पाकिस्तान का जन्म कैसे और क्यों हुआ, (कहने को हम कुछ भी कहें) इसके रहस्यों पर अभी भी परदे पड़े हुए हैं और हो सकता है कि आने वाली नस्लें ऐतिहासिक दस्तावेजों के मलबे से कोई चौकाने वाले रहस्योद्घाटन करें, लेकिन अभी शायद इसका समय नहीं आया है. निश्चय ही यह एक बड़ी त्रासदी ही कही जा सकती है जिसमें दोनों तरफ से लगभग ५ लाख लोग मारे गए थे. बख्त को समझना चाहिए कि भारत में रहने वालों ने कभी अपनी सीमाओं से बाहर आक्रमण नहीं किये. इसमें छोटे-छोटे गण, गणों में राजा और सामंत रहा करते थे, जिनकी अपनी अलग दुनिया होती थी और वे ही आपस में लड़ा करते थे. भारत के मानचित्र का विकास दो बार हुआ. एक-हिन्दू पीरिएड (चन्द्रगुप्त का शासनकाल) में, और दो-मुगलों के शासनकाल में. तब सीमाएं (अफगानिस्तान) समरकंद, बुखारा और खुरासान तक थीं. ये नक़्शे अरावली की पहाड़ियों तक को दर्शाते हैं. विदेशियों के आने का रास्ता खैबर का दर्रा था. इस रास्ते पर लड़ाकू कबायलियों की बस्तियां और छोटी-मोटी रियासतें थी. उनके अपने पारंपरिक रीति-रिवाज थे, अलग रहने और जीने के विशिष्ट तरीके थे. बर्बर कबीलों से उनकी आये-दिन झडपें होती रहती थीं क्योंकि हिमालय के उसपार की बर्बर नस्लें चरागाहों की तलाश में अक्सर खैबर के दर्रों को पार कर अन्दर आ जाया करती थीं. आपस में भी कबीले रोटी-बोटी के इशू पर अक्सर भिड जाया करे थे. इसलिए इन्हें संगठित करना आसान काम नहीं था. बहुत बाद में महाराजा रणजीत सिंह को भी इसका सामना करना पड़ा था. मुगलों के आक्रमणों में नस्ली तौर पर तुर्क और अफगान लड़ाकू ज्यादा हावी थे. संयोग से विभाजन के दौरान कई कबायली नस्लें एक-दूसरे के सामने अजनबियों की तरह खड़ी हो गई थीं. पंजाब का मुसलमान खुद को सिक्खों और पंजाबियों से अलग नहीं देखना चाहता था. आज़ादी के बाद भी ऐसी मुहब्बतें कायम रहीं. साहिर लुधियानवी पंजाबी थे, इसलिए फिल्म-इंडस्ट्री की पंजाबी लोबी के वह हमेशा सितारे रहे. मोहम्मद रफ़ी, दिलीप कुमार, नूरजहाँ जैसे कलाकार पंजाबी होने के कारण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के चहीते बने रहे. आज भी जो पाकिस्तानी कलाकार भारत आता है, उनमें पंजाबी अधिक होते हैं. राजकपूर ने नुसरत फ़तेह अली खां को अवसर दिया. उनके बेटे को बालिवूड ने. पाकिस्तानी कलाकारों में अधिकतर पंजाब प्रान्त के ही होते हैं. पाकिस्तान में भी यही स्थिति है. कबायली क्षेत्र के कलाकारों की आमदरफत नहीं के बराबर है. अफगानिस्तान से गहरा सम्बन्ध होते हुए भी अफगानी भारतीयों से खुला रिश्ता नहीं बना पाता है. जो हिदुस्तानी विभाजन के दौरान या बाद में पाकिस्तान गए, उनमें अधिकतर पूर्वी उत्तर, बिहार और मध्य प्रदेश के निवासी पाकिस्तान के सिंध प्रदेश में जाकर बस गए. उन्हें न तो पाकिस्तान के पंजाबियों ने पसंद किया और न ही सिंधियों ने. ये स्थिति आजतक बरक़रार है. यदि उन्हें वहां की मेन-स्ट्रीम में यदि थोड़ी-बहुत जगह मिली तो मात्र उर्दू के कारण क्योंकि उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है. भारत में उर्दू को शायद यही सदमा आजतक झेलना पड़ रहा है कि वह भारत की होते हुए भी उसे पाकिस्तान के सिपुर्द कर दिया गया जहाँ वह आज भी एक महाजिर की तरह किताबों के पन्नों में जी रही है. जो भी उर्दू अदब के नाम पर आवाज़ बुलंद करता है, वह रान्दयेदर्गाह हो जाता है. भारत में उर्दू की स्थिति से लगभग सभी परिचित हैं. तो! पाकितान बना अवश्य, किन्तु उसमें स्थिरता कभी नहीं आ सकी. वहां की पेचीदा भौगोलिक, राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वहां कभी स्थिरता नहीं आ सकेगी, बंगलादेश का विभाजन इसका प्रमाण है. चूंकि पाकिस्तान अनेक कबायलियों के जर्गों का एक मुस्लिम देश है, इसलिए इस्लाम का दर्शन भी उन्हें एक सूत्र में नहीं पिरो सकता है. भारत के मुसलिम समुदायों में ऐसा नहीं है. यहाँ शुरू से लोकतंत्र रहा है. यहाँ मुलतः दो समुदाय हैं, शिया और सुन्नी. पाकिस्तान में शिया समुदाय सुरक्षित नहीं है. कादियानों को काफ़िर घोषित किया जा चुका है.पख्तून और पठानों के कबीले अफगानिस्तान से रिश्ता बनाये रखना बेहतर समझते हैं. लेकिन उनमें कबीलों के झगडे है. कुल मिलाकर पाकिस्तान आग के दहाने पर रहता है. इसलिए न तो वहां लोकतंत्र पनप पाता है और न ही सैनिक तंत्र. सामरिक दृष्टि से ये देश अमेरिका और चीन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण देश है. इसीलिए इस देश में CIA, मोसाद, & KGB की गतिविधियाँ जारी रहती है. तालिबान के उदय के बाद तो यहाँ और भी हलचलें बढ़ गयी हैं. अफगानिस्तान में अमेरिका सक्रिय है ही, उसके १५ हज़ार मेरीन पाकिस्तान में सक्रिय है. ये मोटे-मोटे खुलासे हैं. ऐसी स्थिति में भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है. भारत में मुसलमानों की आबादी २० करोड़ है, पाकिस्तान की १४ करोड़. गत ६० वर्षों में वहां का मुस्लमान दंगों, राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता के बटवारे के लिए ही लड़ता रहा है. इसलिए वह आज तक संघर्ष कर रहा है. भारत के मुसलमानों का विकास उसकी अपनी कोताही और पिछड़ेपन के कारण नहीं हो पाया. यहाँ का एक धड़ा सउदी अरब जैसे मुस्लिम देशों के पैसे पर धर्मान्धता का प्रचार करता रहा. इससे आम मुस्लिम का विकास अवरुद्ध हो गया. सदियों की गरीबी, पिछड़ापन, धर्मान्धता ने उन्हें बादशाहों और नवाबी-रियासतों में भी गरीब रखा और आज भी वे गरीब और पिछड़े हुए है. आज़ादी के बाद भारतीय राजनीतिक पार्टियों की सरकारों की हुकूमतों ने उन्हें स्कूल जाने से कहीं नहीं रोका. सरसय्यद अहमद और डा. जाकिर हुसैन जैसे लोगों ने अपनी कौम को पढ़ाने के लिए पूरी जिंदगियां होम कर दीं. क्यों? बख्त को इस क्यों का जवाब अपने भीतर तलाशना होगा. (समाप्त) ये परदे उठाएं.विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -संपादक
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