भ्रष्टाचार के मुद्दे को अन्ना ने राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है. अब देश की खाने की मेजों, ढाबों और चाय के कहवाखानों तक यह बहस शुरू हो चुकी है कि क्या देश से सचमुच भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा? अन्ना और उनके नेक्स्ट टू अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि ६० से ६५ प्रतिशत कमी तो आयेगी ही. हो भी सकता है लेकिन ऐसा संभव नहीं लगता है. न लगने के कई कारण हैं. हमारे यहाँ कानून सख्त हो सकते हैं किन्तु उनके सूराख समय के साथ बड़े हो जाते हैं. मेरे एक मित्र आईएएस अधिकारी ने मुझे बताया कि अपने स्वभाव के अनुसार रिश्वत लेने का जीवन में सवाल ही पैदा नहीं होता था. जिला अधिकारी बने तो एक बड़े व्यवसाई ने कामन फ्रैंड से शर्त लगाई कि इस देश में ईमानदार अफसर सरकारी तंत्र में रहकर नौकरी कर ही नहीं सकता. वह आई ए एस को घूस देकर ही रहेगा. एकदिन व्यवसाई मेरे मित्र के घर गया तो उसके पास बहुत कीमती बनारसी साड़ी के कुछ नग भी थे. उसने आई ए एस की श्रीमती को नग दिखाते हुए कहा की भाभी आप को तो तजुर्बा होगा कि मेरी बहन कैसी साड़ी पसंद कर सकती है. मैं उसे इस बार राखी के दिन बनारसी साड़ी देना चाहता हूँ. महंगी भी नहीं हैं... श्रीमती ने बनारसी साड़ी की कीमत पूछी तो सन्न रह गईं.२५-३० हज़ार रूपये की साड़ी मात्र ९००-१००० में? तड़ से कहा कि अगर ऐसा है तो वह उसे भी कुछ साड़ियाँ लादे .व्यापारी कीमती साड़ियाँ घर लाता रहा. श्रीमती अपने खानदानवालों को भी ओब्लायिज करती रहीं. व्यवसाई ने घर में अपनी पैठ बनाई तो बड़े गिफ्ट भी देने लगा.आई ए एस से व्यवसाई के लिये सिफारिश भी करने लगीं. एक दिन भेद खुला तो पता चला कि..........नौकरशाही में बहुत से ऐसे काण्ड हुए हैं. घूस अब हमारे चरित्र में एक वायरस की तरह घुस गया है. अरविन्द केजरीवाल कमसिनी में ही आई आर एस की कमिश्नरी छोड़ आन्दोलन में कूद गए, देश ज़िक्र नहीं कर रहा है. कह रहा है कि अन्ना एंड अन्ना की टीम के सदस्य. अरविन्द चाहते तो रिश्वत में नहाते.लेकिन सब छोड़ दिया. मैं ऐसे पूर्व भारतीय अधिकारी को सलाम करता हूँ. सलाम करता हूँ उस महान त्यागी आई आर एस अधिकारी महिला को जो अरविन्द की पत्नी हैं और पति को भरपूर समर्थन देते हुए अपने परिवार को संभाल रही हैं. इस देश में ईमानदार और नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले अधिकरियों की कमी नहीं है. ऐसे नेता भी हैं लेकिन चुनाव-प्रणाली सही नहीं है. एक चुनाव प़र ५ से १० करोड़ रूपये खर्च होते हैं. व्यापारी रूपयों का प्रबंध करता है. सत्ता में आते ही वही व्यापारी नेता से ५०० करोड़ की छूट हासिल कर लेता है. भ्रष्टाचार हमारे रग-रेशे में है. एन्जिओज़ भ्रष्टाचार के रहते भी निःस्वार्थ काम कर रहे हैं लेकिन वे अभावग्रस्त हैं. पुलिस भ्रष्टाचार की जड़ में है, हर साल लाखों में पुलिस थाने नीलाम होते हैं. किरण बेदी भी जानती हैं. वीकली बाज़ारों से पुलिस उगाही करती है. फुटपाथ किराय प़र उठा देती है. सब-रजिस्ट्रार ओफिसेज़ में सब रजिस्ट्रार ५० पैसे लेता है, क्लर्क २५ पैसे, बाकी के लोग १५ और १० पैसे लेते हैं. प्रति-दिन लाखों का बैनामा होता है, घूस की कमाई का अनुमान लगाया जा सकता है. ये घूस का पैसा ऊपर तक जाता है. हाइडिल के एक बड़े अधिकारी ने (मुलायम सरकार के समय) कभी मुझे बताया था कि जब वह गाज़ियाबाद कमिश्नरी चाहते थे तो उनसे एक तत्कालीन मंत्री ने सीधे ५ या १५ लाख की मांग की थी. हर मंत्री कुर्सी प़र आते ही पैसा बनाने लग जाता है. सारा तंत्र भ्रष्ट हो चुका है. अन्ना के आन्दोलन की तड़प यही है. लेकिन रास्ते आसान नहीं हैं. नेक रास्तों प़र चलने की सलाहियत होते हुए भी देश का भ्रष्ट वर्ग कभी भी लक्ष्मी का मोह त्याग नहीं पायेगा क्योंकि लक्ष्मी देवी है और देवी की पूजा होती है.शुभ+लाभ हमारा चरित्र है जिसे बदलना आसान नहीं होगा. अन्ना को देर-सवेर अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी बनानी ही होगी जो संसद में पहुंचकर बेहतर काम कर सके. यही लोकतान्त्रिक तरीका कारगर सिद्ध हो सकता है. अरविन्द केजरीवाल को बचकानी जिद छोडनी होगी कि वे राजनीति में नहीं आएंगे. हालाँकि अभी तो चमत्कारों का इंतजार करना चाहिए. विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
समग्र विचार मंच nfpma- SAMAGRA VICHAR MUNCH
nfpma (News-Features Press Media Alliance RN.256/73),New Delhi
सोमवार, 22 अगस्त 2011
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
ग़ज़ल/रंजन ज़ैदी /غزل / رنجن زیدی
کھیل گڑيو کا حقیقت میں بدل جائے گا،
پھر کوئی خواب غمے -- ذيست میں ڈھل جائے گا.
بند مٹھی سے نکل آئے جو سورج باہر،
موم کا شهر ہے، ہر سمت پگھل جائے گا.
دیکھتے -- دیکھتے سب اڑ گئیں چڑیاں یاں سے،
اب میرا گھر بھی کڑی دھوپ میں جل جائے گا.
ایک مٹی کے پيالے کی طرح عمر کٹی،
دھوپ کی طرح رہا وقت نکل جائے گا.
گھر کی دیواریں بھی بوسيد کفن اوڑھے ہیں،
اب توپھا میرے خوابوں کو نگل جائے گا.
ہم نے مایوس كمدو سے نہ جوڑے رشتے،
ہجر کی رات کا یہ چاند ہے، ڈھل جائے گا.
खेल गुड़ियों का हकीकत में बदल जायेगा,
फिर कोई ख्वाब ग़मे-ज़ीस्त में ढल जायेगा.
बंद मुट्ठी से निकल आये जो सूरज बाहर,
मोम का शह्र है, हर सिम्त पिघल जायेगा.
देखते - देखते सब उड़ गईं चिड़िया यां से,
अब मेरा घर भी कड़ी धूप में जल जायेगा.
एक मिटटी के प्याले की तरह उम्र कटी,
धूप की तरह रहा वक़्त निकल जायेगा.
घर की दीवारें भी बोसीदः कफ़न ओढ़े हैं,
अबकी तूफाँ मेरे ख़्वाबों को निगल जायेगा.
हमने मायूस कमंदों से न जोड़े रिश्ते,
हिज्र की रात का ये चाँद है, ढल जायेगा.
विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
پھر کوئی خواب غمے -- ذيست میں ڈھل جائے گا.
بند مٹھی سے نکل آئے جو سورج باہر،
موم کا شهر ہے، ہر سمت پگھل جائے گا.
دیکھتے -- دیکھتے سب اڑ گئیں چڑیاں یاں سے،
اب میرا گھر بھی کڑی دھوپ میں جل جائے گا.
ایک مٹی کے پيالے کی طرح عمر کٹی،
دھوپ کی طرح رہا وقت نکل جائے گا.
گھر کی دیواریں بھی بوسيد کفن اوڑھے ہیں،
اب توپھا میرے خوابوں کو نگل جائے گا.
ہم نے مایوس كمدو سے نہ جوڑے رشتے،
ہجر کی رات کا یہ چاند ہے، ڈھل جائے گا.
खेल गुड़ियों का हकीकत में बदल जायेगा,
फिर कोई ख्वाब ग़मे-ज़ीस्त में ढल जायेगा.
बंद मुट्ठी से निकल आये जो सूरज बाहर,
मोम का शह्र है, हर सिम्त पिघल जायेगा.
देखते - देखते सब उड़ गईं चिड़िया यां से,
अब मेरा घर भी कड़ी धूप में जल जायेगा.
एक मिटटी के प्याले की तरह उम्र कटी,
धूप की तरह रहा वक़्त निकल जायेगा.
घर की दीवारें भी बोसीदः कफ़न ओढ़े हैं,
अबकी तूफाँ मेरे ख़्वाबों को निगल जायेगा.
हमने मायूस कमंदों से न जोड़े रिश्ते,
हिज्र की रात का ये चाँद है, ढल जायेगा.
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रविवार, 31 जुलाई 2011
उर्दू उपन्यास के १०० साल/रंजन जैदी
उर्दू उपन्यास ने जबसे अपनी उम्र के १०० साल पूरे किये हैं, साहित्यकारों के बीच बहस-मुबाहिसों के बाज़ार गर्म हैं. मजनूँ गोरखपुरी के उपन्यासों को अब स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि उनके समस्त उर्दू उपन्यास हार्डी के उपन्यासों का चरबा है. लेकिन मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा पर
यह आरोप नहीं लगाया जा सकता, बल्कि कहा जा सकता है कि उनका उपन्यास
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सामाजिक जीवन के यथार्थ की ऐसी
मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति रही है जिसने उपन्यास को एक मुकम्मल और पहले
उपन्यास की हैसियत प्रदान कर दी. यह अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम बना जिसने सर
सय्यद के तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आन्दोलन को एक भाषा और
बोलने की शक्ति प्रदान की. इस आन्दोलन की शृंखला में रतन नाथ सरशार, ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले उपन्यासकार अब्दुल हलीम शरर, और मुंशी प्रेमचंद अग्रिणी लेखकों में गिने जाने लगे. १९४८ में फिक्र तौन्सवीं का छठा दरिया भारत-पाक
विभाजन के दौरान लिखी गयी उनकी एक ऐसी डायरी थी जिसमें रोज़ की
सम्प्रदियिक हिंसा, गमन और हिन्दू-मुस्लिम दंगों का रोजनामचा दर्ज किया गया
था. इसे मैंने पहली बार हिंदी में अनूदित कर हिंदी मासिक पत्रिका गंगा (संपादक:कमलेश्वर) में दिया जिसे धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया गया. अब्दुल्ला हुसैन का उपन्यास उदास नस्लें हालाँकि
१९६२ में प्रकाश में आया था लेकिन उसमें अंग्रेजी साम्राज्य के
षड्यंत्रों, अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश, भारतीय आज़ादी के आन्दोलन की
पृष्ठभूमि और अनेक ऐसे आयामों का चित्रण प्रस्तुत किया गया है कि वह एक
क्लासिक की हैसियत हासिल करने में कामियाब होता नज़र आता है. १९६९ में
हयातुल्लाह अंसारी का एक वृहद उपन्यास लहू के फूल का प्रकाशन हुआ जो आज़ादी से पूर्व के हिन्दुतान में रह रहे दलितों की समस्याओं पर आधारित था. कुर्रतुल-एन हैदर का उपन्यास आग का दरिया एक
कालजई उपन्यास सिद्ध हुआ. लेकिन इसके बावजूद कि वर्तमान उर्दू उपन्यास
रचनात्मक दृष्टि, कंटेंट और अपनी यथार्थपरक विशेषताओं के रहते परिपक्व होते
हुए भी इतना निजी और रियलिस्टिक होता जा रहा है कि हम पढ़ते-पढ़ते सीधे
पात्र के साथ उसके बेडरूम तक जा पहुँचते हैं. यह अंग्रेजी संस्कृति तो हो
सकती है, भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश कि संस्कृति नहीं हो सकती जो आज भी
अपनी संस्कृति, इतिहास, परम्पराओं और मानवीय सरोकारों के साथ मानवीय
संभावनाओं के बीच जीने में आनंद की अनुभूति महसूस करते हैं. اردو ناول نے جب سے اپنی عمر کے 100 سال پورے کئے ہیں ، ادیبوں کے درمیان بحث -- مباهسو کے بازار گرم ہیں. مجنو گوركھپري کے ناولوں کو اب واضح طور پر کہا جا سکتا ہے کہ ان کے تمام اردو ناول هارڈي کے ناولوں کا چربا ہے. لیکن
مرزا ہادی رسوا کے ناول امرا ؤ جان ادا ادا پر یہ الزام نہیں لگایا جا
سکتا ، بلکہ کہا جا سکتا ہے کہ ان کا ناول انیسویں صدی کے اتتراردھ کے
سماجی زندگی کی حقیقت کی ایسی نفسیاتی پیش رہی ہے جس نے ناول کو ایک مکمل
اور پہلے ناول کی حیثیت فراہم کر دی. یہ اظہار کا ایسا ذریعہ بنا جس نے سر سید کے اس وقت کے سماجی ، ثقافتی اور سیاسی تحریک کو ایک زبان اور بولنے کی طاقت فراہم کی گئی. اس
تحریک کی سیریز میں رتن ناتھ سرشار ، تاریخی ناول لکھنے والے اپنیاسکار
عبد حلیم شرر ، اور منشی پریم چند اگري مصنفین میں شمار جانے لگے. 1948
میں فکر تونسوي کا چھٹا دریا بھارت -- پاک تقسیم کے دوران لکھی گئی ان کی
ایک ایسی ڈائری تھی جس میں روز کی سمپرديك تشدد ، گمن اور ہندو -- مسلم
فسادات کا روجنامچا درج کیا گیا تھا. اسے میں نے پہلی بار ہندی میں ترجمہ کر ہندی ماہانہ میگزین گنگا (ایڈیٹر : كملےشور) میں دیا جسے سیریل شکل میں شائع کیا گیا. عبداللہ
حسین کا ناول اداس نسلے حالانکہ 1962 میں روشنی میں آیا تھا لیکن اس میں
انگریزی سامراج کے شڈيترو ، انگریزوں کے خلاف احتجاج ، بھارتی آزادی کے
تحریک کے پس منظر اور کئی ایسے ايامو کا عکاسی پیش کیا گیا ہے کہ وہ ایک
کلاسیکی کی حیثیت حاصل کرنے میں كامياب ہوتا نظر آتا ہے. 1969
میں هياتللاه انصاری کا ایک وسیع ناول لہو کے پھول کی اشاعت ہوا جو آزادی
سے قبل کے هندتان میں رہ رہے دلتوں کے مسائل پر مبنی تھا. كررتل -- این حیدر کا ناول آگ کا دریا ایک كالجي ناول ثابت ہوا. لیکن
اس کے باوجود کہ موجودہ اردو ناول تخلیقی نقطہ نظر ، فہرست مضامین اور
اپنی يتھارتھپرك خصوصیات کے رہتے بالغ ہوتے ہوئے بھی اتنا نجی اور ريلسٹك
ہوتا جا رہا ہے کہ ہم پڑھتے -- پڑھتے براہ راست کردار کے ساتھ اس کے بیڈروم
تک جا پہنچتے ہیں. یہ انگریزی ثقافت تو ہو
سکتی ہے ، بھارت ، پاکستان اور بنگلہ دیش کہ ثقافت نہیں ہو سکتی جو آج بھی
اپنی ثقافت ، تاریخ ، روایات اور انسانی ضرورتوں کے ساتھ انسانی امکانات
کے درمیان جینے میں لطف کی احساس محسوس کرتے ہیں.
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गुरुवार, 21 जुलाई 2011
गुंटर ग्रास/रंजन जैदी
वीटेंडम उपन्यास जिसे १९९९ में नोबल प्राईज़ मिला था, जर्मनी की चेतना के रूप में याद किये जाने वाले जर्मन साहित्यकार गुंटर ग्रास ने जब यह उपन्यास लिखा था तब उनकी उम्र मात्र २७ वर्ष की थी.
दूसरे विश्व महायुद्ध के दौरान गुंटर ग्रास कुछ समय तक एक जंगी कैदी रहे थे इसलिए यह उपन्यास उनके अनुभवों का खज़ाना कहा जा सकता है.
उन्हीं अनुभवों प़र केन्द्रित इस उपन्यास के रचयिता का जन्म १९२७ में जर्मनी में हुआ था.
इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र एक ३ वर्षीय बालक है.
गुंटर ग्रास एक उपन्यासकार के अतिरिक्त नाटककार और कवि भी थे. कवि के रूप में उनकी कविता चेंजेज़ यानी परिवर्तन में कवि ने मनुष्य को असीम से ससीम की ओर की यात्रा करते दिखाया है.
वह बताते हैं कि मनुष्य के अचेतन में इच्छाओं के पंख उड़ने के लिये फडफडाते रहते हैं. लेकिन वह उस मुर्गी की तरह है जो हंस की तरह उड़ना तो चाहती है लेकिन उड़ न पाने की बेबसी के अहसास से हताश होकर मानस-समुदाय के बीच रहने प़र मजबूर हो जाती है.
विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
दूसरे विश्व महायुद्ध के दौरान गुंटर ग्रास कुछ समय तक एक जंगी कैदी रहे थे इसलिए यह उपन्यास उनके अनुभवों का खज़ाना कहा जा सकता है.
उन्हीं अनुभवों प़र केन्द्रित इस उपन्यास के रचयिता का जन्म १९२७ में जर्मनी में हुआ था.
इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र एक ३ वर्षीय बालक है.
गुंटर ग्रास एक उपन्यासकार के अतिरिक्त नाटककार और कवि भी थे. कवि के रूप में उनकी कविता चेंजेज़ यानी परिवर्तन में कवि ने मनुष्य को असीम से ससीम की ओर की यात्रा करते दिखाया है.
वह बताते हैं कि मनुष्य के अचेतन में इच्छाओं के पंख उड़ने के लिये फडफडाते रहते हैं. लेकिन वह उस मुर्गी की तरह है जो हंस की तरह उड़ना तो चाहती है लेकिन उड़ न पाने की बेबसी के अहसास से हताश होकर मानस-समुदाय के बीच रहने प़र मजबूर हो जाती है.
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शुक्रवार, 17 जून 2011
PAPA/Arsila Zaidi
| Arsila Zaidi |
When i was born,
You were there to catch me when i fall, whenever and wherever.
When i said my first words,
You were there for me,
to teach me the whole dictionary if need be.
When i took my first steps,youere there to encourage me n.
When i had my first day at school,
you were there to give me advice and help me with my homework.
I might have not done what u asked me to do...
But i know you will be there for me through all these times and more, the good and bad.
So i just wrote this to say to u papa Ranjan Zaidi
'I LOVE YOU PAPA!!!'
बुधवार, 8 जून 2011
समग्र विचार मंच SAMAGRA VICHAR MUNCH: समीक्षा : भ्रम का निवारण/जनार्दन मिश्र
समग्र विचार मंच SAMAGRA VICHAR MUNCH: समीक्षा : भ्रम का निवारण/जनार्दन मिश्र: "लेखक : डॉ. रंजन जैदी हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक 'संस्कृत क..."
विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
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समीक्षा : भ्रम का निवारण/जनार्दन मिश्र
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक 'संस्कृत के चार अध्याय' में लिखा है कि भारत में हिन्दू-मुस्लमान सदियों से साथ-साथ रहते आ रहे हैं, पर एक- दूसरे के बारे में उन्हें सही जानकारी नहीं के बराबर है. प्रतिष्ठित लेखक-कवि, संपादक डॉ. रंजन जैदी के संपादन में प्रकाशित पुस्तक हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान राष्ट्रकवि के इस कथन की पुष्टि करता है.
डॉ. जैदी की पुस्तक में उनकी भूमिका सय्याद मुझसे छीन मत मेरी ज़बान को लेकर स्वनाम-धन्य कुल १२ लेखकों के आलेख संकलित है. आश्चर्य की बात तो यह है कि अपने को हिंदी के अच्छे जानकार मानने वाले सरकारी एवं निजी संस्थानों में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत अधिकाँश अधिकारीयों की जानकारियां इतनी अधूरी हैं कि उन्हें सही पता ही नहीं है कि हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का कितना बड़ा योगदान है. स्वनामधन्य हिन्दू आलोचकों ने भी इस तथ्य पर प्रकाश डालना उचित नहीं समझा. एक सच्चाई और भी है कि विभाजन की त्रासदी का प्रभाव हमारे तत्कालीन साहित्य पर भी पड़ा है. एक अरसे से हिदुओं द्वारा लिखे जा रहे साहित्य से मुस्लिम पात्र गायब होते जा रहे हैं, जबकि मुस्लिम साहित्यकारों के साहित्य से हिन्दू पात्र न तो आज़ादी से पहले गायब थे और न ही आज़ादी के बाद गायब हुए. उनके साहित्य, संस्कृत और समाज में पहले जैसा ही हिन्दुतान बना रहा. मुस्लिम परिवार में पैदा हुए सूफियों ने हुमायूँ पर फिकरे कसे तो वहीं मालिक मोहम्मद जायसी ने अलाउद्दीन खिलजी को भी नहीं बख्शा क्योंकि शासक वर्ग का एक ही धर्म होता है-शासन और सत्ता पर कब्ज़ा बनाय रखना. वो शासक चाहे मौर्या हो या अफगान, तुर्क हो या जाट, लोदी हो या गुर्जर, मुग़ल हो या राजपूत, ब्राह्मन हो या दलित. शासक अत्याचार करता है और शासित अत्याचार सहता है. जब कभी भी इन दोनों के बीच टकराव कि स्थिति जन्म लेती है तो क्रांति की परिस्थितियां तैयार हो जाती हैं. संकलन में एक आलेख बिलग्राम के मुस्लिम साहित्यकार में शेख शाह मुहम्मद फार्मली, मीर जलील सय्यद मुबारक, सय्यद निज़ामुद्दीन मघनायक, सय्यद बरकतुल्ला प्रेमी, मीर गुलाम नबी रसलीन तथा सय्यद मुहम्मद आरिफ जान बिलग्रामी के नामों की विशेष चर्चा की गई है. ये बिलग्राम की धरती के वे प्रतिभा-सम्पन्न मुस्लिम हिंदी भाषा के कवि थे जिन्होंने हिंदी साहित्य की निरंतर सेवा की. अब्दुल वाहिद और शाह मुहम्मद तो हुमायूँ एवं सम्राट अकबर के दरबार से सम्बद्ध थे. उनका अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत तथा हिंदी भाषाओँ पर अच्छा अधिकार था. अब्दुर रहमान पंजाब के प्रथम हिंदी मुस्लिम कवि हैं. उनकी कृति सन्देश रासक को डॉ. हजारी प्रसाद द्वेदी ने अपभ्रंश का बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना है. बाबा फरीद ने फारसी मुल्तानी और कुछ समय हिन्दवी (हिंदी) मे रचना की. एटा के पटियाली गाँव में जन्मे हजरत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य हजरत अमीर खुसरो ने पटियाली में अपनी कविता की रचना की. अमीर खुसरो के ९९ ग्रंथों में से २२ का ही पता चलता है. वे फारसी के चोटी के कवि थे. उनकी भाषा में जहाँ ब्रिज तथा संस्कृत के शब्दों का प्रयोग मिलता है, वहीं खड़ी बोली का शुद्ध रूप भी अच्छी तरह से देखने को मिलता है.अब्दुर रहीम खानखाना,तनसे, रसखान, सूज़न और ताज ,जसे सैकड़ों ऐसे नाम हैं जिनकी रचनाओं को हिंदी साहित्य से यदि निकल दिया जाये तो हिंदी का कलेवर ही नहीं, आत्मा भी सिकुड़ जाएगी. इस पुस्तक में कोई ऐसा लेख नहीं है जिसे संख्या-पूर्ति करने की दृष्टि से संकलित किया गया हो. डॉ. परमानन्द पंचाल,डॉ. शैलेश जैदी, डॉ. हर्मेंद्र सिंह बेदी, डॉ. माजदा असद, नूर नबी अब्बासी, डॉ. ॐ प्रकाश सिंघल, डॉ. इक़बाल अहमद, डॉ. नफीस अफरीदी,डॉ. कौसर यजदानी, डॉ. रवींद्र भ्रमर एवं श्री दुर्गा प्रसाद गुप्ता के साथ-साथ डॉ. रंजन जैदी ने मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में योगदान विषय को रेखांकित करने वाले अपने अलग-अलग लेखो के माध्यम से विषय के साथ न्याय किया है. समग्रता में मूल्याकन किया जाये तो यह पुस्तक पाले हुए भ्रम का निवारण करती है आम पाठकों के साथ-साथ विद्वत-जनों एवं शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तक विशेष रूप से पठनीय है. पुस्तक : :मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी में योगदान,संपादक;डॉ रंजन जैदी; प्रकाशक : श्री नटराज प्रकाशन, ए-५०७/१२, करतार नगर,बाबा श्यामगिरी मार्ग, साऊथ गामडी एक्सटेंशन, दिल्ली-५३, पृष्ठ:१५९; मूल्य : रूपये ३००.०० . ------------------------------------------------------------------------------------------------------ विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठ कों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक
मंगलवार, 31 मई 2011
‘Smokers consume 12 cigarettes per day’/ Asma Ali Zain
31 May 2011 DUBAI Smokers in Dubai, both men and women, consume 12 cigarettes per day making them moderate to heavy smokers, according to statistics released by the Dubai Health Authority on Monday.
Data also shows that one-third of the nearly two million people living in Dubai are exposed to tobacco smoke, either directly or as passive smokers with each resident being exposed to passive smoking for about five hours daily. About 67 per cent of them are exposed to passive smoking at
public places.
The results will pave way for new policies specifically targeting vulnerable groups, said officials after releasing the stats a day ahead of the World No
Tobacco Day which falls today.
“We have collated and analysed critical data on smoking patterns including the percentage of the population who are smokers,” said Laila Al Jassmi, CEO of Health Policy and Strategy Sector at the authority.
On an average, almost one in six UAE national men aged between 25 and 39 smokes daily, showed the survey. Results also showed that Arab expatriates have the highest smoking prevalence of all men in Dubai — 50 per cent higher than other expatriates and double that of UAE national males.
The results, based on the Dubai Household Health Survey (DHHS) of 5,000 households conducted in 2009, asked adults questions pertaining to tobacco use and exposure within the, ‘Smoking Risk Factor and Preventative Health Behaviours’ section of the survey.
It also revealed that the prevalence of smoking among Dubai residents is 17.2 per cent with men being five times more likely to smoke as compared
to women. “The survey asked several questions in terms of prevalence of the use of tobacco including shisha and smokeless tobacco as well as the prevalence of passive smoking,” said Eldaw Abdalla Suliman, Head of Research and Performance Management in DHA’s Health Policy and Strategy Sector.
“Based on the data, we will develop a multi-factorial approach to conduct awareness campaigns targeting vulnerable groups,” he said.
The Ministry of Health has also tied up with the US Centres for Disease Control to conduct the Global Adult Tobacco Survey — the first ever for the entire country, said Dr Wedad Al Maidoor, head of the UAE Anti-Tobacco Committee at the ministry. The survey is expected to start in December
this year.
People in the lowest income quintile and the lowest educational level are approximately twice as likely to smoke compared to people in the richest quintile and the highest educational level. Key findings:
Men who smoke start at the age of 10 and women start at the age of 13.
Thirteen per cent of smokers in Dubai start smoking by the time they complete secondary school. Amongst Emirati men in Dubai who are smokers, one in every five, start smoking by the time they complete secondary school
The prevalence of smoking among UAE nationals is 8.6 per cent.
UAE national men are 10 times more likely to smoke compared to UAE national women with a prevalence of 15.5 per cent as compared to only 1.5 per cent among females.
The prevalence of smoking in the 18 to 24 age group is 16.2 per cent and prevalence of smoking among the UAE Nationals is 8.6 per cent which is significantly lower than any other nationality.
People in the lowest income quintile and the lowest educational level are approximately twice as likely to smoke compared to people in the richest quintile and the highest educational level.
Most of the current male smokers in Dubai (18.1 per cent) smoke on a daily basis and only three per cent smoke occasionally. Current female smokers in Dubai smoke on a daily basis (3.4 per cent) and only 1 per cent smoke
occasionally.
In terms of passive smoking, about 17 per cent of non-smoking Dubai residents are exposed to passive smoking at homes. Men are twice as likely to be exposed to passive smoking (19.8 per cent) as compared to women (9.1
per cent).
About 62 per cent of non-smoking Dubai residents are exposed to passive smoking at work. Men are three times as likely to be exposed to passive smoking at work as compared to women.
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