बुधवार, 9 मार्च 2011

'अल्लाहुम्मा लब्बैक'/एकांकी नाटक/आफताब हसनैन

मुंबई स्थित वाई.बी. चौहान हाल मै आयोजित पुरस्कार समारोह :अल्लाहुम्मा लब्बैक के पुरस्कृत लेखक आफताब हसनैन, प्रसिद्ध फिल्म लेखक, निर्माता, निर्देशक सागर सरहदी तथा हिंदी साहित्यकार, पत्रकार,  गीतकार डॉ. रंजन जैदी महाराष्ट सरकार के एक कार्यक्रम में.
'अल्लाहुम्मा लब्बैक' यानि 'या अल्लाह मैं हाज़िर हूँ.' यह शीर्षक है जाने-माने साहित्यकार आफताब हसनैन द्वारा लिखित एकांकी नाटक का. आज के सन्दर्भ में भी इस नाटक की उपादेयता कम नहीं है. नाटककार के सम्बन्ध में विजय तेंदुलकर से लेकर शाहिद लतीफ़ तक और मीम नाग से लेकर राजेश विक्रांत तक ने बहुत कुछ लिखा है. नाटककार का यह एकांकी उर्दू और हिंदी, दोनों ही भाषाओँ में प्रकाशित हुआ है जिसे मुंबई स्थित सारांश साहित्य मंदिर ने प्रकाशित किया है. विषय की सामग्री में यदि मौलिकता और रचनात्मक चिंतन का उत्स हो तो वह रचना समाज को बेहतर सन्देश दे जाती है.यदि रचनात्मकता में ध्वंसा- त्मतक चिंतन और उपहास उड़ाने का प्रायोजित इरादा हो तो वह रचना समय और काल के गर्त में कहीं खो जाती है जैसा कि हिंदी-उर्दू रचनाकारों की कुछ चर्चित रचनाओं के साथ अतीत में हो चूका है. सेटेनिक वर्सेज़  एक प्रायोजित रचना थी जिसके प्रकाशक को अपनी मार्केटिंग के तेहत बेचना था. किसी समय में आबिद सुरती ने भी काली किताब लिखकर साहित्य जगत में भूचाल सा ला दिया था. लेकिन अल्लाहुम्मा लब्बैक नाटक  उस घटिया मार्केटिंग की रणनीति और अवसरवादी विचारधरा से बहुत ऊपर अपना स्थान बना चूका है, यही उसकी लोकप्रियता का प्रमाण है. इसके माध्यम से लेखक ने धार्मिक विसंगतियों पर बेहद बेबाकी के साथ अपनी आवाज़ बुलंद की है. दो दृश्यों पर आधारित यह नाटक निश्चय ही अपनी तमाम मौलिक्ताओं, चिंताओं और सरोकारों  के साथ भारतीय रंग-मंच के इतिहास में मील के पत्थर की हैसियत लिए रहेगा. विषय के एतबार से इस एकांकी में मुस्लिम समुदाय की कथित विखंडित एकता के माध्यम से जो वैचारिक चिंतन और मारक व्यंग्य प्रस्तुत किया गया है. वह पाठक और मंचीय दर्शक को सोचने पर विवश कर देता है. इसकी सामयिक उपादेयता यह है कि आज अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय विखंडन और राजनीतिक केयास का सामना कर रहा है. पंथों और समुदायों के अनेक मदारी जन्म ले चुके हैं, उनकी अपनी ढपलियाँ बज उठी हैं, अपने राग-द्वेष और आस्थाओं की बिसात पर चौसर और चौगान के दांव-पेंच खेले जाने लगे हैं. इस्लाम की ओट में अशिक्षित पेशेवर मुसलमानों ने उद्देश्यहीन आतंकवाद को पेशे के रूप में प्रायोजित करना शुरू कर दिया है.यह भावी नस्लों के लिए एक खतरनाक भविष्य को जन्म देने का रास्ता है जिसकी रसद को रोकना और आतंकवाद पर अंकुश लगाना बेहद ज़रूरी है. लेखक के अनुसार 'हम इस्लाम को तो मानते है, इस्लाम की नहीं मानते.' कुरआन को तो मानते है, कुरआन की नहीं मानते', अल्लाह और रसूल को तो मानते हैं, अल्लाह-रसूल की नहीं मानते.' यही वैचारिक पलायन मुस्लिम समुदाय के विघटन का कारण है.  भारतीय परिपेक्ष में भारतीय मुसलमान वैसे भी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है और उसकी युवा पीढ़ी अपने स्थायित्व का संघर्ष कर रही है, जिसे बेहतर रोज़गार की जरूरत है, बच्चों और लड़कियों को शिक्षा और व्यावसायिक हुनर की ज़रुरत है, किन्तु इस्लाम का अर्थ न समझने वालों को हज की ज्यादह ज़रुरत है, यही जेहालत कौम को आगे बढ़ने नहीं देना चाहती. इस्लाम सामाजिक समरसता की बात करता है लेकिन मुसलमान कबीलाई निजाम को जिंदा रखना चाहता है, जो कभी भी कौमों को एकता के सूत्र में नहीं बांध सकता. यह एकांकी इसी दर्द का मर्सिया है जो रुलाता भी है, झिंझोड़ता भी. शर्मिंदा भी करता है और चैतन्य भी. ऐसे नाटक हर दौर में जिंदा रहते हैं. क्योंकि इसका स्वाभिमान रसूल (स.) के ज़माने में भी था और इमाम हुसैन (स) की शहादत के समय कर्बला में भी. जो कौमें स्वाभिमान से खाली हो जाती हैं, वे इतिहास में जगह नहीं बना पाती हैं और हम इतिहास के मकबरों, हुजरों, आस्तानों में बेगरज उठते लोबान के धुवों में भटकते रह जाते है. पाठकों को एकबार यह नाटक अवश्य पढना चाहिए. ---समीक्षक:रंजन जैदी      -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. विचार, व्यक्ति के चिंतन-मनन और मंथन से छाछ बनकर प्रकट होते हैं. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --प्रबंध संपादक