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| नीना गर्ग |
२मार्च २०११ के नवभारत टाइम्स के पृष्ठ १४ पर जामिया का नया दर्जा मुसलमानों के लिए नुकसानदेह (लेखक-फ़िरोज़ बख्त अहमद) प्रकाशित हुआ है. इसी पृष्ठ पर संजय खाती के लेख भी छपते रहते हैं जिन्हें पढ़कर जर्नलिज्म के जिंदा होने का एहसास होता है. फ़िरोज़ बख्त अहमद के जब भी लेख नज़र आए हैं, वे मुस्लिम समाज का मर्सिया अधिक, बसंत के गीत कम लगे हैं. शायद मैं इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया न व्यक्त करती, किन्तु जेहालत जब मर्सिया बन जाये तो नबीना की ऑंखें भी डबडबा उठती हैं. मुसलमानों का मर्सिया पढ़कर उसे छपवाते रहना पैसा कमाने का जरिया और अतिवादियों को खुश करते रहना एक विकल्प तो हो सकता है, स्वस्थ पत्रकारिता नहीं हो सकती. समस्या यह है कि श्री बख्त अभी भी उस कुहासे से बाहर नहीं निकल पाए हैं जिसमें हिन्दू-मुस्लिम नफरत की धुंध घुली रहती है. जिस विषय पर वह लिखते हैं, उसपर असगर अली इंजीनियर, सईद नकवी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, कमर वहीद नकवी, रंजन जैदी, एहतशाम हुसैन, सईद अंसारी और दूसरे नामचीन मुस्लिम पत्रकार और लेखक कलम नहीं उठाते. जब भी इनके कलम उठे हैं तो बात दूर तलक पहुंची है. बख्त को तो यह भी नहीं मालूम है कि मैं भी अलीगढ मुस्लिम यूनीवर्सिटी की पढ़ी हुई हूँ और वहां हर कौम के लोग पढ़ते हैं और खुले ज़हन को लेकर दुनियाभर में फैल जाते हैं. मेरा नाम नीना गर्ग है और जिन लोगों का मैंने ऊपर ज़िक्र किया है उनमें कई नामवर लोग इसी यूनिवर्सिटी से ऊंची तालीम हासिल कर ऊंचे ओहदों तक पहुंचे है और वे लोग निश्चय ही संकीर्ण विचारधारा के नहीं हो सकते हैं. इसी तरह जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी का कल्चर रहा है. इसी तरह उस्मानिया यूनिवर्सिटी का कल्चर रहा है. मैं नहीं जानती कि बख्त कहाँ के पढ़े हैं. हो सकता है वह किसी जमाते इस्लामी या किसी ऐसे मदरसे से निकले हों जिसका सम्बन्ध सऊदी अरब के फंड से रहा हो. 60 वर्ष के बाद अब भी जो विभाजन के दिनों का रोना रोता है और भारत के विकास और उसके बढ़ते आर्थिक चरण की उपेक्षा करताहै, मुझे उसकी मानसिक स्थिति पर संदेह होता है. हिन्दू-मुस्लिम के पारस्परिक सौहार्र्द और प्रेम को समझने और जानने के लिए उन्हें दूर नहीं, इसी अख़बार के कार्यकारी संपादक श्री रामकृपाल सिंह के पास उठना-बैठना चाहिए जो बता सकेंगे कि हिन्दू-मुस्लिम एकता का क्या मतलब होता है. बख्त को मैं बताना चाहूंगी कि मुस्लमान खुद अपनी तरक्की का दुश्मन है. मुसलमानों में संस्कारित परिवारों का आभाव है और कारखानेदार वर्ग का फैलाव अधिक है. मिल या कारखानेदार मालिक को सस्ते मजदूरों की ज़रूररत होती है. मुस्लमान आसानी से सुलभ हो जाता है और मालिक हमेशा ऐसे कुशल सस्ते कारीगरों और वफादार मजदूरों को छोड़ना पसंद नहीं करता है, इसलिए उसे क़र्ज़ के एहसान से दबोच लेता है. वः उसके बच्चों को भी कम दे देता है ताकि वह लगा रहे और विकसित न हो सके. बहुत से कबाड़ी टाईप के लोगों के पास आज भी बहुत पैसा है लेकिन वह पढने से डरता है. कारन यह है कि कबायली निजाम ने उसके जेहन को कुंद कर दिया है. बख्त को मैं बताना चाहती हूँ कि इसके पीछे का इतिहास है कि मुस्लिम शासकों के ज़माने में तीन तरह के मुस्लमान थे. एक-जो एलीट था, वह शासक वर्ग से सम्बन्ध रखता था. दो-सैनिक थे, जिनसे पढाई का कोई सम्बन्ध नहीं था. तीन-जो कन्वर्जन के बाद मुस्लमान हुए थे और हिन्दू समुदाय से आए थे, वे फोर्थ क्लास के थे, जिनके नाम बख्त ने अपने लेख में गिनाएं हैं. वर्ग विभाजन मुस्लिम काल में भी था, आज भी है. ये सामाजिक व्यवस्था की नसेनियाँ रही हैं. सही मानों में ब्राह्मण समुदाय आज़ादी के बाद सम्पन्नता की ओर बढ़ा. कारण था सर्वशक्ति संपन्न प्रधानमंत्री नेहरु जी का कश्मीरी पंडित होना. विभाजन के तुरंत बाद से ही पीएम हॉउस को एक ऐसे काकस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया जो नेहरु जी और उनके परिवार को खुश रखने के लिए सदैव तत्पर रहता था. इस कमजोरी से ब्राह्मणों के एक अनुशासित और चतुर वर्ग ने लाभ उठाना शुरू कर दिया जिसमें अपनी मुक्ति की तलाश में भटकते रहने वाला डरा-सहमा वणिक वर्ग उसके साथ हो गया. बहुत से दलित शरणार्थी इस बहाव में ब्राह्मन बन गए. ब्रह्म-सभाएं बन गईं और अपढ ब्राह्मन यूवाओं को चपरासी की नौकरियां दे दी गईं जो अगले दस-पंद्रह साल में सेक्शन आफिसर बन गए. ज़मीनों के एलाटमेंट होने लगे, संस्कृत का नारा लगाकर ब्राह्मणों ने कालेज और यूनिवर्सिटिया और विद्यापीठ स्थापित कर लिए. व्यापारी वर्ग ने बैंको से अधाधुंध लोन ले-लेकर मिल और कारखाने खड़े कर लिए. कुल मिलाकर विकास का चक्र चलने लगा. ३५ करोड़ की आबादी एकअरब 20 करोड़ तक पहुँच गई.इसमें मुस्लमान (60 वर्षों में 16 करोड़) भी शामिल है.मुस्लमान चपरासी नहीं बने. मामला खोखले सामाजिक सम्मान का था. मुस्लिम काल में जो वर्ग तकनीकी में सक्षम था, वह परंपरागत रहा. इसलिए उसने स्कूल का रुख नहीं किया. हिन्दुवों में एक उम्मीद ज़रूर जगी कि पढाई उनके सामाजिक स्तर को ऊंचा उठा सकती है तो वे स्कूल जाने लगे. इसका मतलब यह नहीं लगाना चाहिए कि हिदुवों में लिटरेसी का रेट बढ़ गया. एलीट होते जा रहे ब्राह्मणों के एक वर्ग ने अपनी संस्थाओं में अपनी आगामी नस्लों के लिए रोज़गार के दरवाजे ज़रूर सुरक्षित कर लिए लेकिन 6 करोड़ देहि ब्राहमण बच्चों का संघर्ष आम यूवाओं जैसा ही था. फिर भी उनका आत्मविश्वास उन्हें निरंतर आगे ही ले जाता रहा. मुसलमानों का संघर्ष अनेक समस्याओं से ग्रस्त था. मुसलमानों को एक तरफ सांप्रदायिक दंगों को झेलते रहना था, रोज़गार की चुनौतियां थीं और अपने पिछड़े परिवेश को बदलते सामाजिक सरोकारों से आँख मिलाने और अपने स्थायित्व को कायम रखने के द्वंद्वों से जूझते रहना था. ऐसे में मुस्लिम एजुकेशनल संस्थाओं का योगदान काफी महत्वपूर्ण था. अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने यह भूमिका बखूबी निभाई. उसने छात्रों में आत्मविश्वास पैदा किया और एक ऐसी सेकुलर मानसिकता को जन्म दिया जिसने यूवाओं को हिन्दुवों के बीच ला खड़ा किया और साबित कर दिखाया कि वह बिना किसी गाड-फादर के अपनी योग्यता के बल पर अपना स्थान हासिल कर सकता है. (जारी.../-२) -----------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है.
