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| File Photo; मनोज भावुक को सम्मानित करतीं श्रीमती गिरिजा देवी तथा गुलज़ार. |
जाने-माने युवा साहित्यकार
मनोज भावुक को पिछले दिनों
राही मासूम रज़ा सम्मान से सम्मानित किया गया. यह सम्मान उन्हें उनके द्वारा भोजपुरी साहित्य और भोजपुरी फिल्मों में उल्लेखनीय योगदान को ध्यान में रखते हुए दिया गया.
मनोज भावुक का जन्म १९७६ में बिहार के जिला सीवान में हुआ था लेकिन लालन-पालन रेनुकूट (उत्तर प्रदेश) में हुआ. वह अब युगांडा से लन्दन में आकर रह रहे हैं. उन्हें पहले भी उनके भोजपुरी ग़ज़ल-संग्रह
तस्वीर जिंदगी के पर सन २००५ तथा 2006 में कोलकता स्थित संस्था
भारतीय भाषा परिषद् की ओर से व २०१० में पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा पुरस्कार, सम्मानित किया जा चुका है. भोजपुरी भाषा साहित्य की किसी कृति को दिए जाने वाला यह पहला पुरस्कार और भोजपुरी के किसी साहित्यकार का किया जाने वाला यह पहला सम्मान था. जिसमें ठुमरी सम्राज्ञ्री श्रीमती गिरिजादेवी और फिल्म गीतकार गुलज़ार भी उपस्थित थे. इधर वाराणसी में आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मलेन के दौरान
मनोज भावुक को कांग्रेस के सांसद
अम्बिका पाल ने सम्मानित किया. इस अवसर पर विश्व भोजपुरी सम्मलेन के यूपी के अध्यक्ष
डॉ. अशोक सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये.
राही मासूम रज़ा के साहित्य पर पीएचडी प्राप्त और हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कथाकार व् कम्लेश्वर फाउनडेशन के अध्यक्ष
डॉ. रंजन जैदी से जब फोन पर उनकी प्रतिक्रिया जानी गई तो उन्होंने कहा कि भोजपुरी समर्थ, अपने आप में कम्प्लीट और एक जिंदा भाषा है जो राजनीति का शिकार राही है लेकिन अब राजनीति बेनकाब और भाषा बा-हिजाब सामने आचुकी है. जब उनसे बनारस में आयोजित सम्मलेन में मनोज भावुक को सम्मान दिए जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह सम्मान भोजपुरी भाषा, लोक-साहित्य और उसके रौशन मुस्तकबिल का है.. उन्होंने
मनोज की भोजपुरी ग़ज़ल के एक शेर के साथ उन्हें बधाई देते हुए कहा कि
कबो आज ले ना रुकल इ कदम, भले मोड़ पर मोड़ आवल रहल...बधाई!
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