ब्लैक वाटर के नए प्रबंध-निदेशक बोबी रे ने अमेरिका में उठ रही आवाज़ों को सुनकर और वहां की अदालतों में पूछे जा रहे सवालों की परदापोशी करने के उद्देश्य से इस यहूदी संगठन का नाम बदल कर अब इंटरनेशनल पीस आपरेशन एसोसियेशन रख दिया है. अफगानिस्तान में इस समय सिक्योरिटी कांट्रेक्टर्स की ५२ कंपनीज़ काम कर रही हैं. इनमें ज़ी सर्विसेज़ की बदनाम कंपनी ब्लैक वाटर का नंबर ९ है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई इस संगठन के सैनिकों को दिन के चोर, और रात के आतंकवादी कहते हैं. उन्होंने कई बार चाहा कि अफगानिस्तान से इंगित दहशतगर्द कंपनियों को हमेशा के लिए निकाल बाहर किया जाये लेकिन इसमें उन्हें मुंहकी खानी पड़ी. २०१० में भी उन्होंने उक्त आयातित निजी अमेरिकी कारोबारी कंपनियों पर पाबन्दी लगाने और उनके वीजे समाप्त कर देने की बात उठाई थी मगर उन्हें अमेरिकी सीनेट ने चुप करा दिया था. उन्हीं दिनों अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिक कमांडर डेविड पीटर यास को निर्देशित किया गया कि वह राष्ट्रपति करज़ई पर अंकुश लगाये. अमेरिकी कमांडर ने अपनी मुलाकात के दौरान करज़ई से साफ कह दिया कि अफगानिस्तान से निजी सुरक्षा कम्पनियाँ अमेरिकी मिशन को छोड़कर वापस नहीं जायेंगीं. हालाँकि कमांडर ने अमेरिकी गुप्त मिशन का खुलासा नहीं किया और न ही करज़ई ने उससे आगे कुछ पूछने का साहस किया. अलबत्ता उसने करज़ई को अरबों डालर की मदद का भरोसा अवश्य दिया जिसे आगे चलकर अमेरिकी सीनेट और सुरक्षा परिषद् ने तुरंत मंज़ूरी देदी. हामिद करज़ई शायद २८ जून २००९ को इराक से युद्ध के अंतिम पृष्ठ को बंद कर जब पाल ब्रेमर अमेरिका के लिए रवाना हो रहे थे तो उन्होंने साफ शब्दों में जो कहा था, उसे भूल गए थे. तब पाल ब्रेमर ने कहा था कि चूंकि ब्लैक वाटर ऑर्डर-१७ के अधीन है, इसलिए यह इराक में कहीं भी कार्यवाई करने के लिए स्वतंत्र है. यह स्थिति तभी आगई थी जब अमेरिका के रक्षा मंत्री डॉनालद्ज़ रम्सफील्ड का प्रभाव उनके पद-मुक्त होते ही नाटो की पकड़ कमज़ोर हो गई थी और बुश-प्रबंधन में ज़ी कंपनी के तत्कालीन मालिक एरिक प्रिंस के ब्लैक वाटर संगठन के पांव मज़बूत हो गए थे. स्थिति का लाभ उठाते हुए एरिक ने तुरंत बुश प्रबंधन के समक्ष कांट्रेक्टर-ब्रिगेड उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रख दिया. यह कान्ट्रेक्ट १४ अरब डालर का था जिसे तुरंत मंज़ूर भी कर लिया गया क्योंकि यह पेंटागन पर आ रहे खर्च का मात्र ३० प्रतिशत था. यही नहीं बल्कि २००४ में ज़ी कंपनी के ब्लैक वाटर संगठन ने गुप्त रूप से एक नए संगठन ग्रे-स्टोन डिविज़न लिमिटेड का रजिस्ट्रेशन भी अमेरिका के सेन्ट्रल कांट्रेक्टिंग कार्यालय में करा दिया. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह थी कि विदेशों में पेंटागन के साथ काम करते रहने के उद्देश्य से ज़ी कंपनी ने ग्रे-स्टोन डिविज़न लिमिटेड का रजिस्ट्रेशन बर्बडोज़ में कराया और अमेरिका के बुश प्रबंधन ने इसे टैक्स-मुक्त कंपनी भी करार दे दिया. इसके पैम्फलेट्स में बताया गया कि वह अमेरिकी हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार के आदेश पर एक पल में अपनी ब्रिगेड, इंटेलिजेंस और लड़ाकू बमों से लैस विमान दुनिया के किसी भी देश में उतार सकते हैं. उनमें यह भी प्रचारित किया गया कि उसकी ब्रिगेड में एल्सलवादोर,कोलंबिया, होंडूरास, एक्वाडोर और पेरू के प्रशिक्षित व प्रोफेशनल कमानडोज़ शामिल किये गए हैं और जो क्लाशिन्कोफ़ (एके-४७), ग्लोक-१९, एम्-१६ की सिरीज़ की रायफलों से लैस रहते हैं. यहाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि ब्लैक वाटर ग्रुप में अधिकतर सैनिक चिली के डिक्टेटर अगस्तोपनो की सेना में काम कर चुके प्रशिक्षित, विशेषज्ञ और बहादुर सैनिक हैं. ज़ी कंपनी के अध्यक्ष गेरी जेक्सन का कहना है कि वह अपनी इस नई कंपनी की ताकत बढ़ाने के लिए दुनिया के किसी भी देश से बहादुर और वफादार कमानडोज़ उठा सकते हैं.यानि यह एक ऐसी मुहिम की शुरुआत है जो अंतर्राष्ट्रीय सेना के महत्व की उपेक्षा कर अंतर्राष्ट्रीय निजी सैनिक कंपनियों को संगठित करने और भावी युद्धों से मुनाफा कमाने के कारोबार को बढ़ावा देगी. यह एक ऐसी खतरनाक माफियाई योजना है जो यदि कभी पूरी हो गई तो विश्व-शांति का सूरज सदैव के लिए अस्त हो जायेगा. संतोष इस बात का है कि अब अमेरिका में युद्धोन्मादी बुश की सरकार नहीं है लेकिन वह जीवित है. अमेरिका की नई ओबामा सरकार ने बुश के उन्मादी युद्ध-फोबिया पर कभी उचित बयान नहीं दिया कि बुश और उसके हाली-मवाली मित्र राष्ट्राध्यक्ष युद्ध-अपराधी है और उनपर पर मुकद्दमा चलाया जाना चाहिए. इसके बावजूद अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा मिस्र जाकर मुसलमानों को विश्वास दिलाते हैं कि अमेरिका मुसलमानों का दुश्मन नहीं है. कालांतर में लोगों ने देखा कि अचानक अमेरिकी प्रचार-तंत्र दुनियाभर में वैसे ही तेज़ हुआ जैसा अफगानिस्तान और इराक युद्ध से पूर्व तेज़ कर दिया गया था और सारी दुनिया मुसलमानों से अलाहिदगी बरतने लगी थी. यहाँ तक कि भारत में भी जगह-जगह ब्लास्ट होने लगे थे और पकडे जाने वाले लोग मुसलमान हुआ करते थे. यह अमेरिकी प्रचार का ही नतीजा था कि मिस्र में हुस्नी मुबराक का तख्ता पलट गया. मिस्र में सरकारे आती-जाती रहेंगीं लेकिन वहां अब कभी भी शांति नहीं आ पायेगी क्योंकि मोसाद, सीआईए और ब्लैक वाटर की ख़ुफ़िया फ़ोर्स वहां सक्रिय हो चुकी है. इस्राईल अब अपने पड़ोस में मिस्र को एक शक्तिशाली सैनिक देश के रूप में उभरते देखना नहीं चाहेगा जिसने उसे कभी युद्ध में पराजित किया था. लीबिया पर देर-सवेर अंतर्राष्ट्रीय सेना का कब्ज़ा होने ही वाला है. ब्लैक वाटर के सैनिक वहां सक्रिय हो चुके हैं और कई शहरों पर उन्होंने कब्ज़े कर भी लिए है. रिबेलियन के रूप में वहां ब्लैक वाटर के कमानडोज़ काम कर रहे हैं. लीबिया को गद्दाफी के चंगुल से छुड़ाकर वहां के नागरिकों को आज़ादी का हक़ दिलाने के नाम पर जो नाटक खेला जा रहा है, उसपर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं. यहाँ मिलिट्री प्राईवेटाइज़ेशन के बढ़ते रुझान और पैदा होते खतरों पर जब निगाह जाती है तो दुनिया शायद अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को माफ़ न कर पाए क्योंकि सेना में प्राईवेटाइज़ेशन की शुरुआत बिल क्लिंटन के शासनकाल में हुई थी. हिलेरी क्लिंटन आज भी वर्तमान सरकार में मंत्री हैं और उनके पति बिल क्लिंटन अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके हैं. चूंकि अमेरिका में प्राइवेटाइज़ेशन की शुरुआत का जुनून बिल क्लिंटन के ज़माने में ही हो गया था इसलिए डिक्चेनी ने अवसर का लाभ उठाते हुए राष्ट्रपति बुश के युद्धोन्माद के रंग को गाढ़ा बना दिया और धड़ल्ले के साथ पहली बार ब्लैक वाटर जैसे निजी सैनिक संगठन को इराक की ज़मीन पर उतार दिया हालाँकि इसके २५ हज़ार सशस्त्र सैनिक अफगानिस्तान में प्रयोग की दृष्टि से पहले ही उतारे जा चुके थे और पेंटागन के साथ उनकी कारकर्दिगी ने जो नतीजे बरामद कराये थे, उससे अमेरिका के दोनों राजनीतिक दल इस एजेंडे पर एकमत थे. ब्लैक वाटर जैसे संगठन का निजी कारोबार बिल क्लिंटन के समय में ही फलने-फूलने लगा था, बुश-प्रबंधन ने डिक्चेनी का ब्रेन पाकर इसे अरबो-खरबों डालर के ठीके दे दिए थे जिससे आज अमेरिका की आतंरिक और वाह्य सुरक्षा के बंकरों पर ब्लैक वाटर का कब्ज़ा हो चुका है. यह एक नई और दिल दहला देने वाली स्थिति है जिसपर इराक में अमेरिका के अंतिम सीनियर राजदूत (१९९१ में खाड़ी युद्ध शुरू होने से पूर्व) जो विल्सन की चिंता निश्चय ही नए सवाल खड़े कर देती है. उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह स्थिति बेहद खतरनाक है. वार-कंपनीज़ को अरबों डालर दे दिए गए, परिणाम स्वरूप अमेरिकी राजनीति में एक ऐसे स्वार्थमय-शक्ति-संपन्न समुदाय का उदय हो गया है जो शास्त्र-सम्पन्न है जिसपर कभी न कभी यह सवाल अवश्य उठेगा कि किराये की यह सेना किसके साथ वफादार रहेगी? सुरक्षा एजेंसियों के निजीकरण ने अनेक पेचीदा समस्याएं खडी कर दी है जो देश की आतंरिक सुरक्षा का ग्रहण बन सकती हैं. पेंटागन ने अमेरिकी अदालतों में चल रहे उदध-सम्बन्धी मुकद्दमों को ध्यान में रखते हुए ब्लैक वाटर संगठन को कानूनी रूप से यूनिफार्म कोड ऑफ़ मिलिट्री जस्टिस से आजाद बताना शुरू कर दिया और कहा कि यह एक स्वयंसेवी संगठन है जो युद्ध के दौरान पेंटागन के सैनिकों और अवाम के बीच सेवाभाव के काम करता है. लेकिन आम अमेरिकी नागरिकों के बीच पेंटागन यही प्रचारित करता है कि ब्लैक वाटर संगठन मूलतः पेंटागन फ़ोर्स की ही एक इकाई है. यह विरोधाभास ब्लैक वाटर की सैनिक शक्ति को देखकर और इराक में अमेरिकी वार-मिशन के क्रियान्वयन के दौरान आसानी से देखा जा सकता है. (क्रमशः जारी/-४) -------------------------------------------------------------------------------------------------------- विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
nfpma (News-Features Press Media Alliance RN.256/73),New Delhi
बुधवार, 30 मार्च 2011
मंगलवार, 29 मार्च 2011
नाईंन इलेवन के हादसे के बाद-2/रंजन जैदी
![]() |
| यह है बद्दुआ कि जूनून-इ-जंग, तुम्हे चाहिए वो वसूल लो/हमें कुछ भी नहीं चाहिए, हमें इस अजाब से निकाल लो |
रविवार, 27 मार्च 2011
नाईंन इलेवन के हादसे के बाद/रंजन जैदी
नाईंन इलेवन के हादसे के बाद वह अमेरिका में निजी सिक्योरिटी व्यवसाय में सबसे बड़ा सिक्योरिटी-कांट्रेक्टर बनकर उभरा था.
उस समय उसके पास एक अरब डालर से भी अधिक के कान्ट्रेक्ट थे. इराक-वार में सैनिकों के अतिरिक्त निजी सिक्योरिटी एजेंसी के एक लाख गार्ड्स महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे थे.
हाल की खबर के अनुसार नाटो के सैनिकों से भी पहले इसी एजेंसी के लगभग २५ हज़ार गार्ड्स लीबिया के बेन्गाज़ी में उतारे जा चुके है. नाटो-आपरेशन के बाद तेल के भंडारों और कुंवों का अधिकरण करते ही इनकी तादाद एक लाख तक पहुँचने की संभावना है. इराक युद्ध में इस एजेंसी के एक लाख सुरक्षा-कर्मियों ने नाटो सेना के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
अफगानिस्तान में युद्ध से पूर्व इसी एजेंसी के सुरक्षा-सैनिकों ने हजारों अफगान लड़ाकों की हत्या कर नाटो के लिए वातावरण तैयार कर दिया था. इस एजेंसी का नाम है ब्लैक वाटर फ़ोर्स जिसका मुख्यालय अमेरिका स्थित नार्थ केरोलीना के क्षेत्र म्यूक में स्थित है. उसका मालिक ३८ वर्षीय एरिक प्रिंस दुनिया भर में दहशत का पर्याय बन चुका है और जिससे इराक का हर नागरिक नफरत से उबल पड़ता है.
ब्लैक वाटर फ़ोर्स दरअसल अमेरिकी सेना का एक निजी विंग है जिसके सैनिकों को ब्लैक वाटर फ़ोर्स नामक एजेंसी से किराये पर लिया जाता है. इराक-वार में इस एजेंसी को अमेरिकी सरकार से २७ मिलियन डालर का ठीका मिला था. यह ठीका अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा सन २००३ में उसे इराक स्थित अमेरिकी राजदूत पाल्ब्रेमर की सुरक्षा के लिए दिया गया था क्योंकि तब अमेरिका की बुश सरकार की ओर से पाल्ब्रेमर को इराक की तत्कालीन अंतरिम सरकार (मई २००३ से जून २००४ तक ) के प्रमुख के रूप में बगदाद भेजा गया था.
बग़दाद पर कब्ज़ा कर लेने के बाद ब्लैक वाटर फ़ोर्स के सैनिकों ने सरेआम लूट, अपहरण, बलात्कार और बगदाद स्कवैर कत्लेआम का ऐसा नंगा नाच दिखाया कि मानवता की रूह तक काँप-काँप उठी.
इन स्थितियों में तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री नूरी अलमालिकी को ब्लैक वाटर फ़ोर्स की कारगुजारियों के विरुद्ध अमेरिकी सरकार से शिकायत करनी पड़ी तो जवाब में बुश सरकार की विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राईस ने आवेश में आकर प्रधानमंत्री नूरी अलमालिकी से माफ़ी मांगने को कहा. यह बेहद दुर्भावनापूर्ण घटना थी.
इससे ब्लैक वाटर फ़ोर्स के हौसले और भी काफी बुलंद हो गए. इराक में उसके द्वारा की जाने वाली वारदातों पर उसका नारा बेहद भयानक था, यहाँ आज जो होगा, वह आज ही समाप्त हो जायेगा/कल कोई याद भी नहीं रखेगा.
इस एजेंसी की इराक में निर्भीकता का हाल यह था कि जब वाशिंगटन पोस्ट के पत्रकार ने एजेंसी के एक गार्ड अधिकारी को उसकी एजेंसी के करतूतों की याद दिलाई और अमेरिकी सरकार की जवाबदेही का भय दिखाया तो उसने स्पष्ट शब्दों में कहा, हमसे कहा जाता है कि यदि किसी कारण कभी कुछ हो भी जाता है और इराकी तुम पर मुकद्दमा कर देते हैं, तो क्या होगा? अधिक से अधिक तुम्हें कार में डालकर रात के अँधेरे में सरहद पार छोड़ दिया जायेगा. इराक में मूलतः हुआ भी यही.
ब्लैक वाटर फ़ोर्स (जिसे ज़ी के नाम से जाना जाता है) के इस दुस्साहस के पीछे अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डिक्चेनी थे. डिक्चेनी ने ही अपने कार्यकाल के दौरान फ़ौज में निजी फौजी ब्यूरोक्रेसी के व्यवसाय को बढ़ावा दिया.
यह वह समय था जब अंतर्राष्ट्रीय सेनाएं अमेरिकी सेना के नेतृत्व में उसके साथ मिलकर १९९१ का खाड़ी युद्ध लड़ रही थीं. यहूदी (ज्यूस इंस्टीटयूट आफ नेशनल सिक्योरिटी अफेयर्स के सदस्य) डिक्चेनी की कंपनी ने बाल्कन विवाद (१९९०) के रहते और स्वो (1999) में भारी मुनाफा कमाया.
क्लिंटन प्रशासन ने जब सर्बों के विरुद्ध क्रोशिया की सेना को प्रशिक्षण देने के लिए १९९० के उत्तरार्द्ध में आर्मी कंसल्टिंग फर्म वर्जीनिया की मिलिट्री प्रोफेशनल रिसोर्स इनकार्पोरेटेड को ट्रेनिंग का ठीका दिया जिसे अमेरिका के रिटायर्ड सैनिक अधिकारी संचालित कर रहे थे, तो बात साफ हो गई कि अब सेना के सामानांतर निजी क्षेत्र की सुरक्षा सेना से भी सेवाएं ली जा सकेंगीं.
वार आन टेरर की यह एक शुरुआत थी. अभिन्न मित्र डोनाल्ड रम्सफील्ड तब अमेरिकी सरकार में रक्षा मंत्री थे. किराये के सैनिकों की खपत उसी कार्यकाल में शुरू हुई, पहले कम, फिर अधिक.
१९९३ में डिक्चेनी के सेवानिवृत होने से पूर्व उन्होंने फौजी ब्यूरोक्रेसी के सामानांतर प्राइवेट फौजी ब्युक्रेसी को प्रतिष्ठापित कर आगे चलकर हेलीबर्टन कंपनी के सीईओ बन गए. यह एक अमेरिकी सुरक्षा के दुर्ग की निजी सुरक्षा कांट्रेकट एजेंसी थी और जब डिक्चेनी अमेरिकी सरकार में रक्षा मंत्री (मार्च १९८९-जनवरी १९९३) थे, उसी कार्यकाल में पनामा पर अमेरिकी आक्रमण और आपरेशन डेज़र्ट स्टोर्म की योजना को अमली रूप दिया गया. (....जारी)----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
उस समय उसके पास एक अरब डालर से भी अधिक के कान्ट्रेक्ट थे. इराक-वार में सैनिकों के अतिरिक्त निजी सिक्योरिटी एजेंसी के एक लाख गार्ड्स महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे थे.
हाल की खबर के अनुसार नाटो के सैनिकों से भी पहले इसी एजेंसी के लगभग २५ हज़ार गार्ड्स लीबिया के बेन्गाज़ी में उतारे जा चुके है. नाटो-आपरेशन के बाद तेल के भंडारों और कुंवों का अधिकरण करते ही इनकी तादाद एक लाख तक पहुँचने की संभावना है. इराक युद्ध में इस एजेंसी के एक लाख सुरक्षा-कर्मियों ने नाटो सेना के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
अफगानिस्तान में युद्ध से पूर्व इसी एजेंसी के सुरक्षा-सैनिकों ने हजारों अफगान लड़ाकों की हत्या कर नाटो के लिए वातावरण तैयार कर दिया था. इस एजेंसी का नाम है ब्लैक वाटर फ़ोर्स जिसका मुख्यालय अमेरिका स्थित नार्थ केरोलीना के क्षेत्र म्यूक में स्थित है. उसका मालिक ३८ वर्षीय एरिक प्रिंस दुनिया भर में दहशत का पर्याय बन चुका है और जिससे इराक का हर नागरिक नफरत से उबल पड़ता है.
ब्लैक वाटर फ़ोर्स दरअसल अमेरिकी सेना का एक निजी विंग है जिसके सैनिकों को ब्लैक वाटर फ़ोर्स नामक एजेंसी से किराये पर लिया जाता है. इराक-वार में इस एजेंसी को अमेरिकी सरकार से २७ मिलियन डालर का ठीका मिला था. यह ठीका अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा सन २००३ में उसे इराक स्थित अमेरिकी राजदूत पाल्ब्रेमर की सुरक्षा के लिए दिया गया था क्योंकि तब अमेरिका की बुश सरकार की ओर से पाल्ब्रेमर को इराक की तत्कालीन अंतरिम सरकार (मई २००३ से जून २००४ तक ) के प्रमुख के रूप में बगदाद भेजा गया था.
बग़दाद पर कब्ज़ा कर लेने के बाद ब्लैक वाटर फ़ोर्स के सैनिकों ने सरेआम लूट, अपहरण, बलात्कार और बगदाद स्कवैर कत्लेआम का ऐसा नंगा नाच दिखाया कि मानवता की रूह तक काँप-काँप उठी.
इन स्थितियों में तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री नूरी अलमालिकी को ब्लैक वाटर फ़ोर्स की कारगुजारियों के विरुद्ध अमेरिकी सरकार से शिकायत करनी पड़ी तो जवाब में बुश सरकार की विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राईस ने आवेश में आकर प्रधानमंत्री नूरी अलमालिकी से माफ़ी मांगने को कहा. यह बेहद दुर्भावनापूर्ण घटना थी.
इससे ब्लैक वाटर फ़ोर्स के हौसले और भी काफी बुलंद हो गए. इराक में उसके द्वारा की जाने वाली वारदातों पर उसका नारा बेहद भयानक था, यहाँ आज जो होगा, वह आज ही समाप्त हो जायेगा/कल कोई याद भी नहीं रखेगा.
इस एजेंसी की इराक में निर्भीकता का हाल यह था कि जब वाशिंगटन पोस्ट के पत्रकार ने एजेंसी के एक गार्ड अधिकारी को उसकी एजेंसी के करतूतों की याद दिलाई और अमेरिकी सरकार की जवाबदेही का भय दिखाया तो उसने स्पष्ट शब्दों में कहा, हमसे कहा जाता है कि यदि किसी कारण कभी कुछ हो भी जाता है और इराकी तुम पर मुकद्दमा कर देते हैं, तो क्या होगा? अधिक से अधिक तुम्हें कार में डालकर रात के अँधेरे में सरहद पार छोड़ दिया जायेगा. इराक में मूलतः हुआ भी यही.
ब्लैक वाटर फ़ोर्स (जिसे ज़ी के नाम से जाना जाता है) के इस दुस्साहस के पीछे अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डिक्चेनी थे. डिक्चेनी ने ही अपने कार्यकाल के दौरान फ़ौज में निजी फौजी ब्यूरोक्रेसी के व्यवसाय को बढ़ावा दिया.
यह वह समय था जब अंतर्राष्ट्रीय सेनाएं अमेरिकी सेना के नेतृत्व में उसके साथ मिलकर १९९१ का खाड़ी युद्ध लड़ रही थीं. यहूदी (ज्यूस इंस्टीटयूट आफ नेशनल सिक्योरिटी अफेयर्स के सदस्य) डिक्चेनी की कंपनी ने बाल्कन विवाद (१९९०) के रहते और स्वो (1999) में भारी मुनाफा कमाया.
क्लिंटन प्रशासन ने जब सर्बों के विरुद्ध क्रोशिया की सेना को प्रशिक्षण देने के लिए १९९० के उत्तरार्द्ध में आर्मी कंसल्टिंग फर्म वर्जीनिया की मिलिट्री प्रोफेशनल रिसोर्स इनकार्पोरेटेड को ट्रेनिंग का ठीका दिया जिसे अमेरिका के रिटायर्ड सैनिक अधिकारी संचालित कर रहे थे, तो बात साफ हो गई कि अब सेना के सामानांतर निजी क्षेत्र की सुरक्षा सेना से भी सेवाएं ली जा सकेंगीं.
वार आन टेरर की यह एक शुरुआत थी. अभिन्न मित्र डोनाल्ड रम्सफील्ड तब अमेरिकी सरकार में रक्षा मंत्री थे. किराये के सैनिकों की खपत उसी कार्यकाल में शुरू हुई, पहले कम, फिर अधिक.
१९९३ में डिक्चेनी के सेवानिवृत होने से पूर्व उन्होंने फौजी ब्यूरोक्रेसी के सामानांतर प्राइवेट फौजी ब्युक्रेसी को प्रतिष्ठापित कर आगे चलकर हेलीबर्टन कंपनी के सीईओ बन गए. यह एक अमेरिकी सुरक्षा के दुर्ग की निजी सुरक्षा कांट्रेकट एजेंसी थी और जब डिक्चेनी अमेरिकी सरकार में रक्षा मंत्री (मार्च १९८९-जनवरी १९९३) थे, उसी कार्यकाल में पनामा पर अमेरिकी आक्रमण और आपरेशन डेज़र्ट स्टोर्म की योजना को अमली रूप दिया गया. (....जारी)----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
सोमवार, 21 मार्च 2011
अजमेर दरगाह बम में योगी का हाथ!/ जागरण
जयपुर [नरेंद्र शर्मा]। अजमेर दरगाह में हुए बम विस्फोट मामले में एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ और आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी सुनील जोशी ने विस्फोट को अंजाम देने के लिए धन की व्यवस्था कराई थी। बम धमाकों के लिए धन उपलब्ध कराने वाले भरत भाई ने योगी और सुनील जोशी के कहने पर ही धन की व्यवस्था की थी। इस मामले की जांच कर रही सीबीआइ और एसओजी [विशेष कार्य दल] के अधिकारियों ने दो दिन पहले इस बारे में राजस्थान के गृहमंत्री शांति धारीवाल को बताया।
पता चला है कि दस्तावेजों में योगी आदित्यनाथ, सुनील जोशी के साथ ही आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं। सूत्रों के मुताबिक एसओजी और राजस्थान पुलिस को इंद्रेश कुमार एवं सुनील जोशी के प्रदेश के कुछ खास सहयोगियों के बारे में भी जानकारी मिली है। इन सहयोगियों ने दरगाह बम विस्फोट के बाद आरोपियों को बचाने में अहम भूमिका निभाई थी। गौरतलब है कि अजमेर दरगाह में 11 अक्टूबर, 2007 को बम विस्फोट हुआ था।
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विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
रविवार, 20 मार्च 2011
तेल संपदा पर कब्जा करने की अमेरिकी साज़िश
कराकस:वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने कहा है कि लीबिया पर की जा रही कार्यवाई उसकी तेल संपदा पर कब्जा करने की अमेरिकी सहित कुछ देशों की यह एक शुरुआत है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थन प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय सेनाओं के हस्तक्षेप की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा है कि वह इस कार्रवाई को लीबिया की तेल संपदा पर कब्जे के अमेरिकी प्रयास के रूप में देखते है।उन्होंने कहा कि यह बेहद खेदजनक है क्योंकि जहां युद्ध में अनेक मासूम लोगों की जानें जायेंगीं, वहीं कई और युद्ध दुनिया पर लद जायेंगे जिसमें हजारों-लाखों लोगों की जानें चली जायेंगीं. यह युद्धों का फोबिया है।
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को साम्राज्य के नाम से संबंधित करने वाले शावेज ने कहा कि साम्राज्य लोगों की जान की कितनी परवाह करता है? अफगानिस्तान और गाजा में हमलों को देखिए जिनमें हजारों लोग मारे गए। वह केवल लीबिया का तेल चाहते है। उन्होंने इस हस्तक्षेप को वैध बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की भी आलोचना की।
शावेज ने कहा कि यह दुखद है कि संयुक्त राष्ट्र ने स्वयं को युद्ध में शामिल किया और अपने मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा कि क्या लीबिया में गृहयुद्ध हो रहा है। हमनें देखा है कि विद्रोही तोपें चला रहे हैं और अब नाटो और अमेरिका की सेनाएं उनका समर्थन कर रही है। यह एक देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है। उधर अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेना ने लीबिया के रक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर मिसाइलें दागीं और बमबारी की। हमले से बौखलाए लीबियाई नेता मुअम्मर गद्दाफी ने बदला लेने की धमकी दी है।
अमेरिकी सेना का कहना है कि अमेरिका और ब्रिटेन के युद्धपोतों तथा पनडुब्बियों से लीबिया के 20 से अधिक तटीय ठिकानों पर 112 टोमाहॉक मिसाइलें दागी गईं। फ्रास के विमानों ने भी विद्रोहियों के कब्जे वाले पूर्वी लीबिया में कई स्थानों पर बमबारी की। गठबंधन सेना की इस कार्रवाई को 'ऑपरेशन ओडिसी डॉन' नाम दिया गया है। अलजजीरा के मुताबिक हवाई हमले में लीबिया के कई टैंक और सैन्य वाहन क्षतिग्रस्त हो गए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लीबिया को उड़ान निषिद्ध क्षेत्र (नो फ़्लाई ज़ोन) घोषित करने के मसौदे पर मतभेद उभरकर सामने आ गए हैं.
कर्नल गद्दाफ़ी के विरोधियों पर वायु हमलों को रोकने के लिए ये मसौदा पेश किया गया था.ब्रिटेन और फ्रांस ने गुरुवार इस पर मतदान के जोर दे रहे थे जबकि रूस और चीन किसी भी सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने के लिए तैयार नहीं हैं.
ब्रिटेन और फ्रांस का कहना है कि अरब लीग ने इस तरह के उपायों का आग्रह किया था जिसके बाद उन्होंने यह प्रस्ताव पेश किया है.
बीबीसी समाचार के अनुसार अमरीकी की संयुक्त राष्ट्र में राजदूत सूसन राइस का कहना था कि सुरक्षा परिषद को उड़ान निषिद्ध क्षेत्र से कहीं आगे की कार्रवाई पर विचार करना चाहिए.
हालांकि अमरीका ने लीबिया पर आर्थिक पाबंदियों को और कड़ा करते हुए विदेश मंत्री मूसा कूसा और लीबिया की 16 सरकारी कंपनियों की परिसंपत्तियों को सील कर दिया है.
जबकि रूस और चीन ने लीबिया में संघर्ष विराम की अपील का समर्थन किया है. जर्मनी का कहना है कि अब भी लीबिया में कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है.
इस बीच लीबिया में कर्नल गद्दाफ़ी के वफ़ादारों और विद्रोहियों के बीच संघर्ष जारी है.
कर्नल गद्दाफ़ी के वफादार सैनिक ज़मीन और हवाई हमलों के ज़रिए अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब हो रहे हैं और पूर्व दिशा में आगे बढ़ते जा रहे हैं.
लड़ाकू विमानों ने अज़दबिया शहर के बाहर भयंकर बमबारी की है और अब कर्नल गद्दाफ़ी के वफ़ादारों के लिए बेनगाज़ी को विद्रोहियों के कब्ज़े से छु़ड़ाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी का कहना है कि बड़ी संख्या में लीबिया के नागरिक देश छोड़ रहे हैं और मिस्र में प्रवेश कर रहे हैं.
एजेंसी के अनुसार अब तक माना जा रहा था कि वही लोग लीबिया छोड़ रहे हैं जो काम की तलाश में अपने इलाक़े छोड़ते थे लेकिन अब आम लोग,औरतें और बच्चे भी इलाक़े छोड़ रहे हैं.
उधर पश्चिम में कर्नल गद्दाफ़ी के वफ़ादारों को बहुत सफलता मिली है और वो ट्यूनीशिया की सीमा से लगी ज़ुवारा में दोबारा अपना नियंत्रण स्थापित करने में सफल रहे हैं.
नचिकेता कपूर का सच/ चौथी दुनिया
चौथी दुनिया की तहकीकात से नचिकेता कपूर के बारे में चौंकाने वाली जानकारियां मिली हैं. चौथी दुनिया के पास वो सबूत हैं जिससे ये साबित होता है कि नचिकेता कपूर ने अपनी पढाई लिखाई का गलत ब्यौरा देकर एक मंत्रालय में उच्च पद हासिल किया. चौथी दुनिया के पास डिपार्टमेंट ऑफ पर्सोनेल एंड ट्रेनिंग यानी डीओपीटी का वो दस्तावेज हैं जिसमें लिखा है कि भविष्य में कभी किसी संवेदनशील प्रकृति के पद पर नियुक्ति के लिए इस व्यक्ति के नाम पर विचार न किया जाए. दरअसल, युवा कांग्रेस से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले नचिकेता कपूर बड़े लोगों से संबंध बनाने में शुरू से माहिर रहा है. ये htpp://samagravicharmunch.blogspot.comनचिकेता कपूर वो ही हैं जिसका नाम विकिलीक्स के खुलासे से चर्चा में आया है. इसपर आरोप है कि उसने 2008 में सरकार बचाने के लिए सांसदों को खरीदने की कोशिश की. 2005 में जब जे एन दीक्षित राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने, तब कपूर की एंट्री एनएससी यानी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में रिसर्च अधिकारी के तौर पर हो गई. इसके बाद तो नचिकेता कपूर तरक्की की सीढ़ियां चढ़ता गया. ठीक एक साल बाद यानी मई 2006 में नचिकेता कपूर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में रेणुका चौधरी (मंत्री, स्वतंत्र प्रभार) का ओएसडी (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) बन गया. बाकायदा इस संबंध में प्रशिक्षण एवं कार्मिक विभाग एवं मंत्रालय की ओर से नचिकेता कपूर को ओएसडी नियुक्त करने के लिए पत्र भी जारी किए गए. पुलिस वेरीफिकेशन तक हुआ. अंतत: कपूर ओएसडी बन भी गया. लेकिन ओएसडी बनने के लिए नचिकेता कपूर ने जो दस्तावेज पेश किए, वह असल में फर्जीवाड़े का एक अद्भुत उदाहरण थे. चौथी दुनिया के पास नचिकेता कपूर के शैक्षणिक रिकॉर्ड से जुड़े दो अलग-अलग तरह के दस्तावेज हैं. एक में लिखा है कि उसने दिल्ली पब्लिक स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया है. जबकि ओएसडी बनने के समय उसने मंत्रालय में जो रिकॉर्ड प्रस्तुत किया, उसमें प्रारंभिक शिक्षा तो दिल्ली पब्लिक स्कूल से ही, लेकिन स्नातक नेशनल ओपेन स्कूल से करने की बात ![]() दर्ज है. अब इसमें सही क्या है और गलत क्या, यह तो जांच के बाद ही पता चल सकता है.सितंबर 2008 में अचानक डीओपीटी की ओर से एक पत्र महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भेजकर यह सूचित किया जाता है कि कैबिनेट की अप्वायंटमेंट कमेटी ने मंत्रालय में निदेशक स्तर एवं वेतनमान के लिए नचिकेता कपूर की नियुक्ति को सहमति नहीं दी है और यह आदेश 6 अगस्त, 2007 से लागू किया जा रहा है. इस पत्र में यह भी स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि आगे से भविष्य में किसी भी संवेदनशील प्रकृति के पद पर नियुक्ति के लिए नचिकेता कपूर के नाम पर विचार न किया जाए. इसके बाद कपूर की मंत्रालय से भी विदाई हो गई. लेकिन दिलचस्प रूप से राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति ने कपूर को समिति में शामिल किया और उसे डीडीजी (प्रोटोकॉल) का पद दे दिया. जाहिर है, आयोजन समिति ने यह निर्णय लेते वक्त डीओपीटी के उक्त पत्र में दिए गए निर्देश पर ध्यान नहीं दिया. बहरहाल, ये सारे मामले कुछ सवाल खड़े करते हैं. मसलन, पीएमओ के तहत आने वाली एनएससी में नचिकेता कपूर जैसे व्यक्ति की नियुक्ति किसने और कैसे की? ओएसडी पद से कपूर को हटाया तो गया, लेकिन डीओपीटी ने यह क्यों नहीं बताया कि आखिर किन वजहों के आधार पर कपूर को हटाया गया? और कपूर के पास ऐसी क्या योग्यताएं थीं कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति को उसे अपने यहां नियुक्त करना पड़ा? जाहिर है, पूरे मामले की जांच होनी चाहिए, ताकि सच सामने आ सके. |
- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
होली मुबारक
हुस्न के रंग हैं, मस्ती है, ठिठोली है/
उंगलियाँ काँप सी जाती हैं मैं छूता हूँ अबीर,
मेरे एहसास को डस्ता है जो छूता है समीर/
ये भी देखो कि सुनामी ने कहर ढाया है/ खून से जेह्न को तेज़ाब से भर लाया है/
आओ! जिंदा हैं जो तूफां के थपेड़े सहकर,
उनके सदमों के घरौंदों को मुनव्वर करदें/ मकसदे-ज़ीस्त को एक और ही मआनी दे दें.
ये सुनामी तो क़यामत की कोई देवी है,
जब भी आती है, दबे पांव चली आती है/
लोग जब नींद की आगोश में सोते हैं कहीं,
चांदनी रात में ये सबको निगल जाती है./
ऐ मेरे दोस्त मेरे दिल में बड़ी हलचल है,
जब भी ख्वाबों के घरौंदों को नज़र लगती है,
जब ज़मीं उठके समंदर को सज़ा देती है,
चाँद झुकता है समंदर को मनाने के लिये,
फिर जो आती है क़यामत की तबाही ऐ दिल,
कांच की तरह सभी रंग बिखर जाते हैं,
आग और खून में अरमान पिघल जाते है.
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बुधवार, 9 मार्च 2011
'अल्लाहुम्मा लब्बैक'/एकांकी नाटक/आफताब हसनैन
'अल्लाहुम्मा लब्बैक' यानि 'या अल्लाह मैं हाज़िर हूँ.' यह शीर्षक है जाने-माने साहित्यकार आफताब हसनैन द्वारा लिखित एकांकी नाटक का. आज के सन्दर्भ में भी इस नाटक की उपादेयता कम नहीं है. नाटककार के सम्बन्ध में विजय तेंदुलकर से लेकर शाहिद लतीफ़ तक और मीम नाग से लेकर राजेश विक्रांत तक ने बहुत कुछ लिखा है. नाटककार का यह एकांकी उर्दू और हिंदी, दोनों ही भाषाओँ में प्रकाशित हुआ है जिसे मुंबई स्थित सारांश साहित्य मंदिर ने प्रकाशित किया है. विषय की सामग्री में यदि मौलिकता और रचनात्मक चिंतन का उत्स हो तो वह रचना समाज को बेहतर सन्देश दे जाती है.यदि रचनात्मकता में ध्वंसा- त्मतक चिंतन और उपहास उड़ाने का प्रायोजित इरादा हो तो वह रचना समय और काल के गर्त में कहीं खो जाती है जैसा कि हिंदी-उर्दू रचनाकारों की कुछ चर्चित रचनाओं के साथ अतीत में हो चूका है. सेटेनिक वर्सेज़ एक प्रायोजित रचना थी जिसके प्रकाशक को अपनी मार्केटिंग के तेहत बेचना था. किसी समय में आबिद सुरती ने भी काली किताब लिखकर साहित्य जगत में भूचाल सा ला दिया था. लेकिन अल्लाहुम्मा लब्बैक नाटक उस घटिया मार्केटिंग की रणनीति और अवसरवादी विचारधरा से बहुत ऊपर अपना स्थान बना चूका है, यही उसकी लोकप्रियता का प्रमाण है. इसके माध्यम से लेखक ने धार्मिक विसंगतियों पर बेहद बेबाकी के साथ अपनी आवाज़ बुलंद की है. दो दृश्यों पर आधारित यह नाटक निश्चय ही अपनी तमाम मौलिक्ताओं, चिंताओं और सरोकारों के साथ भारतीय रंग-मंच के इतिहास में मील के पत्थर की हैसियत लिए रहेगा. विषय के एतबार से इस एकांकी में मुस्लिम समुदाय की कथित विखंडित एकता के माध्यम से जो वैचारिक चिंतन और मारक व्यंग्य प्रस्तुत किया गया है. वह पाठक और मंचीय दर्शक को सोचने पर विवश कर देता है. इसकी सामयिक उपादेयता यह है कि आज अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय विखंडन और राजनीतिक केयास का सामना कर रहा है. पंथों और समुदायों के अनेक मदारी जन्म ले चुके हैं, उनकी अपनी ढपलियाँ बज उठी हैं, अपने राग-द्वेष और आस्थाओं की बिसात पर चौसर और चौगान के दांव-पेंच खेले जाने लगे हैं. इस्लाम की ओट में अशिक्षित पेशेवर मुसलमानों ने उद्देश्यहीन आतंकवाद को पेशे के रूप में प्रायोजित करना शुरू कर दिया है.यह भावी नस्लों के लिए एक खतरनाक भविष्य को जन्म देने का रास्ता है जिसकी रसद को रोकना और आतंकवाद पर अंकुश लगाना बेहद ज़रूरी है. लेखक के अनुसार 'हम इस्लाम को तो मानते है, इस्लाम की नहीं मानते.' कुरआन को तो मानते है, कुरआन की नहीं मानते', अल्लाह और रसूल को तो मानते हैं, अल्लाह-रसूल की नहीं मानते.' यही वैचारिक पलायन मुस्लिम समुदाय के विघटन का कारण है. भारतीय परिपेक्ष में भारतीय मुसलमान वैसे भी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है और उसकी युवा पीढ़ी अपने स्थायित्व का संघर्ष कर रही है, जिसे बेहतर रोज़गार की जरूरत है, बच्चों और लड़कियों को शिक्षा और व्यावसायिक हुनर की ज़रुरत है, किन्तु इस्लाम का अर्थ न समझने वालों को हज की ज्यादह ज़रुरत है, यही जेहालत कौम को आगे बढ़ने नहीं देना चाहती. इस्लाम सामाजिक समरसता की बात करता है लेकिन मुसलमान कबीलाई निजाम को जिंदा रखना चाहता है, जो कभी भी कौमों को एकता के सूत्र में नहीं बांध सकता. यह एकांकी इसी दर्द का मर्सिया है जो रुलाता भी है, झिंझोड़ता भी. शर्मिंदा भी करता है और चैतन्य भी. ऐसे नाटक हर दौर में जिंदा रहते हैं. क्योंकि इसका स्वाभिमान रसूल (स.) के ज़माने में भी था और इमाम हुसैन (स) की शहादत के समय कर्बला में भी. जो कौमें स्वाभिमान से खाली हो जाती हैं, वे इतिहास में जगह नहीं बना पाती हैं और हम इतिहास के मकबरों, हुजरों, आस्तानों में बेगरज उठते लोबान के धुवों में भटकते रह जाते है. पाठकों को एकबार यह नाटक अवश्य पढना चाहिए. ---समीक्षक:रंजन जैदी -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. विचार, व्यक्ति के चिंतन-मनन और मंथन से छाछ बनकर प्रकट होते हैं. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --प्रबंध संपादक
रविवार, 6 मार्च 2011
भ्रूण-हत्या के कारण/नीना गर्ग
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| नीना गर्ग |
मुक्ति और बंधन दो अलग अनुभूतियो की स्थितियां हैं. पुत्री होने से मुक्ति नहीं होती.यह खोखला चिंतन है. इसमें अनुभूति का पहलू यह है कि पुत्री दूसरे के घर जाती है तो स्त्री-धन भी साथ ले जाती है. इसीलिए उसे लक्ष्मी कहा जाता है.जहाँ जाती है वहां लक्ष्मी का योग बढ़ जाता है. जहां से जाती है, वहां धनयोग कम हो जाता है. यही आभाव का चिंतन पिता को भयग्रस्त करता रहता है. माँ इसीलिए स्त्रीधन का शुरू से संचय करना प्रारंभ कर देती है. दान में चूँकि अदृश्य-पुण्य के भाव छुपे होते हैं और दान वापस नहीं लिया जाता है, इसलिए कन्या को दानकर उससे एक तरह से मुक्ति पा ली जाती है. पुण्य भी लाभ का वैकल्पिक पर्यायवाची है, इसलिए इस दान से भी लाभ मिल जाता है, जैसे गऊ-दान से कथित स्वर्ग के मिलने, अगले बेहतर जन्म का लोभ और अदृश्य शक्तियों से बचे रहने का लालच सन्निहित है, वैसे ही कन्या से परिवार के बनने की व्यवस्था जुड़ी रहती है. वह पुत्रों को जन्म देकर पुरुषत्व के अहम् को संतुष्ट करती है. कन्या को भी एकतरह से गाय ही कहा जाता है. गाय से बछड़ा और दूध मिलता है, कन्या से शारीरिक-सुख और वंश को आगे बढ़ाने का सुख प्राप्त होता है. यही लाभ के अदृश्य स्रोत हैं. भय मनुष्य को कमज़ोर करता है, कन्या, असंख्य-भय और आशंकाओं को जन्म देती है. पुत्र शुभ-लाभ है, पुत्री हानि. लाभ पुत्र से है जो घर में लक्ष्मी लाता है, इसी लिए दीपावली में शुभ-लाभ शब्द की पूजा होती है, हानि की नहीं. हानि का शाब्दिक पर्याय भय है. मनुष्य भय-मुक्त रहना चाहता है. जहां स्त्री-सत्तात्मक-परिवार होते हैं, वहां स्थिति इसके विपरीत होती है. स्पष्ट हुआ कि यह व्यवस्था पूर्णरूप से आर्थिक मुद्दों से जुड़ी हुई है.अर्जुन का विवाह राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा से हुआ था. कुल की परंपरा उसी से चली थी. महाभारत से पता चलता है कि जिन राजाओं के पुत्र नहीं थे, उन्हें यह आदेश था कि वे अपनी पुत्री का अभिषेक करें. व्यास ने तो यहाँ तक कहा है कि बेटी तो दया के योग्य होती है. यदि उसके द्वारा तुम्हारा तिरस्कार हो रहा हो तो सह लो. भीष्म ने दत्तक-पुत्र की तुलना में सगी बेटी को धनाधिकारी माना है. यति की पुत्री थी माधवी, उसी ने अपने पिता को स्वर्गलोक में स्थान दिलाया. सैकड़ों-हजारों पुत्रों ने राग, द्वेष व संपत्ति और सता के लिए अनेक संघर्ष किये, रक्त बहाया. इसके विपरीत सावित्री ने अपने श्वसुर को नेत्र-ज्योति दी, राज दिया, पति को यमराज से मुक्ति दिलाई. किन्तु समाज इस स्थिति को नकार जाता है. फिर भी बेटियां मनुष्य को आज भी अनेक आशंकाओं से घिरा हुआ महसूस कराती है. भ्रूण-हत्याएं इसी का प्रमाण हैं. भ्रूण ----------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. विचार, व्यक्ति के चिंतन-मनन और मंथन से छाछ बनकर प्रकट होते हैं. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --प्रबंध संपादक
शनिवार, 5 मार्च 2011
आधारहीन सोच और तथ्यहीन चिंतन-2/नीना गर्ग
पाकिस्तान का जन्म कैसे और क्यों हुआ, (कहने को हम कुछ भी कहें) इसके रहस्यों पर अभी भी परदे पड़े हुए हैं और हो सकता है कि आने वाली नस्लें ऐतिहासिक दस्तावेजों के मलबे से कोई चौकाने वाले रहस्योद्घाटन करें, लेकिन अभी शायद इसका समय नहीं आया है. निश्चय ही यह एक बड़ी त्रासदी ही कही जा सकती है जिसमें दोनों तरफ से लगभग ५ लाख लोग मारे गए थे. बख्त को समझना चाहिए कि भारत में रहने वालों ने कभी अपनी सीमाओं से बाहर आक्रमण नहीं किये. इसमें छोटे-छोटे गण, गणों में राजा और सामंत रहा करते थे, जिनकी अपनी अलग दुनिया होती थी और वे ही आपस में लड़ा करते थे. भारत के मानचित्र का विकास दो बार हुआ. एक-हिन्दू पीरिएड (चन्द्रगुप्त का शासनकाल) में, और दो-मुगलों के शासनकाल में. तब सीमाएं (अफगानिस्तान) समरकंद, बुखारा और खुरासान तक थीं. ये नक़्शे अरावली की पहाड़ियों तक को दर्शाते हैं. विदेशियों के आने का रास्ता खैबर का दर्रा था. इस रास्ते पर लड़ाकू कबायलियों की बस्तियां और छोटी-मोटी रियासतें थी. उनके अपने पारंपरिक रीति-रिवाज थे, अलग रहने और जीने के विशिष्ट तरीके थे. बर्बर कबीलों से उनकी आये-दिन झडपें होती रहती थीं क्योंकि हिमालय के उसपार की बर्बर नस्लें चरागाहों की तलाश में अक्सर खैबर के दर्रों को पार कर अन्दर आ जाया करती थीं. आपस में भी कबीले रोटी-बोटी के इशू पर अक्सर भिड जाया करे थे. इसलिए इन्हें संगठित करना आसान काम नहीं था. बहुत बाद में महाराजा रणजीत सिंह को भी इसका सामना करना पड़ा था. मुगलों के आक्रमणों में नस्ली तौर पर तुर्क और अफगान लड़ाकू ज्यादा हावी थे. संयोग से विभाजन के दौरान कई कबायली नस्लें एक-दूसरे के सामने अजनबियों की तरह खड़ी हो गई थीं. पंजाब का मुसलमान खुद को सिक्खों और पंजाबियों से अलग नहीं देखना चाहता था. आज़ादी के बाद भी ऐसी मुहब्बतें कायम रहीं. साहिर लुधियानवी पंजाबी थे, इसलिए फिल्म-इंडस्ट्री की पंजाबी लोबी के वह हमेशा सितारे रहे. मोहम्मद रफ़ी, दिलीप कुमार, नूरजहाँ जैसे कलाकार पंजाबी होने के कारण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के चहीते बने रहे. आज भी जो पाकिस्तानी कलाकार भारत आता है, उनमें पंजाबी अधिक होते हैं. राजकपूर ने नुसरत फ़तेह अली खां को अवसर दिया. उनके बेटे को बालिवूड ने. पाकिस्तानी कलाकारों में अधिकतर पंजाब प्रान्त के ही होते हैं. पाकिस्तान में भी यही स्थिति है. कबायली क्षेत्र के कलाकारों की आमदरफत नहीं के बराबर है. अफगानिस्तान से गहरा सम्बन्ध होते हुए भी अफगानी भारतीयों से खुला रिश्ता नहीं बना पाता है. जो हिदुस्तानी विभाजन के दौरान या बाद में पाकिस्तान गए, उनमें अधिकतर पूर्वी उत्तर, बिहार और मध्य प्रदेश के निवासी पाकिस्तान के सिंध प्रदेश में जाकर बस गए. उन्हें न तो पाकिस्तान के पंजाबियों ने पसंद किया और न ही सिंधियों ने. ये स्थिति आजतक बरक़रार है. यदि उन्हें वहां की मेन-स्ट्रीम में यदि थोड़ी-बहुत जगह मिली तो मात्र उर्दू के कारण क्योंकि उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है. भारत में उर्दू को शायद यही सदमा आजतक झेलना पड़ रहा है कि वह भारत की होते हुए भी उसे पाकिस्तान के सिपुर्द कर दिया गया जहाँ वह आज भी एक महाजिर की तरह किताबों के पन्नों में जी रही है. जो भी उर्दू अदब के नाम पर आवाज़ बुलंद करता है, वह रान्दयेदर्गाह हो जाता है. भारत में उर्दू की स्थिति से लगभग सभी परिचित हैं. तो! पाकितान बना अवश्य, किन्तु उसमें स्थिरता कभी नहीं आ सकी. वहां की पेचीदा भौगोलिक, राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वहां कभी स्थिरता नहीं आ सकेगी, बंगलादेश का विभाजन इसका प्रमाण है. चूंकि पाकिस्तान अनेक कबायलियों के जर्गों का एक मुस्लिम देश है, इसलिए इस्लाम का दर्शन भी उन्हें एक सूत्र में नहीं पिरो सकता है. भारत के मुसलिम समुदायों में ऐसा नहीं है. यहाँ शुरू से लोकतंत्र रहा है. यहाँ मुलतः दो समुदाय हैं, शिया और सुन्नी. पाकिस्तान में शिया समुदाय सुरक्षित नहीं है. कादियानों को काफ़िर घोषित किया जा चुका है.पख्तून और पठानों के कबीले अफगानिस्तान से रिश्ता बनाये रखना बेहतर समझते हैं. लेकिन उनमें कबीलों के झगडे है. कुल मिलाकर पाकिस्तान आग के दहाने पर रहता है. इसलिए न तो वहां लोकतंत्र पनप पाता है और न ही सैनिक तंत्र. सामरिक दृष्टि से ये देश अमेरिका और चीन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण देश है. इसीलिए इस देश में CIA, मोसाद, & KGB की गतिविधियाँ जारी रहती है. तालिबान के उदय के बाद तो यहाँ और भी हलचलें बढ़ गयी हैं. अफगानिस्तान में अमेरिका सक्रिय है ही, उसके १५ हज़ार मेरीन पाकिस्तान में सक्रिय है. ये मोटे-मोटे खुलासे हैं. ऐसी स्थिति में भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है. भारत में मुसलमानों की आबादी २० करोड़ है, पाकिस्तान की १४ करोड़. गत ६० वर्षों में वहां का मुस्लमान दंगों, राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता के बटवारे के लिए ही लड़ता रहा है. इसलिए वह आज तक संघर्ष कर रहा है. भारत के मुसलमानों का विकास उसकी अपनी कोताही और पिछड़ेपन के कारण नहीं हो पाया. यहाँ का एक धड़ा सउदी अरब जैसे मुस्लिम देशों के पैसे पर धर्मान्धता का प्रचार करता रहा. इससे आम मुस्लिम का विकास अवरुद्ध हो गया. सदियों की गरीबी, पिछड़ापन, धर्मान्धता ने उन्हें बादशाहों और नवाबी-रियासतों में भी गरीब रखा और आज भी वे गरीब और पिछड़े हुए है. आज़ादी के बाद भारतीय राजनीतिक पार्टियों की सरकारों की हुकूमतों ने उन्हें स्कूल जाने से कहीं नहीं रोका. सरसय्यद अहमद और डा. जाकिर हुसैन जैसे लोगों ने अपनी कौम को पढ़ाने के लिए पूरी जिंदगियां होम कर दीं. क्यों? बख्त को इस क्यों का जवाब अपने भीतर तलाशना होगा. (समाप्त) ये परदे उठाएं.विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -संपादक
बुधवार, 2 मार्च 2011
आधारहीन सोच और तथ्यहीन चिंतन/नीना गर्ग
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| नीना गर्ग |
२मार्च २०११ के नवभारत टाइम्स के पृष्ठ १४ पर जामिया का नया दर्जा मुसलमानों के लिए नुकसानदेह (लेखक-फ़िरोज़ बख्त अहमद) प्रकाशित हुआ है. इसी पृष्ठ पर संजय खाती के लेख भी छपते रहते हैं जिन्हें पढ़कर जर्नलिज्म के जिंदा होने का एहसास होता है. फ़िरोज़ बख्त अहमद के जब भी लेख नज़र आए हैं, वे मुस्लिम समाज का मर्सिया अधिक, बसंत के गीत कम लगे हैं. शायद मैं इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया न व्यक्त करती, किन्तु जेहालत जब मर्सिया बन जाये तो नबीना की ऑंखें भी डबडबा उठती हैं. मुसलमानों का मर्सिया पढ़कर उसे छपवाते रहना पैसा कमाने का जरिया और अतिवादियों को खुश करते रहना एक विकल्प तो हो सकता है, स्वस्थ पत्रकारिता नहीं हो सकती. समस्या यह है कि श्री बख्त अभी भी उस कुहासे से बाहर नहीं निकल पाए हैं जिसमें हिन्दू-मुस्लिम नफरत की धुंध घुली रहती है. जिस विषय पर वह लिखते हैं, उसपर असगर अली इंजीनियर, सईद नकवी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, कमर वहीद नकवी, रंजन जैदी, एहतशाम हुसैन, सईद अंसारी और दूसरे नामचीन मुस्लिम पत्रकार और लेखक कलम नहीं उठाते. जब भी इनके कलम उठे हैं तो बात दूर तलक पहुंची है. बख्त को तो यह भी नहीं मालूम है कि मैं भी अलीगढ मुस्लिम यूनीवर्सिटी की पढ़ी हुई हूँ और वहां हर कौम के लोग पढ़ते हैं और खुले ज़हन को लेकर दुनियाभर में फैल जाते हैं. मेरा नाम नीना गर्ग है और जिन लोगों का मैंने ऊपर ज़िक्र किया है उनमें कई नामवर लोग इसी यूनिवर्सिटी से ऊंची तालीम हासिल कर ऊंचे ओहदों तक पहुंचे है और वे लोग निश्चय ही संकीर्ण विचारधारा के नहीं हो सकते हैं. इसी तरह जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी का कल्चर रहा है. इसी तरह उस्मानिया यूनिवर्सिटी का कल्चर रहा है. मैं नहीं जानती कि बख्त कहाँ के पढ़े हैं. हो सकता है वह किसी जमाते इस्लामी या किसी ऐसे मदरसे से निकले हों जिसका सम्बन्ध सऊदी अरब के फंड से रहा हो. 60 वर्ष के बाद अब भी जो विभाजन के दिनों का रोना रोता है और भारत के विकास और उसके बढ़ते आर्थिक चरण की उपेक्षा करताहै, मुझे उसकी मानसिक स्थिति पर संदेह होता है. हिन्दू-मुस्लिम के पारस्परिक सौहार्र्द और प्रेम को समझने और जानने के लिए उन्हें दूर नहीं, इसी अख़बार के कार्यकारी संपादक श्री रामकृपाल सिंह के पास उठना-बैठना चाहिए जो बता सकेंगे कि हिन्दू-मुस्लिम एकता का क्या मतलब होता है. बख्त को मैं बताना चाहूंगी कि मुस्लमान खुद अपनी तरक्की का दुश्मन है. मुसलमानों में संस्कारित परिवारों का आभाव है और कारखानेदार वर्ग का फैलाव अधिक है. मिल या कारखानेदार मालिक को सस्ते मजदूरों की ज़रूररत होती है. मुस्लमान आसानी से सुलभ हो जाता है और मालिक हमेशा ऐसे कुशल सस्ते कारीगरों और वफादार मजदूरों को छोड़ना पसंद नहीं करता है, इसलिए उसे क़र्ज़ के एहसान से दबोच लेता है. वः उसके बच्चों को भी कम दे देता है ताकि वह लगा रहे और विकसित न हो सके. बहुत से कबाड़ी टाईप के लोगों के पास आज भी बहुत पैसा है लेकिन वह पढने से डरता है. कारन यह है कि कबायली निजाम ने उसके जेहन को कुंद कर दिया है. बख्त को मैं बताना चाहती हूँ कि इसके पीछे का इतिहास है कि मुस्लिम शासकों के ज़माने में तीन तरह के मुस्लमान थे. एक-जो एलीट था, वह शासक वर्ग से सम्बन्ध रखता था. दो-सैनिक थे, जिनसे पढाई का कोई सम्बन्ध नहीं था. तीन-जो कन्वर्जन के बाद मुस्लमान हुए थे और हिन्दू समुदाय से आए थे, वे फोर्थ क्लास के थे, जिनके नाम बख्त ने अपने लेख में गिनाएं हैं. वर्ग विभाजन मुस्लिम काल में भी था, आज भी है. ये सामाजिक व्यवस्था की नसेनियाँ रही हैं. सही मानों में ब्राह्मण समुदाय आज़ादी के बाद सम्पन्नता की ओर बढ़ा. कारण था सर्वशक्ति संपन्न प्रधानमंत्री नेहरु जी का कश्मीरी पंडित होना. विभाजन के तुरंत बाद से ही पीएम हॉउस को एक ऐसे काकस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया जो नेहरु जी और उनके परिवार को खुश रखने के लिए सदैव तत्पर रहता था. इस कमजोरी से ब्राह्मणों के एक अनुशासित और चतुर वर्ग ने लाभ उठाना शुरू कर दिया जिसमें अपनी मुक्ति की तलाश में भटकते रहने वाला डरा-सहमा वणिक वर्ग उसके साथ हो गया. बहुत से दलित शरणार्थी इस बहाव में ब्राह्मन बन गए. ब्रह्म-सभाएं बन गईं और अपढ ब्राह्मन यूवाओं को चपरासी की नौकरियां दे दी गईं जो अगले दस-पंद्रह साल में सेक्शन आफिसर बन गए. ज़मीनों के एलाटमेंट होने लगे, संस्कृत का नारा लगाकर ब्राह्मणों ने कालेज और यूनिवर्सिटिया और विद्यापीठ स्थापित कर लिए. व्यापारी वर्ग ने बैंको से अधाधुंध लोन ले-लेकर मिल और कारखाने खड़े कर लिए. कुल मिलाकर विकास का चक्र चलने लगा. ३५ करोड़ की आबादी एकअरब 20 करोड़ तक पहुँच गई.इसमें मुस्लमान (60 वर्षों में 16 करोड़) भी शामिल है.मुस्लमान चपरासी नहीं बने. मामला खोखले सामाजिक सम्मान का था. मुस्लिम काल में जो वर्ग तकनीकी में सक्षम था, वह परंपरागत रहा. इसलिए उसने स्कूल का रुख नहीं किया. हिन्दुवों में एक उम्मीद ज़रूर जगी कि पढाई उनके सामाजिक स्तर को ऊंचा उठा सकती है तो वे स्कूल जाने लगे. इसका मतलब यह नहीं लगाना चाहिए कि हिदुवों में लिटरेसी का रेट बढ़ गया. एलीट होते जा रहे ब्राह्मणों के एक वर्ग ने अपनी संस्थाओं में अपनी आगामी नस्लों के लिए रोज़गार के दरवाजे ज़रूर सुरक्षित कर लिए लेकिन 6 करोड़ देहि ब्राहमण बच्चों का संघर्ष आम यूवाओं जैसा ही था. फिर भी उनका आत्मविश्वास उन्हें निरंतर आगे ही ले जाता रहा. मुसलमानों का संघर्ष अनेक समस्याओं से ग्रस्त था. मुसलमानों को एक तरफ सांप्रदायिक दंगों को झेलते रहना था, रोज़गार की चुनौतियां थीं और अपने पिछड़े परिवेश को बदलते सामाजिक सरोकारों से आँख मिलाने और अपने स्थायित्व को कायम रखने के द्वंद्वों से जूझते रहना था. ऐसे में मुस्लिम एजुकेशनल संस्थाओं का योगदान काफी महत्वपूर्ण था. अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने यह भूमिका बखूबी निभाई. उसने छात्रों में आत्मविश्वास पैदा किया और एक ऐसी सेकुलर मानसिकता को जन्म दिया जिसने यूवाओं को हिन्दुवों के बीच ला खड़ा किया और साबित कर दिखाया कि वह बिना किसी गाड-फादर के अपनी योग्यता के बल पर अपना स्थान हासिल कर सकता है. (जारी.../-२) -----------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है.
मंगलवार, 1 मार्च 2011
खारे पानी की मछलियाँ तथा अन्य कहानियाँ/समीक्षा
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| लेखक:रंजन जैदी |
ये कहानियाँ आम आदमी का दर्द बयान करती हैं. हर कहानी को पढ़कर साफ़ हो जाता है कि कैसे सामाजिक आडम्बरों के कारण आम आदमी को पीछे धकिया दिया जाता है और वह हाशिये पर चला जाता है. जैसे उसकी जिंदगी और उसके कहे का कोई मतलब ही न रह गया हो. आम आदमी की इस लड़ाई ने जाने-अनजाने इंसानी जिंदगी को तमाम तरह की विषमताओं और विरोधों से भर दिया है. जैसे-जैसे आप इस किताब में शामिल कहानियों को पढेंगे, आपको उनका अक्स साफ़ नज़र आयेगा. बात साफ़ हो जाएगी कि इन कहानियों से आप का भी कुछ लेना-देना है, कुछ सरोकार है. कारण, आप भी एक आम आदमी हैं, जो इन कहानियों के आईने में अपनी तस्वीर भर देख रहा है. (किताब : खारे पानी की मछलियाँ तथा अन्य कहानियाँ, लेखक:रंजन जैदी, प्रकाशक: अरावली बुक्स इंटरनेशनल, नयी दिल्ली, कीमत:225.00 रूपये, पेज:१६४) ISBN : 978-81-8150-108-0 aravaliprinters@rediffmail.com
विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक:नीना गर्ग , उप- संपादक:इरम जैदी, संवाददाता:एम्.जे.जेड कम्मू
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