बुधवार, 15 दिसंबर 2010

बीता साल, नए क्षितिज ..../प्रेमा करियप्पा


गर हाथ हमारे मिल जाएँ,  तकदीर बदलकर रख देंगे.
 बीता साल विभिन्न रंगों से भरा रहा. दुःख और सुख, दोनों के अहसास ने कभी उत्साहित किया तो कभी हतोत्साहित. स्वैच्छिक क्षेत्र में  जब विकास की गति तेज़ होती  नज़र आती है तो मन उत्साहित हो उठता है. जब लगता है कि विकास की गति धीमी पड़ गयी है और उसमें अवरोध पैदा हो गए हैं तो मन हतोत्साह से भर उठता है. जल, जंगल, ज़मीन प़र जनाधिकार की मांग सरोकारों से टकराव को जन्म देती है. जब इनकी रक्षा की लडाई के लिये कोई सामने या आगे नहीं आता है तो मन निराशा से भर जाता है. स्वैच्छिक  क्षेत्र नदी की तरह है, जो खुद पानी नहीं पीती, उन फलों के दरख्तों की तरह है जो खुद फल नहीं खाते, प्रकृति की हर वस्तु देती है, लेती नहीं है. यही है प्रेरणा का फलक जो हमें उत्साहित करता है. किन्तु जब हम फल की कामना करते हैं, सेवा और सुरक्षा का अधिग्रहण कर लेते हैं, उसके आर्थिक लाभ का आकलन करने लगते हैं तो उद्देश्य साफ समझ में आ जाता है, और यहीं प़र चिंताएं आकुल होने लगती हैं.  लगता है, यहीं प़र हम कबाईली व्यवस्था के बीच एक ऐसी व्यवस्था की तलाश कर रहे है जो हमें पहचान भी दे और लाभ भी. इसे यदि विस्तार से कहें तो हम कह सकते हैं कि हम एक ऐसी दोहन प्रक्रिया के समर्थक बनते जा रहे हैं जो खुद को लाभ और दूसरों को वंचित कर देने की प्रवृति को जन्म देती है. यह अच्छी बात नहीं है.  इससे संवेदंशेल मानस आहत होता है. यह मानस-धर्म भी नहीं है, किन्तु  हमारा ध्यान उधर नहीं जाता है. हमारा मौन दूसरों का लाभ बन जाता है. इसीलिए समाज के कमज़ोर वर्ग के मौन से चतुर-वर्ग लाभ उठा लेता है. ऐसा नहीं होना चाहिए. इसे इतिहास अच्छी नज़र से नहीं देखता है. आने वाली नस्लों को भी अच्छे आदर्श नहीं मिल सकते हैं. हमें इस प्रकार की प्रवृति से दूर रहना होगा, यही सामाजिक विकास की कुंजी है. नव-वर्ष मंगलमय हो, इसी कामना के साथ बीते वर्ष को अलविदा करते हुए केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड समस्त देशवासियों को नए वर्ष की शुभकमनाएं  देता है.-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

रविवार, 12 दिसंबर 2010

पर्दा आँख का, सुरक्षा खुद की / नीना गर्ग

पर्दा, खासकर भारतीय मुस्लिम समाज में तरक्की के रास्ते का रोड़ा रहा है. इसी परदे की वजह से मुल्क की कितनी ही होनहार लड़कियां तरक्की करने से रह जाती हैं. परदे को लेकर उन्हें बचपन से बड़ा होने तक वालिदैन की तंगनजरी इस तरह की तालीम और प्रशिक्षण देती है कि लडकियां अपने ही समाज में डर और खौफ के साये में पालती-बढती इसी बात प़र संतोष कर लेती हैं कि सचमुच अगर उनके साथ कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो....? वे जान ही नहीं पातीं हैं कि इस्लाम में हिजाब (पर्दा) के लिये कुरआन में क्या कहा गया है. कुरआन शरीफ की एक आयत है सूरतुल नूर. 'कुरआन' में खुदा फरमाता है कि अपनी ओढ़नियाँ अपने गिरेबान प़र डाल लें  और अपनी ज़ीनत (शोभा) किसी के सामने ज़ाहिर न करें. लेकिन अपने पति के सामने इस्लामी दृष्टिकोण से औरत हिजाब (पर्दा) की पाबंद नहीं है. इस्लाम के इतिहास में बड़ी हस्तियाँ रखने वाली हज़रत आस्मां, हज़रत आयशा और हज़रत फातिमा जैसी अनेक सम्मानित महिलाएं अपने जीवनकाल में अत्यंत सक्रिय रही थीं. इन सभी महिलाओं का इस्लामी समाज में महत्वपूर्ण भूमिका रही है और वे हिजाब के साथ पुरुषों के बीच अपनी भूमिका निभाती थीं. उदहारण बहुत दिए जा सकते हैं किन्तु पुरुष वर्चस्व समाज उन उदाहरणों को सामने नहीं लाना चाहता. वह नहीं चाहता कि महिलाएं अपने कानूनी अधिकारों को जानें और अपने पैरों प़र खड़ी हों. हिजाब मूलतः एक व्यक्तिगत क्रिया है. अल्लाह फ़रमाता है कि दीन में कोई जब्र (बलात) नहीं है. इसलिए 'हिजाब' जबरन किसी प़र थोपा नहीं जा सकता. इसके बावजूद हिजाब अनेक इस्लामी देशों के लिये आज एक समस्या बन चुकी है. टर्की में मुस्तफा कमाल पाशा के शासन काल में सबसे पहले औरतों के परदे प़र पाबन्दी लगायी गयी थी. तब वहां की लड़कियों को स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों में पढाई करने से रोक दिया गया था.टर्की एक इस्लामिक देश है. आज वहां की लड़कियों प़र कोई पाबन्दी नहीं है. वहां की महिलाएं हिजाब में भी पुरुषों के कंधे से कन्धा मिलाकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. ईरान, खाड़ी के देशों और इंडोनेशिया, मिलिशिया जैसे असंख्य देशों में भी औरतें इस्लामी रिवायात के साथ-साथ लगातार तरक्की कर रही हैं. इस सम्बन्ध में खुद भारतीय मौलवियों की बेटियां न केवल ऊंची शिक्षा ग्रहण कर रही हैं, बल्कि वे आईटी के क्षेत्र में भी आगे आ रही हैं. फिर ये पाबंदियां आम अवाम की बेटियों प़र क्यों लगायी जाती हैं? आज सारी दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर रही है. आज हर देश यह महसूस कर रहा है कि औरतों की योग्यता का सही उपयोग किया जाए. उन्हें शिक्षित किया जाए, हर उस क्षेत्र में उनसे काम लिया जाए, जिसमें उनकी योग्यता से विकास संभव है, तो उनपर गलत पाबंदियां लगाकर उनके विकास को क्यों रोका जा रहा है. सही सोच रखने वाले मौलवियों से जब मेरी गुफ्तुगू हुई तो मालूम हुआ कि वे भी हिजाब के समर्थक नहीं हैं. उनका कहना था कि हिजाब ने कभी औरतों को तरक्की से नहीं रोका. पर्दा आँख का होता है और आँख पहचानती है कि उसे शरीर के किन-किन अंगों को परदे से ढके रखना चाहिए. दुनिया की हर औरत परदे का मतलब पहचानती है. उसकी आँख का पर्दा उसके जिस्म के नाज़ुक हिस्सों को दूसरों की आँखों से सुरक्षित रखने का भरसक प्रयास करता रहता है. जब तक औरत की आँख में पर्दा है, कोई भी पुरुष उसका बुरा नहीं कर पायेगा. इसलिए उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोका जाना चाहिए. मैंने देखा है कि जिस लड़की की आँख में पर्दा होता है, वह पुरुषों से आँख मिलाकर बात करती है, उसके साथ कोर्पोरेट सेक्टर में काम करती है, स्टूडियो की तन्हाई में कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, लैब मे एक्सपेरिमेंट करती है, सरकारी आफिसों, बैंकों, एयर-बसों और दूसरे अनेक क्षेत्रों में पुरुष के साथ काम करती है. हमें हर हाल में पोज़िटिव सोच के साथ महिलाओं को आज़ादी देनी होगी. मुस्लिम समाज में इस आज़ादी का बहुत बड़ा महत्त्व है. कारण यह है कि मुस्लिम समाज आर्थिक, शैक्षिक और राजनैतिक दृष्टि से आज भी दूसरे समुदायों की तुलना में बहुत पीछे है.यह इसीलिए कि इसे सही मार्ग नहीं दिखाया गया और न ही यह बताया गया कि इल्म हासिल करने का प्रलोभन तो इस्लाम की तालीम भी देती है. बचपन से बच्चियों को यही बताया जाता है कि इस्लाम में पर्दा ज़रूरी है. यह नहीं बताया जाता कि इस्लाम में इल्म को भी महत्त्व दिया गया है जिससे व्यक्तित्व का विकास होता है, उसमें सुन्दरता आती है, उससे आत्मविश्वास  बढ़ता है और इल्म ही औरत को सशक्तिकरण की राह दिखाता है. जब-जब औरत ने इल्म हासिल किया तो वह फैसले लेने के योग्य हुई. उसने न केवल अपने समाज, समुदाय और अपनी कौम की रहबरी की बल्कि उस नस्ल को भी रास्ता दिखाया जो इल्म के बिना अज्ञानता के कोहरे में फंसा हुआ था. इल्म मिला तो उसे अपने अधिकारों का पता चला. वह घर से निकली तो चौपाल में पहुंची और उसने कहा कि जो सरकार से पैसा विकास के लिये आरहा है, उसका हिसाब दो. वह घर की ज़िम्मेदारी निभाते-निभाते पंचायत तक पहुंची. पंचायत से विधान सभा, और वहां से संसद तक. यह इल्म का रास्ता था जिसने उसे जिम्मेदारियां दीं. दुनिया के इतिहास में औरतों की भागीदारी हमेशा से रही है. जहाँ भागीदारी नहीं रही, वे क्षेत्र पिछड़ गए.वे कौमें पिछड़ गयीं और उनकी नस्लें गुलाम हो गयीं. गुलामी चाहे घर में पति की हो या समाज, या देश की, गरीबी का अभिशाप है. गरीबी घरों में संघर्ष कराती है. बच्चे संघर्ष और हिंसा का शिकार होते हैं. व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध हो जाता है और नस्लें गुमराह. अपराध का जन्म ऐसी ही सीलन भरी कोठरियों या बेसमेंट के अंधेरों में होता है जो पनपते-पनपते शहरों और महानगरों की सड़कों तक पहुँच जाता है. झुग्गी-झोपड़ियों में पनपता स्मैक और मटके का कारोबार कच्ची शराब के नशे में बहता हुआ जिस्म के सौदागरों के हाथों तक पहुँच जाता है. अगर इल्म हो तो क्या ऐसी सूरत सामने आ सकेगी? क्या झोपड़पट्टी में इल्म के सूरज को  निकलने से कोई रोक लेगा? कितनी ही स्वैच्छिक सामाजिक संस्थाएं झोपडपटटियों में इल्म के दिए रोशन किये हुए हैं और वे सब महिलाएं हैं, मुस्लिम महिलाएं भी कार्यरत हैं. यही हमारे देश के भविष्य की आशा है जो हमें अपार संभावनाओं के ब्रह्म्हांड में विचरण कराती है.--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 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