मंगलवार, 31 मई 2011

‘Smokers consume 12 cigarettes per day’/ Asma Ali Zain

31 May 2011 DUBAI                                                Smokers in Dubai, both men and women, consume 12 cigarettes per day making them moderate to heavy smokers, according to statistics released by the Dubai Health Authority on Monday.

Data also shows that one-third of the nearly two million people living in Dubai are exposed to tobacco smoke, either directly or as passive smokers with each resident being exposed to passive smoking for about five hours daily. About 67 per cent of them are exposed to passive smoking at public places.
The results will pave way for new policies specifically targeting vulnerable groups, said officials after releasing the stats a day ahead of the World No Tobacco Day which falls today.
“We have collated and analysed critical data on smoking patterns including the percentage of the population who are smokers,” said Laila Al Jassmi, CEO of Health Policy and Strategy Sector at the authority.
On an average, almost one in six UAE national men aged between 25 and 39 smokes daily, showed the survey. Results also showed that Arab expatriates have the highest smoking prevalence of all men in Dubai — 50 per cent higher than other expatriates and double that of UAE national males.
The results, based on the Dubai Household Health Survey (DHHS) of 5,000 households conducted in 2009, asked adults questions pertaining to tobacco use and exposure within the, ‘Smoking Risk Factor and Preventative Health Behaviours’ section of the survey.
It also revealed that the prevalence of smoking among Dubai residents is 17.2 per cent with men being five times more likely to smoke as compared to women. “The survey asked several questions in terms of prevalence of the use of tobacco including shisha and smokeless tobacco as well as the prevalence of passive smoking,” said Eldaw Abdalla Suliman, Head of Research and Performance Management in DHA’s Health Policy and Strategy Sector.
“Based on the data, we will develop a multi-factorial approach to conduct awareness campaigns targeting vulnerable groups,” he said.
The Ministry of Health has also tied up with the US Centres for Disease Control to conduct the Global Adult Tobacco Survey — the first ever for the entire country, said Dr Wedad Al Maidoor, head of the UAE Anti-Tobacco Committee at the ministry. The survey is expected to start in December this year.

People in the lowest income quintile and the lowest educational level are approximately twice as likely to smoke compared to people in the richest quintile and the highest educational level.                                                                              Key findings:

Men who smoke start at the age of 10 and women start at the age of 13.
Thirteen per cent of smokers in Dubai start smoking by the time they complete secondary school. Amongst Emirati men in Dubai who are smokers, one in every five, start smoking by the time they complete secondary school
The prevalence of smoking among UAE nationals is 8.6 per cent.
UAE national men are 10 times more likely to smoke compared to UAE national women with a prevalence of 15.5 per cent as compared to only 1.5 per cent among females.
The prevalence of smoking in the 18 to 24 age group is 16.2 per cent and prevalence of smoking among the UAE Nationals is 8.6 per cent which is significantly lower than any other nationality.
People in the lowest income quintile and the lowest educational level are approximately twice as likely to smoke compared to people in the richest quintile and the highest educational level.
Most of the current male smokers in Dubai (18.1 per cent) smoke on a daily basis and only three per cent smoke occasionally. Current female smokers in Dubai smoke on a daily basis (3.4 per cent) and only 1 per cent smoke occasionally.
In terms of passive smoking, about 17 per cent of non-smoking Dubai residents are exposed to passive smoking at homes. Men are twice as likely to be exposed to passive smoking (19.8 per cent) as compared to women (9.1 per cent).
About 62 per cent of non-smoking Dubai residents are exposed to passive smoking at work. Men are three times as likely to be exposed to passive smoking at work as compared to women.

शनिवार, 28 मई 2011

भिलाई में अन्तरराष्ट्रीय मुशायरा ‘महफ़िल-ए-सुख़न’ सम्पन्न/जया शर्मा

‘टूटे हुए दिलों की दुआ मेरे साथ है, दुनिया किधर भी रहे, ख़ुदा मेरे साथ है।’
    भिलाई (छ.ग.): प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा इस्पातनगरी भिलाई में आयोजित प्रगतिशील शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एवं प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती समारोह के अन्तर्गत गत माह 14 मई को  ख्यातिलब्ध शायरों ने अपनी शायरी से फैज़ अहमद फैज़ को याद किया और भारतीय गंगा-जमुनी तहजीब (संस्कृति) को और भी पुख़्ता करते हुए  उर्दू और हिन्दी ज़ुबानों की एकरसता को साबित कर दिया.  स्थानीय भिलाई निवास में सम्पन्न इस अन्तरराष्ट्रीय मुशायरे की अध्यक्षता पाकिस्तान की मशहूर शायरा डॉ. आरिफ़ा सैयदा ने की। इस मुशायेरे में विशिष्ट-अतिथि के रूप में लाहौर से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की साहबज़ादी डॉ. मुनीज़ा हाश्मी  ने भी शिरकत की. इस अवसर पर पाक-दूरदर्शन के निदेशक अब्दूर रऊफ़ एवं दुर्ग के महापौर डॉ. एस.के. तमेर प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
अध्यक्षीय आसंदी से मुबारक़बाद देते हुये डॉ. आरिफ़ा सैयदा  ने कहा कि उर्दू और हिंदी भाषाएँ, पाकिस्तानियों और हिन्दुस्तानियों की तरह मिलनसार हैं। यह हमारी सांस्कृतिक एकरूपता का बुनियादी और ठोस बयान है। उन्होंने फ़ैज़ साहब की रचनाओं का प्रभावी पाठ भी किया। संस्थान के निदेशक श्री जयप्रकाश मानस ने तरन्नुम में फ़ैज़ साहब की ग़ज़लों का पाठ कर महफ़िल को भाव-विभोर कर दिया।
देर रात तक चले मुशायरे में बनारस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रमुख डॉ. याक़ूब यावर, जनसत्ता (दिल्ली) के विख्यात स्तम्भकार फ़ज़ल इमाम मल्लिक के साथ स्थानीय तथा जाने-माने शायरों में फ़ैज़ सम्मान से सम्मानित बदरूल क़ुरैशी बद्र, अशोक शर्मा, मुकुन्द कौशल, नजीम कानपुरी, क़ाविश रायपुरी, डॉ. संजय दानी, साकेत रंजन प्रवीर, डॉ. नौशाद सिद्दीकी, रामबरन कोरीक़शिश’, मोहतरमा नीता काम्बोज़ और निज़ामत कर रहे शायर मुमताज़ ने अपनी नायाब रचनायें पेश कीं।
इस अवसर पर केदार अग्रवाल  की पौत्री श्रीमती सुनीता अग्रवाल, फ़िराक़ गोरखपुरी के नवासे एवं संस्थान के अध्यक्ष कवि विश्वरंजन, श्रीमती डॉ. तमेर, प्रमोद वर्मा की धर्मपत्नी डॉ. कल्याणी वर्मा अपनी सुपुत्री पाखी वर्मा के साथ विशेष रूप से उपस्थित थीं। इस अवसर पर  डॉ. धनन्जय वर्मा डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, डॉ. अजय तिवारी, डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल, डॉ. सुधीर सक्सेना, माताचरण मिश्र, डॉ. श्याम सुंदर दुबे डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे डॉ. रोहिताश्व श्री भारत भारद्वाज, श्री नंद भारद्वाज, श्री श्रीप्रकाश मिश्र, डॉ. प्रताप राव कदम, श्री नरेन्द्र पुण्डरीक, श्री रमेश खत्री, डॉ. प्रकाश त्रिपाठी, अन्तरराष्ट्रीय पत्रकार श्रीमती संतोष श्रीवास्तव अदि भी उपस्थित थे.
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के महासचिव व मशहूर शायर मुमताज़ (भिलाई) ने मुशायरे की निज़ामत (संचालन) कर समाँ बाँध दिया। संस्थान के उपाध्यक्ष व वरिष्ठ कवि श्री अशोक सिंघई ने मुशायरे के अंत में आभार व्यक्त करते हुए  किसी अनाम शायर का यह शेर पढ़कर वाहवाही लूटी कि - ‘टूटे हुए दिलों की दुआ मेरे साथ है, दुनिया किधर भी रहे, ख़ुदा मेरे साथ है।’
इस अवसर पर दुर्ग जिले के पुलिस अधीक्षक श्री आरिफ़ हसन, संस्थान के उपाध्यक्ष रवि श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष श्री सुरेन्द्र वर्मा, डॉ. गंगाप्रसाद बरसैया, श्री रविशंकर शुक्ल, श्री शिव कुमार द्विवेदी, श्री हरीश वाढेर, डॉ. सुधीर शर्मा, गुलबीर भाटिया, गिरीश पंकज, डॉ. चितरंजन कर, डॉ. तीर्थेश्वर सिंह, श्री रतनलाल सिन्हा, प्रशांत कानस्कर, राधेश्याम सिन्दुरिया, शिवमंगल सिंह, श्रीमती शान्तिलता वर्मा, श्रीमती प्रभा सरस, श्रीमती शकुन्तला शर्मा सहित इस्पातनगरी के साहित्यकार व साहित्यप्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक

गुरुवार, 26 मई 2011

मनोज भावुक को राही मासूम रज़ा सम्मान


File Photo;  मनोज भावुक को सम्मानित करतीं श्रीमती गिरिजा देवी तथा गुलज़ार.
जाने-माने युवा  साहित्यकार मनोज भावुक को पिछले दिनों राही मासूम रज़ा सम्मान से सम्मानित किया गया. यह  सम्मान उन्हें उनके द्वारा भोजपुरी साहित्य  और भोजपुरी फिल्मों में  उल्लेखनीय योगदान को ध्यान में रखते हुए दिया गया.  मनोज भावुक का जन्म १९७६ में बिहार के जिला सीवान में हुआ था लेकिन लालन-पालन रेनुकूट (उत्तर प्रदेश) में हुआ.   वह अब  युगांडा से लन्दन में आकर रह रहे हैं. उन्हें पहले भी उनके भोजपुरी  ग़ज़ल-संग्रह तस्वीर जिंदगी के पर सन २००५ तथा 2006 में  कोलकता स्थित संस्था भारतीय भाषा परिषद् की ओर से व  २०१० में पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा पुरस्कार, सम्मानित किया जा चुका है.  भोजपुरी भाषा साहित्य की किसी कृति को दिए जाने वाला यह पहला पुरस्कार और भोजपुरी के किसी साहित्यकार का किया जाने वाला यह पहला सम्मान था. जिसमें ठुमरी सम्राज्ञ्री श्रीमती गिरिजादेवी  और फिल्म गीतकार गुलज़ार भी उपस्थित थे. इधर वाराणसी में आयोजित  विश्व भोजपुरी सम्मलेन  के दौरान मनोज भावुक को कांग्रेस के सांसद अम्बिका पाल ने  सम्मानित किया. इस अवसर पर विश्व भोजपुरी सम्मलेन के यूपी के अध्यक्ष डॉ. अशोक सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये. राही मासूम रज़ा के साहित्य पर पीएचडी प्राप्त और हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कथाकार  व् कम्लेश्वर  फाउनडेशन के अध्यक्ष डॉ. रंजन जैदी  से जब फोन पर उनकी प्रतिक्रिया जानी गई तो उन्होंने कहा कि भोजपुरी समर्थ, अपने आप में कम्प्लीट  और एक जिंदा भाषा है जो राजनीति का शिकार राही है लेकिन अब राजनीति बेनकाब और भाषा बा-हिजाब सामने आचुकी है. जब उनसे बनारस में आयोजित सम्मलेन  में मनोज भावुक को सम्मान दिए जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह सम्मान भोजपुरी भाषा,  लोक-साहित्य और उसके रौशन मुस्तकबिल  का है.. उन्होंने मनोज की भोजपुरी ग़ज़ल के एक शेर के साथ  उन्हें बधाई देते हुए कहा कि  कबो आज ले ना रुकल इ कदम, भले  मोड़ पर मोड़ आवल रहल...बधाई!                                                                                                                       विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक

मंगलवार, 17 मई 2011

खबरों के लिहाज से/ मार्क टुली

मार्क टुली, प्रसिद्ध पत्रकार
बीते एक-डेढ़ महीने का समय खबरों के लिहाज से काफी हलचलों वाला     रहा। अन्ना के आंदोलन की खबरें अभी शांत हुई भी नहीं थीं कि शांति भूषण और सीडी का मामला गरमाने लगा। इसी बीच सत्य साईं बाबा का निधन हो गया। इसके तुरंत बाद ब्रिटिश राजकुमार विलियम और केट की शादी दुनिया भर में मीडिया की सुर्खियों में छा गई। इसको मीडिया पूरे तामझाम के साथ कवर कर ही रहा था कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर आ गई। इसकी रिपोर्टिग जारी ही थी कि ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल में किसान असंतोष के बाद हिंसा हो गई। इससे जुड़ी खबरें चल ही रही थीं कि पांच राज्यों की विधानसभाओं के नतीजे आ गए। जब तक मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक मौके को ठीक से कवर कर पाता, इससे पहले ही उसे दूसरी खबर की तरफ दौड़ना पड़ा।
ये सभी घटनाएं काफी न्यूज वैल्यू वाली थीं। इनमें लोगों की दिलचस्पी बहुत ज्यादा थी और इनका देश-दुनिया पर असर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन इन सभी घटनाओं को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ऐसे पेश किया है, जैसे मानो बड़ा तमाशा हो रहा हो। पिछले कुछ साल में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खबरों को दिखाने का अंदाज काफी बदल चुका है। कई बार तो लगता है कि उसकी दिलचस्पी घटनाओं को दिखाने की नहीं होती, बल्कि वह उन्हें ड्रामे के तौर पर पेश करता है। चैनल वालों की राय में ऐसा करना लोगों की दिलचस्पी को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है। हालांकि इस दौरान अलग-अलग पहलुओं को कुछ इस तरह से निकाला जाता है, जिनका उस खबर विशेष से कोई लेना-देना नहीं होता।
समाचार चैनल 24-24 घंटों के हो गए हैं, दिन भर के उनके प्रसारण के चलते अखबारों पर भी दबाव बढ़ा है। अब अखबार भी किसी घटना को टीवी वाले अंदाज में परोसने की कोशिश करते हैं। वहां भी बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपने लगी हैं और घटनाओं के फॉलोअप के जरिये अखबार के अंदर ही टीवी बनाने की कोशिशें हो रही हैं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खबरों को किस आधार पर दिखाया जाता है, इसे समझने के लिए यह देखना होगा कि यहां के तमाम समाचार चैनलों ने ब्रिटिश राजकुमार विलियम और केट की शादी को लाइव दिखाया। हालांकि यह शादी दुनिया भर में विश्वसनीय समाचार चैनलों, बीबीसी और सीएनएन पर भी लाइव दिखाई गई। इस शादी को लेकर दुनिया भर में दिलचस्पी खूब थी। लेकिन भारत के हिंदी चैनलों पर भी इसका लाइव प्रसारण चौंकाने वाला था। और तो और, वे इस शादी में जुटे लोगों की संख्या के आधार पर लोकतंत्र और वहां की राजशाही का विश्लेषण करने लगे। जबकि ब्रिटेन की जनता लंबे अरसे से लोकतंत्र और राजशाही के साथ तालमेल बिठा चुकी है। हाल ही में वहां हुए एक सर्वे में 80 फीसदी लोगों ने राजशाही के प्रति अपने सम्मान को प्रदर्शित किया था। संतुलित नजरिये से देखें, तो ब्रिटिश राजकुमार की शादी थी, जिसमें कुछ हाई प्रोफाइल गेस्ट शामिल हुए थे। इंग्लैंड के लोग अपने राजकुमार की शादी को देखने के लिए जश्न मनाते हुए लाखों की संख्या में सड़कों पर निकले। कई चैनलों पर इस शादी की तुलना प्रिंस और डायना की शादी से करते हुए दोनों में समानताएं दिखाई गईं, जबकि प्रिंस और डायना के बीच शादी से पहले कोई अंतरंगता या जान-पहचान भी नहीं थी और विलियम-केट के प्रेम-प्रसंग की बात काफी पुरानी है।
ओसामा की मौत के बाद टीवी चैनलों पर अमेरिकी कमांडोज की कार्रवाई का वीडियो भी कल्पना के आधार पर दिखाया जा रहा है। अमेरिकी सरकार ने कोई वीडियो जारी नहीं किया है, लेकिन टीवी चैनलों पर लगातार एनिमेटेड वीडियो दिखाए जा रहे हैं। लोगों की दिलचस्पी इसमें हो सकती है, लेकिन समाचार दिखाने के नाम पर ऐसे वीडियो को नहीं दिखाया जा सकता, जो कल्पना के आधार पर तैयार किए गए हों।
पिछले कुछ साल में भारत के इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के प्रचार-प्रसार में काफी इजाफा हुआ है। चैनलों की संख्या बढ़ी है। अखबारों ने अलग-अलग जगहों से अपने संस्करण निकालने शुरू किए हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि जितनी गुजांइश बढ़ी है, उतनी खबरें मीडिया नहीं परोसता। ऐसा नहीं है कि खबरें मौजूद नहीं हैं, लेकिन सच यह है कि लोगों के काम करने का नजरिया बदल चुका है। मीडिया घटना को सनसनीखेज बनाने में जुट जाता है। खबरों को सनसनीखेज बनाने की कोशिशों के चलते ही मीडिया की विश्वसनीयता घटी है।
हमारे समय में सुविधाएं काफी कम थीं। तकनीकी सुविधाएं तो नाममात्र की थीं, लेकिन हमारे दौर में खबरों को किसी एक सोच से प्रसारित करने की आजादी नहीं होती थी। खबरों को हर लिहाज से संतुलित और निष्पक्ष रखने की कोशिश होती थी। खबर को प्रसारित करने से पहले हर पहलू को उसमें शामिल किया जाता था। मौजूदा दौर में मीडिया में खबरों को दिखाए जाने में एक और प्रवृत्ति बढ़ी है, ज्यादातर पत्रकारों को लगता है कि खबर दिखाने का मतलब नकारात्मक खबरें दिखाना और आलोचना करना ही रह गया है। ठीक है, यह जानना और बताना जरूरी है कि क्या गलत हो रहा है, लेकिन साथ में यह दिखाना भी उतना ही जरूरी है कि समाज में क्या सही हो रहा है।
आधुनिक समय में खबरों का दायरा और उसके क्षेत्र भी काफी बढ़ गए हैं। मसलन, हमारे समय में पर्यावरण से जुड़ी इक्का-दुक्का खबरें ही होती थीं, आज इससे जुड़ा कोई भी मसला सुर्खियों में आता है। साइबर क्राइम तो था ही नहीं, अब इससे जुड़ी खबरें प्रमुखता से छपती या दिखाई जाती हैं। यानी समाज और लोगों की जीवनशैली में ऐसे कई बदलाव हुए हैं, जो खबरों में जगह बना सकते हैं। एक अहम बदलाव यह भी हुआ है कि आजकल मीडिया संस्थानों पर बाजार का दबाव बढ़ा है। इससे बहुत सारे परंपरागत मूल्य बदले हैं। ऐसी हालत में भारत में एक पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग का होना जरूरी है, ताकि एक ऐसा भी मीडिया मौजूद हो, जहां मुनाफा कमाने का दबाव नहीं हो।
मीडिया संस्थानों को यह भी समझना होगा कि मुनाफा कमाने की होड़ में भी उनका मुख्य ध्यान समाचार और उसके कंटेंट पर ही होना चाहिए, वरना वह दिन दूर नहीं, जब उन्हें दर्शक और पाठक ही नहीं मिलेंगे। ऐसे में, अपने भविष्य का आकलन वे खुद कर सकते हैं।                                    
                                                                   विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक

रविवार, 15 मई 2011

ममता का सफ़र आसान नहीं है/रंजन जैदी

ममता बनर्जी अब पश्चिम बंगाल का नेतृत्व करेंगी 
ममता बनर्जी अब पश्चिम बंगाल का नेतृत्व करेंगी और बुद्धदेव भट्टाचार्य आत्म-मंथन करेंगे. इस जय और पराजय के द्वंद्व के कुहासे में भावी राजनीति के रथ पर सवार होकर लेफ्ट अपने सारथी करात से सवाल करेगा कि तुम अर्जुन का मुखौटा ओढ़कर कब तक लेफ्ट के इस रथ को ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर लेजाते रहोगे जबकि सीताराम यचूरी जैसे कृष्ण की आँखों पर पार्टी ने पट्टी बांध रखी है और बूढा नेतृत्व दमे का मरीज़ बन चुका है. ३४ वर्ष तक वाम-सरकार भूमि-सुधार का नगाड़ा पीटती हुई काडर-निजाम के युवाओं को बेरोज़गारी की नींद में रोज़गार मिलने के सपने दिखाती रही और संस्कारशील बंगाल का युवा अपने बुज़ुर्ग ज्योति बसु से लेकर बुद्ध देव भट्टाचार्य तक का सम्मान करता रहा. लेकिन हर चीज़ की सीमा होती है. जवान बच्चे जब घर में अपने बुजुर्गों को घर की ज़रूरतें पूरी करने में लाचार पाते है तो उनकी नसों में खून खौलने लगता है. सिंगूर में बूढ़े किसानों द्वारा अपनी ज़मीनें टाटा को सौंप देने के पीछे की एक मजबूरी यह भी रही थी और युवाओं का आक्रोश कि यदि ज़मीन भी नहीं रही तो उनके परिवार के अस्तित्व का क्या होगा  क्योंकि उन्हें राज्य सरकार रोज़गार देने की  गारंटी नहीं दे रहा है और वे पूंजीवादी उद्योगपति पर विश्वास नहीं कर सकते. इसी द्वंद्व का खूनी संघर्ष था सिंगूरी कांड. उन्हीं दिनों मैंने लिखा था कि यह घटना नहीं इतिहास का एक ऐसा नया अध्याय है जिसपर आने वाली पीढ़ी लेफ्ट के अंत का मर्सिया पढेगी और ममता बनर्जी के विकास की यात्रा में अपने को साथ पायेगी.                   हाल के चुनाव में पश्चिमी बंगाल के मतदाताओं के बदले रुझान ने मेरे आकलन को सही साबित कर दिया और यह भी साबित कर दिया कि वामपंथियों का युग अब भारत में देर तक नहीं रहेगा. इसे हम बदलाव के रूप में न लें क्योंकि बदलाव में भविष्य की संभावनाएं होती हैं. पश्चिमी बंगाल में अब कम्युनिज्म शायद कभी न पनप पाए. करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मिलकर तो अपनी पार्टी के ताबूत में आखरी कील ही ठोक दी है जिसकी सजा पार्टी के प्रतिभाशाली राजनीतिज्ञों को तो भुगतनी ही होगी.     इसके बावजूद ममता बनर्जी के सिपहसालारों को बहुत खुश नहीं होना चाहिए. उन्हें यह समझना होगा कि तृणमूल कांग्रेस की में यदि भ्रष्टाचार पनपा, प्रशासन में ला-एन-ऑर्डर कमज़ोर हुआ, विकास के एजेंडे पर अमल नहीं हुआ, बेकारी और बेरोज़गारी पर अंकुश नहीं लगाया गया तो ममता बैनर्जी चाहे कितनी ही मुखर हों, डिवोटेड हों, बदलाव की हवा उन्हें सत्ता से बेदखल कर सकती है हालाँकि तृणमूल के पास एक से एक बढ़कर उद्योगपति, आइएएस,आइपीएस से निकले कारिंदे हैं जो अपने-अपने क्षेत्र  के विशेषज्ञ भी है जैसे अमित मित्रा, रक्षपाल सिंह, काकोली घोष, मनीष गुप्ता, पार्थ चटर्जी, सुल्तान अहमद, सुदीप बंदोपाध्याय, डेरेक ओ ब्रायन  तथा सबीर भाटिया अदि. इस नई टीम को बधाई..           

शनिवार, 7 मई 2011

परिवर्तन /रंजन जैदी

बोली बदली, भाषा बदली,
बदले आँचल और परिवार.     
पगडंडी ने सड़क पकड़ ली,
गावों ने खोये आकार.   

चौपालों और गलियारों में
पसर गए सन्नाटे,
छोड़ो लोकाचार,    
पहन लो नए मुखौटे.   

अब जंगल में शोर बहुत है,
आवाजाही का मौसम,
बूढा बरगद ठूंठ बना है,
दीमक करती है बेदम.   

दादी खाट-खंखार में जीती,
बाबा चिट्ठी-पाती में,
बाबू ने पढ़ देहरी लांघी,
छोटू पढता बाती में.   
 
नीम की छत प़र कव्वा चीखे,
बहना हिचकी से बेज़ार,
पहुने आये रिश्ता बनकर,
भैया-भाभी नदियों पार.   

नए गणित को परिभाषा दो,
उचित यही है समीचीन,
समीकरण भी बदल रहे हैं,
खुद्दारी है अर्थहीन.
खुद्दारी है अर्थहीन                                                                                                                               (वेब पत्रिका अपनी माटी से साभार)

बुधवार, 4 मई 2011

भारत की संस्कृत-उर्दू सभ्यता/मार्कण्‍डेय काटजू

यह प्रवासियों का देश है. 92 फीसदी लोग जो आज यहां रह रहे हैं, उनके पुरखे विदेश से आए थे. हम सबके पुरखे विदेश से आए थे. हमारे देश में लोग पिछले दस हजार साल से आते रहे हैं. क्यों आते जा रहे हैं? यहां के लोग नहीं जाते थे बाहर. आधुनिक मशीनीकरण के आने के पहले कृषि प्रधान समाज होता था तो खेती के लिए जो चाहिए था, जैसे समतल उपजाऊ ज़मीन और पानी, वह यहां इफरात में था. आप रावलपिंडी से बांग्लादेश और कन्याकुमारी चले जाइए तो आपको यही सब मिलेगा. लोग पलायन करते हैं विषम से आरामदायक जगह. हर आदमी चाहता है आराम. कोई क्यों यहां से अफगानिस्तान जाएगा, जो बर्फीला है, पथरीला है, तकलीफदेह है. तो सब यहां पलायन करते थे, क्योंकि यहां बड़ा आराम था. कृषि के लिए यह जगह जन्नत थी. पूरे एशिया और खासकर उत्तर पश्चिम से लोग आते थे. रशिया से, अफगानिस्तान से हज़ारों सालों से आते जा रहे हैं. इसीलिए इस मुल्क में इतनी विविधता है, इतने मज़हब, इतनी जातियां, इतनी भाषाएं, इतनी सभ्यताएं. कोई लंबा है, कोई नाटा है, कोई गोरा है, कोई काला है, कोई भूरा है. कोई कोकेशियन है तो किसी के मोंग्लायड नाक नक्श हैं.
मार्कण्‍डेय काटजू
यह  देश सेकुलर होकर ही चल सकता है. एक दिन भी नहीं चल पाएगा, अगर ऐसा न हो. यही हमारे संविधान में लिखा गया और संविधान बनाने वालों का मंसूबा भी यही था. यह संविधान है, जो हमें बांधे हुए है. यह ऐसा देश बनाता है, जिसमें सबको समान इज्जत से देखा जाता है. नहीं तो हमारे और किसी नगालैंड के लड़के में क्या समानता है?
अगर आप चीन और भारत की तुलना करें तो भारत की आबादी है  120 करोड़ और चीन की है 130 करोड़, हमसे दस करोड़ ज़्यादा. चीन का क्षेत्रफल हमसे दो-ढाई गुना अधिक है. चीन में बड़े पैमाने पर समरूपता है. सभी के मोंग्लोयड नाक नक्श हैं. एक समान भाषा है, जिसे कहते हैं मैंडारिन चाइनीज़. 95 फीसदी चीनी लोग एक ही नस्ल के हैं, जिन्हें कहते हैं हान चाइनीज़. चीन हमसे भले ही बड़ा है, लेकिन वहां पूर्ण समरूपता तो नहीं है, लेकिन व्यापक समरूपता है. यहां भिन्नता बहुत है, क्योंकि हमारा देश प्रवासियों का देश है. कौन थे भारत के मूल निवासी? पहले सिद्धांत था कि द्रविड़ इस देश के मूल निवासी थे, लेकिन आज यह सिद्धांत खंडित हो गया है. अब यह साबित हो गया है कि द्रविड़ भी बाहर के थे. सिंधु घाटी सभ्यता, जो अफगानिस्तान-पाकिस्तान में पाई गई, ये उसके थे. इसका सबूत एक भाषा है ब्राहुई, जो पश्चिमी पाकिस्तान-ब्लूचिस्तान में बोली जाती है, जिसे 30 लाख लोग आज भी बोलते हैं. यह भाषा तमिल जैसी है. लेकिन आश्चर्य की बात है कि तमिल वहां कैसे पहुंच गई. वहां हज़ारों साल पहले रहे तमिलों के अवशेष के रूप में यह भाषा रह गई है. तो अब जो सिद्धांत है, वह यह है कि भारत के मूल निवासी द्रविड़ों के पहले रहने वाले जनजातीय और आदिवासी लोग थे, जैसे भील, संथाल, गोंड या तमिलनाडु में टोडा. ये अब मुश्किल से सात-आठ फीसदी रह गए हैं. हमारे पूर्वजों ने इन्हें जंगलों और पहाड़ों में धकेल दिया.
दूसरा सवाल यह उठता है कि हमारे पुरखे, जो पलायन करके यहां भारत में प्रवासी बनकर आए तो क्या प्रवासी ही रह गए या भारत में किसी समान संस्कृति ने जन्म लिया. इसका जवाब यह है कि भारत में प्रवासियों में आपसी मेलजोल से निकली एक समान संस्कृति और मैंने इसका नाम रखा है संस्कृत-उर्दू संस्कृति. यह इस मुल्क की संस्कृति है. कभी मैंने कहीं यह बात कही तो एक सज्जन बोले कि संस्कृत और उर्दू का क्या मेल? मैंने जवाब दिया कि संस्कृत तो दादी है उर्दू की. इन दोनों में बहुत गहरा रिश्ता है. मैं सभी भाषाओं का बहुत सम्मान करता हूं. बंगाली में शरत चंद्र सरीखे लोगों ने बहुत अच्छा साहित्य लिखा. इसी तरह तमिल, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया और कश्मीरी में बहुत अच्छा साहित्य लिखा गया. इसके बावजूद संस्कृत और उर्दू का ख़ास स्थान है हमारे मुल्क में. यह दोनों हमारी महान राष्ट्रीय भाषाएं हैं. जब हमारे देश में एक समान संस्कृति यानी संस्कृत-उर्दू संस्कृति ने जन्म लिया तो फिर यह फिरकापरस्ती या सांप्रदायिकता आई कैसे?
जो मुस्लिम आक्रमणकारी इस देश में आए (जैसे बाबर), उनके बच्चे (जैसे अकबर) तो बाहरी नहीं हुए. उसी तरह जैसे हमारे पूर्वज बाहरी कहे जा सकते हैं, लेकिन हम लोग नहीं. ऐसे मुस्लिम शासक क्षेत्रीय शासक हो गए. उन्होंने देखा कि हिंदू तो बहुसंख्यक हैं और यदि उनके मंदिर वगैरह तोड़े गए तो रोज़ बगावत होगी. कोई राजा नहीं चाहता कि उसके राज्य में रोज़ बगावत हो, वह चाहता है कि अमन चैन बना रहे. जितने भी मुस्लिम शासक थे, उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा दिया. मैं उत्तर प्रदेश का हूं, वहां नवाब होली-दीवाली मनाते थे, रामलीला का आयोजन करते थे और हिंदू ईद मनाते थे और शिया संप्रदाय के साथ मुहर्रम में शोक मनाते थे. मुर्शिदाबाद के नवाब भी हिंदुओं के साथ त्योहार मनाते थे. टीपू सुल्तान मंदिरों को सालाना अनुदान देता था. ये बातें दबा दी गईं और किसी भी किताब में दर्ज नहीं हैं. यह जरूर बताया गया कि महमूद गजनी ने सोमनाथ का मंदिर तोड़ा.
हमारा जो इतिहास लिखा गया, वह अंग्रेजों ने लिखा, जो फूट डालो-राज करो की नीति से प्रेरित था. इतिहास लिखा ही गया आपस में नफरत पैदा करने के लिए. ऐसा उल्लेख है कि टीपू ने  पंडितों से मुसलमान बनने को कहा, जिस पर उन्होंने आत्महत्या कर ली. यह मैसूर गजेटियर में मिलता है. ऐसा कुछ भी उस गजेटियर में नहीं लिखा और यह कोरा झूठ है. पता चला कि वह मंदिरों को सालाना अनुदान देता थू उर श्रंगेरी के शंकराचार्य को कई बार उसने धन्यवाद पत्र भेजा कि उनकी कृपा से उसका राज्य बहुत खुशहाल  है. इतिहास ही पलट दिया गया. ऐसा हुआ क्यों और कैसे? यह सब शुरू हुआ 1857 की लड़ाई के बाद. इसके पहले कहीं कोई फिरकापरस्ती नहीं थी. 1857 की बगावत में हिंदू और मुसलमान एक साथ लड़े, लेकिन अंग्रेजों ने बगावत को कुचल दिया. उन्होंने सोचा कि अगर भारत पर हुकूमत करनी है तो हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़वाना पड़ेगा और कोई रास्ता नहीं है. यह ज़हर बोते-बोते 1947 का विभाजन सामने आ गया. जब विभाजन के दौरान सांप्रदायिक हिंसा ने उत्तरी भारत के लोगों को पागल कर दिया था, तब पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक राज्य घोषित कर दिया. आप सोच सकते हैं कि पंडित नेहरू और उनके साथियों पर कितना भारी दबाव रहा होगा कि भारत को भी हिंदू राज्य घोषित कर दिया जाए, लेकिन उन्होंने संयम और विवेक बनाए रखा और कहा कि देश सेकुलर रहेगा. यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उस समय दबाव को झेलना इन लोगों के बड़प्पन की निशानी है.
यह देश सेकुलर होकर ही चल सकता है. एक दिन भी नहीं चल पाएगा, अगर ऐसा न हो. यही हमारे संविधान में लिखा गया और संविधान बनाने वालों का मंसूबा भी यही था. यह संविधान है, जो हमें बांधे हुए है. यह ऐसा देश बनाता है, जिसमें सबको समान इज्जत से देखा जाता है. नहीं तो हमारे और किसी नगालैंड के लड़के में क्या समानता है? भारत में असली संघवाद है, जिसमें क्षेत्रीय संवेदनाओं को भी आपस में समान स्तर दिया गया है, क्योंकि हम सभी बाहर से आए प्रवासी हैं और हमारे भीतर बहुत भिन्नता है. हम एक साथ इस संविधान से बंधे हुए हैं और यह भिन्नता हमारी कमजोरी नहीं, ताकत है.markandeykatju@chauthiduniya.com
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हैं) 






सोमवार, 2 मई 2011

End of Osamaism /Patrick Michael*


He chucked away his $250m
inheritance to take on
the communists in Afghanistan
and then the US? But the
million dollar question now is:
What after Osama bin Laden?

It could be regarded as an irony in the political theatre of war and peace. The man who won the Nobel Prize for Peace ordered a killing. And the man taken had a reward of $25 million on his head.
For the world that still believes in fairy tales, it was classic good versus evil, the triumph of the superhero over the super-evil. Politics, even war, is never as simple as that. One man’s hero is another man’s villain. One man’s target is another man’s martyr.
But perhaps the biggest take-away from the death of Osama bin Laden is a not-so-subtle reminder from US President Barack Obama that patience pays.
And perhaps the biggest miss for the world media was to pass by a rather innocuous story on the very day that Obama sought to silence the ‘birther’ conspirators that he is a legit American by publicising his birth certificate.
Among the hundreds of other stories that were shunted to the inner pages was a news story that Obama plans a reshuffle that would place General David Petraeus, the commander of the International Security Assistance Force (ISAF) and US Forces Afghanistan (USFOR-A) as the head of CIA.
So while the world at large was watching the comedy of Donald Trump, aspiring to be president, and Obama in retreat mode, the US President, apparently, was firming up the last salvo. And that was a real trump, a masterstroke that could elevate his ratings to record highs.
Now, with news of Bin Laden’s death, it seemed only logical to assume that Obama and Gen. Petraeus knew that the final offensive was near; like his arguable triumph in Iraq, Gen. Petraeus will not return to the US empty-handed. Although executed under a different jurisdiction than Afghanistan, the killing of Bin Laden is as much as success for Gen. Petraeus as for Obama.
In his remarks to officially announce the death of Bin Laden, Osama singles out the CIA for its unrelenting offensive on Al Qaeda. He said: “I directed Leon Panetta, the director of the CIA, to make the killing or capture of Bin Laden the top priority of our war against al Qaeda, even as we continued our broader efforts to disrupt, dismantle, and defeat his network.”
Conspirator theorists and some of the world’s most researched scholars, including Adam Curtis, the man who made the brilliant documentary The Power of Nightmares, will argue that the Al Qaeda threat was hugely inflated and that Bin Laden himself had come to know of Sept 11 only on the very day.
But the death of the man who is attributed with some of the world’s most shocking atrocities will come as a relief to a large section of the world. And it will be a crowning glory for Obama, who was increasingly under pressure both at home and abroad for being an orator rather than a doer.
On hindsight, and as analysts huddle together to discuss the world as it is now, a clear trend emerges. There is a calculative side to Obama, which perhaps is imperative for world politics.
Imagine this: A few hours before he addresses the world in his sombre style that ‘the death of Bin Laden marks the most significant achievement to date in our nation’s effort to defeat Al Qaeda”, he was fending off Donald Trump, demolishing the business tycoon, reducing him to a caricature, making the man who relishes “to fire”, be pot-roasted in full media glare. Did Obama even give away an inkling that he had a bigger ace up his sleeve? He knew that revenge is best served cold, and with the success of his forces in Pakistan in killing Osama, the foreign policy approach of the US President seems to be more in focus than ever before.
That the ‘anti-war’ president had committed troops to Afghanistan was in fact a letdown for legions of his followers around the world. It was as if the presidential victory of Obama was just another ceremonial handover of crown than a policy shift.
News that US troops were “willing” to stay put in Iraq even after the deadline for withdrawal was another uncomforting sign that America was more interested in war mongering than peace.
For a man who called on the Arab world to embrace democracy at his famous Cairo speech that endeared him to Egyptians, his apparent reluctance to outrightly endorse the Arab Spring that blossomed in Tahrir Square equally befuddled his fans.
After all, could it be faulted to say that Obama, perhaps, had seeded the idea of an Arab Spring through his speech described as the “most powerful in history”.
Recall his words: “I do have an unyielding belief that all people yearn for certain things: the ability to speak your mind and have a say in how you are governed; confidence in the rule of law and the equal administration of justice; government that is transparent and doesn’t steal from the people; the freedom to live as you choose. Those are not just American ideas, they are human rights, and that is why we will support them everywhere.”
But why did he appear to be dithering, when practically the rest of the world wanted the US to intervene in Libya? Today, as even Gulf commentators ask NATO forces to restrain from killing Col Muammar Gaddafi, it appears that slow-tracking on the Libyan offensive by Obama made sense — at least to America.
When history will convene on the atrocities that Libya as a nation suffered, the judgment will be skewed with venom on Nicholas ‘France’ Sarkozy and David ‘Britain’ Cameron but Barack ‘US’ Obama will largely be spared the ire.
As the New Yorker story of this week, ‘The Consequentialist’ notes, “Just a year before coming to Washington, State Senator Obama was not immersed in the dangers of nuclear Pakistan or an ascendant China; as a provincial legislator, he was investigating the dangers of a toy known as the Yo-Yo Water Ball. (He tried, unsuccessfully, to have it banned.)”
Today, he swings the yo-yo with the world; one swing, a swipe at fundamentalism; the other a take on his detractors at home.
The man has learnt his turf. But the question remains: Osama is now no more, but is this the end of Osamaism?
If we indeed believe that Al Qaeda was practically a small motley crew of die-hard fundamentalists and not the multi-tentacled monster as we know it, will Osama’s death serve as a rallying force for the do-or-die followers who believe in a cause espoused by the man who chucked away his inheritance of $250 million to fight the communists in Afghanistan? Obama might be working on this already.
Communism created the legacy of Osama; the capitalistic America, a wee left leaning under Obama, killed him.
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*Patrick Michael is the Executive Editor of Khaleej Times