पत्रिका : वीक एंड टाइम्स, संम्पादक : संजय शर्मा, कार्यालय : गोमती नगर , लखनऊ (उत्तर प्रदेश) पृष्ठ :१६, मूल्य : 0५.६०. किसी भी पत्रिका का सम्पादकीय पक्ष पत्रिका की दृष्टि उजागर करता है. संजय शर्मा के संम्पादन में छपने वाले साप्ताहिकी 'वीक एंड टाइम्स' के सम्पादकीय काफी गौर-तलब होते हैं. मिसाल के तौर पर हम २-८ अक्टूबर,२०१० के सम्पादकीय को सामने रख सकते हैं जिसमें विवादित मंदिर मुद्दे पर उच्च-न्यायलय के निर्णय को फोकस किया गया था. सहमति-असहमति अपनी अलग जगह है, किन्तु विचारो का सुलझे अंदाज़ में पेश करना दूसरी बात है. यही दृष्टिकोण संपादक को उसके वैचारिक ज़मीन पर लाकर खड़ा करती है. "इसबार धर्मावलम्बियों ने यह कहकर राजनेताओं के मुंह पर ताला लगा दिया कि इस मुद्दे को राजनीति के फड से मत घसीटिए." इस साप्ताहिक पत्र में पाठकों को व्यंग्य, बहस, आपसे संम्वाद, खेल-व्यापार, पुस्तक समीक्षा, कविता, फिल्म आदि को केंद्र में रखकर लिखे गए इस अंक के लेख सामयिक एवं प्रासंगिक हैं. क्षेत्रीय पत्रों के महत्त्व को यदि गंभीरता से देखा जाए तो हम देखते हैं कि वहां पत्रिकारिता के पास आज भी मूल्य और उद्देश्य सुरक्षित हैं. --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग (प्रबंध संपादक)
nfpma (News-Features Press Media Alliance RN.256/73),New Delhi
शनिवार, 8 जनवरी 2011
*अक्षर-अक्षर सत्य* की भूमिका के रूप में श्री कम्लेश्वेर की ऐतिहासिक टिपण्णी
'डॉ. रंजन जैदी' की रचनात्मकता से सभी सुपरिचित हैं.
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| ISBN:978-81-89997-74-8 |
उनकी रचनात्मकता का दूसरा आयाम पत्रकारिता है जिससे मैं व्यक्तिगत तौर पर परिचित हूँ और उनके पाठक दैनिक पत्रकारिता में उनका नाम न पढ़कर भी उनकी पैनी शैली और अंतर्दृष्टि से परिचित रहे हैं और उन्हें लगातार पढ़ते रहे हैं, इसकी जानकारी भी मुझे है. गंभीर साहित्य और तात्कालिक पत्रकारिता में व्यस्त रहने वाले लेखक के पास समय की कमी हमेशा रहती है, इसके बावजूद डॉ.रंजन जैदी पुस्तकें पढने का समय निकालते हैं और साथ ही समीक्षा जैसी रूखी और अपठित विधा को अपना समय देते हैं.
तो ज़ाहिर यही होता है कि वे केवल अपने लेखन को ही नहीं, अपने समकालीनों के लेखन को भी उतना ही सम्मान देते हैं, यह एक दुर्लभ प्रवृति है.जो अब प्रायः अप्राप्य सी हो गई है.
पुस्तक समीक्षा (विधा) की सबसे पहली कोशिश 'छत्तीसगढ़ मित्र' (रायपुर, म.प्र.) में उसके यशस्वी संपादक पंडित माधव वि सप्रे ने की थी जो पाठक और लेखक के बीच सेतु का काम करती थी, कालांतर में यह विधा लेखक, प्रकाशक और समीक्षक के त्रिकोण में सिमट गई, पाठक को निर्वासित कर दिया गया.
'समीक्षायन' से लगता है कि पाठक की वापसी होगी, क्योंकि इस पुस्तक में जिन रचनाओं पर विचार किया गया है, वे बड़े प्रकाशनों के प्रकाशन नहीं हैं, साथ ही अपेक्षाकृत कम चर्चित लेखकों पर या फिर अन्य भाषाओँ की रचनाओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया है.. इससे ज़ाहिर होता है कि उन्होंने बड़े प्रकाशक या बड़े लेखक को वरीयता न देकर संभवति: बड़े लेखन को रेखांकित करना श्रेयस्कर समझा है.
इसलिए मुझे लगा कि उन्हें धन्यवाद दिया जाए--क्योंकि प्रायोजित समीक्षाओं के इस दौर में अपने मन की कृति को उठाना, उसे पढना और पाठकों के लिए संप्रेषित करना भी आज के अवमूल्यित दौर में ज़रूरी हो गया है.--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग (प्रबंध संपादक)
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