भी यही था. यह संविधान है, जो हमें बांधे हुए है. यह ऐसा देश बनाता है, जिसमें सबको समान इज्जत से देखा जाता है. नहीं तो हमारे और किसी नगालैंड के लड़के में क्या समानता है?
अगर आप चीन और भारत की तुलना करें तो भारत की आबादी है 120 करोड़ और चीन की है 130 करोड़, हमसे दस करोड़ ज़्यादा. चीन का क्षेत्रफल हमसे दो-ढाई गुना अधिक है. चीन में बड़े पैमाने पर समरूपता है. सभी के मोंग्लोयड नाक नक्श हैं. एक समान भाषा है, जिसे कहते हैं मैंडारिन चाइनीज़. 95 फीसदी चीनी लोग एक ही नस्ल के हैं, जिन्हें कहते हैं हान चाइनीज़. चीन हमसे भले ही बड़ा है, लेकिन वहां पूर्ण समरूपता तो नहीं है, लेकिन व्यापक समरूपता है. यहां भिन्नता बहुत है, क्योंकि हमारा देश प्रवासियों का देश है. कौन थे भारत के मूल निवासी? पहले सिद्धांत था कि द्रविड़ इस देश के मूल निवासी थे, लेकिन आज यह सिद्धांत खंडित हो गया है. अब यह साबित हो गया है कि द्रविड़ भी बाहर के थे. सिंधु घाटी सभ्यता, जो अफगानिस्तान-पाकिस्तान में पाई गई, ये उसके थे. इसका सबूत एक भाषा है ब्राहुई, जो पश्चिमी पाकिस्तान-ब्लूचिस्तान में बोली जाती है, जिसे 30 लाख लोग आज भी बोलते हैं. यह भाषा तमिल जैसी है. लेकिन आश्चर्य की बात है कि तमिल वहां कैसे पहुंच गई. वहां हज़ारों साल पहले रहे तमिलों के अवशेष के रूप में यह भाषा रह गई है. तो अब जो सिद्धांत है, वह यह है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़ों के पहले रहने वाले जनजातीय और आदिवासी लोग थे, जैसे भील, संथाल, गोंड या तमिलनाडु में टोडा. ये अब मुश्किल से सात-आठ फीसदी रह गए हैं. हमारे पूर्वजों ने इन्हें जंगलों और पहाड़ों में धकेल दिया.
दूसरा सवाल यह उठता है कि हमारे पुरखे, जो पलायन करके यहां भारत में प्रवासी बनकर आए तो क्या प्रवासी ही रह गए या भारत में किसी समान संस्कृति ने जन्म लिया. इसका जवाब यह है कि भारत में प्रवासियों में आपसी मेलजोल से निकली एक समान संस्कृति और मैंने इसका नाम रखा है संस्कृत-उर्दू संस्कृति. यह इस मुल्क की संस्कृति है. कभी मैंने कहीं यह बात कही तो एक सज्जन बोले कि संस्कृत और उर्दू का क्या मेल? मैंने जवाब दिया कि संस्कृत तो दादी है उर्दू की. इन दोनों में बहुत गहरा रिश्ता है. मैं सभी भाषाओं का बहुत सम्मान करता हूं. बंगाली में शरत चंद्र सरीखे लोगों ने बहुत अच्छा साहित्य लिखा. इसी तरह तमिल, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया और कश्मीरी में बहुत अच्छा साहित्य लिखा गया. इसके बावजूद संस्कृत और उर्दू का ख़ास स्थान है हमारे मुल्क में. यह दोनों हमारी महान राष्ट्रीय भाषाएं हैं. जब हमारे देश में एक समान संस्कृति यानी संस्कृत-उर्दू संस्कृति ने जन्म लिया तो फिर यह फिरकापरस्ती या सांप्रदायिकता आई कैसे?
जो मुस्लिम आक्रमणकारी इस देश में आए (जैसे बाबर), उनके बच्चे (जैसे अकबर) तो बाहरी नहीं हुए. उसी तरह जैसे हमारे पूर्वज बाहरी कहे जा सकते हैं, लेकिन हम लोग नहीं. ऐसे मुस्लिम शासक क्षेत्रीय शासक हो गए. उन्होंने देखा कि हिंदू तो बहुसंख्यक हैं और यदि उनके मंदिर वगैरह तोड़े गए तो रोज़ बगावत होगी. कोई राजा नहीं चाहता कि उसके राज्य में रोज़ बगावत हो, वह चाहता है कि अमन चैन बना रहे. जितने भी मुस्लिम शासक थे, उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा दिया. मैं उत्तर प्रदेश का हूं, वहां नवाब होली-दीवाली मनाते थे, रामलीला का आयोजन करते थे और हिंदू ईद मनाते थे और शिया संप्रदाय के साथ मुहर्रम में शोक मनाते थे. मुर्शिदाबाद के नवाब भी हिंदुओं के साथ त्योहार मनाते थे. टीपू सुल्तान मंदिरों को सालाना अनुदान देता था. ये बातें दबा दी गईं और किसी भी किताब में दर्ज नहीं हैं. यह जरूर बताया गया कि महमूद गजनी ने सोमनाथ का मंदिर तोड़ा.
हमारा जो इतिहास लिखा गया, वह अंग्रेजों ने लिखा, जो फूट डालो-राज करो की नीति से प्रेरित था. इतिहास लिखा ही गया आपस में नफरत पैदा करने के लिए. ऐसा उल्लेख है कि टीपू ने पंडितों से मुसलमान बनने को कहा, जिस पर उन्होंने आत्महत्या कर ली. यह मैसूर गजेटियर में मिलता है. ऐसा कुछ भी उस गजेटियर में नहीं लिखा और यह कोरा झूठ है. पता चला कि वह मंदिरों को सालाना अनुदान देता थू उर श्रंगेरी के शंकराचार्य को कई बार उसने धन्यवाद पत्र भेजा कि उनकी कृपा से उसका राज्य बहुत खुशहाल है. इतिहास ही पलट दिया गया. ऐसा हुआ क्यों और कैसे? यह सब शुरू हुआ 1857 की लड़ाई के बाद. इसके पहले कहीं कोई फिरकापरस्ती नहीं थी. 1857 की बगावत में हिंदू और मुसलमान एक साथ लड़े, लेकिन अंग्रेजों ने बगावत को कुचल दिया. उन्होंने सोचा कि अगर भारत पर हुकूमत करनी है तो हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़वाना पड़ेगा और कोई रास्ता नहीं है. यह ज़हर बोते-बोते 1947 का विभाजन सामने आ गया. जब विभाजन के दौरान सांप्रदायिक हिंसा ने उत्तरी भारत के लोगों को पागल कर दिया था, तब पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक राज्य घोषित कर दिया. आप सोच सकते हैं कि पंडित नेहरू और उनके साथियों पर कितना भारी दबाव रहा होगा कि भारत को भी हिंदू राज्य घोषित कर दिया जाए, लेकिन उन्होंने संयम और विवेक बनाए रखा और कहा कि देश सेकुलर रहेगा. यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उस समय दबाव को झेलना इन लोगों के बड़प्पन की निशानी है.
यह देश सेकुलर होकर ही चल सकता है. एक दिन भी नहीं चल पाएगा, अगर ऐसा न हो. यही हमारे संविधान में लिखा गया और संविधान बनाने वालों का मंसूबा भी यही था. यह संविधान है, जो हमें बांधे हुए है. यह ऐसा देश बनाता है, जिसमें सबको समान इज्जत से देखा जाता है. नहीं तो हमारे और किसी नगालैंड के लड़के में क्या समानता है? भारत में असली संघवाद है, जिसमें क्षेत्रीय संवेदनाओं को भी आपस में समान स्तर दिया गया है, क्योंकि हम सभी बाहर से आए प्रवासी हैं और हमारे भीतर बहुत भिन्नता है. हम एक साथ इस संविधान से बंधे हुए हैं और यह भिन्नता हमारी कमजोरी नहीं, ताकत है.markandeykatju@chauthiduniya.com