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| नीना गर्ग |
मुक्ति और बंधन दो अलग अनुभूतियो की स्थितियां हैं. पुत्री होने से मुक्ति नहीं होती.यह खोखला चिंतन है. इसमें अनुभूति का पहलू यह है कि पुत्री दूसरे के घर जाती है तो स्त्री-धन भी साथ ले जाती है. इसीलिए उसे लक्ष्मी कहा जाता है.जहाँ जाती है वहां लक्ष्मी का योग बढ़ जाता है. जहां से जाती है, वहां धनयोग कम हो जाता है. यही आभाव का चिंतन पिता को भयग्रस्त करता रहता है. माँ इसीलिए स्त्रीधन का शुरू से संचय करना प्रारंभ कर देती है. दान में चूँकि अदृश्य-पुण्य के भाव छुपे होते हैं और दान वापस नहीं लिया जाता है, इसलिए कन्या को दानकर उससे एक तरह से मुक्ति पा ली जाती है. पुण्य भी लाभ का वैकल्पिक पर्यायवाची है, इसलिए इस दान से भी लाभ मिल जाता है, जैसे गऊ-दान से कथित स्वर्ग के मिलने, अगले बेहतर जन्म का लोभ और अदृश्य शक्तियों से बचे रहने का लालच सन्निहित है, वैसे ही कन्या से परिवार के बनने की व्यवस्था जुड़ी रहती है. वह पुत्रों को जन्म देकर पुरुषत्व के अहम् को संतुष्ट करती है. कन्या को भी एकतरह से गाय ही कहा जाता है. गाय से बछड़ा और दूध मिलता है, कन्या से शारीरिक-सुख और वंश को आगे बढ़ाने का सुख प्राप्त होता है. यही लाभ के अदृश्य स्रोत हैं. भय मनुष्य को कमज़ोर करता है, कन्या, असंख्य-भय और आशंकाओं को जन्म देती है. पुत्र शुभ-लाभ है, पुत्री हानि. लाभ पुत्र से है जो घर में लक्ष्मी लाता है, इसी लिए दीपावली में शुभ-लाभ शब्द की पूजा होती है, हानि की नहीं. हानि का शाब्दिक पर्याय भय है. मनुष्य भय-मुक्त रहना चाहता है. जहां स्त्री-सत्तात्मक-परिवार होते हैं, वहां स्थिति इसके विपरीत होती है. स्पष्ट हुआ कि यह व्यवस्था पूर्णरूप से आर्थिक मुद्दों से जुड़ी हुई है.अर्जुन का विवाह राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा से हुआ था. कुल की परंपरा उसी से चली थी. महाभारत से पता चलता है कि जिन राजाओं के पुत्र नहीं थे, उन्हें यह आदेश था कि वे अपनी पुत्री का अभिषेक करें. व्यास ने तो यहाँ तक कहा है कि बेटी तो दया के योग्य होती है. यदि उसके द्वारा तुम्हारा तिरस्कार हो रहा हो तो सह लो. भीष्म ने दत्तक-पुत्र की तुलना में सगी बेटी को धनाधिकारी माना है. यति की पुत्री थी माधवी, उसी ने अपने पिता को स्वर्गलोक में स्थान दिलाया. सैकड़ों-हजारों पुत्रों ने राग, द्वेष व संपत्ति और सता के लिए अनेक संघर्ष किये, रक्त बहाया. इसके विपरीत सावित्री ने अपने श्वसुर को नेत्र-ज्योति दी, राज दिया, पति को यमराज से मुक्ति दिलाई. किन्तु समाज इस स्थिति को नकार जाता है. फिर भी बेटियां मनुष्य को आज भी अनेक आशंकाओं से घिरा हुआ महसूस कराती है. भ्रूण-हत्याएं इसी का प्रमाण हैं. भ्रूण ----------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. विचार, व्यक्ति के चिंतन-मनन और मंथन से छाछ बनकर प्रकट होते हैं. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --प्रबंध संपादक
