शनिवार, 29 जनवरी 2011

पत्र पत्रिकाएँ-कथा-चक्र/ सम्पादक : अखिलेश शुक्ल

‘पाखी’
पत्रिका: पाखी, अंक: जनवरी 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: राजेन्द्र परदेसी, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेन्डेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएडा 201303 उ.प्र.
ख्यात साहित्यिक पत्रिका पाखी का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से युक्त है। अंक में  पत्रिकारिता की लक्ष्मण रेखा के तहत एक विचार श्रृंखला प्रकाशित की गई है, जिसमें ख्यात पत्रकारों, विद्वानों ने पेड-न्यूज व वर्तमान पत्रकारिता पर अपने विचार रखे हैं। राम बहादुर राय, पुण्य प्रसून वाजपेयी, एन.के. सिंह, अरविंद मोहन, अरूण त्रिपाठी, विमल कुमार, दिलीप मंडल, विनीत कुमार, कुलदीप नय्यर, श्रवण गर्ग, रामशरण जोशी, आलोक तोमर, संजीव श्रीवास्तव, अली अनवर, शैलेन्द्र एवं ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने पेड-पत्रकारिता पर गंभीर चर्चा व विचार प्रस्तुत किए हैं। प्रकाशित कहानियों में काम (राम स्वरूप अणखी), शाम का भूला (वासुदेव), योग क्षेम (सुषमा मुनीन्द्र) एवं दीमक (गोविंद उपाध्याय) अच्छी व समसामयिक कहानियां हैं। शीबा असलम फहमी न विख्यात कथाकार, उपन्यासकार एवं हंस के संपादक राजेन्द्र यादव से तत्कालीन साहित्य व लेखन पर गंभीर व सार्थक चर्चा की है। वाद-विवाद एवं संवाद के अंतर्गत वंदना राग एवं भरत प्रसाद के विचार सराहनीय हैं। अशोक कुमार पाण्डेय, संदीप अवस्थी, सुशीला पुरी एवं अखिलेश्वर पाण्डेय की कविताएं भूमंडलीकरण के बीच से आम आदमी के जीवन में सुख चैन की आशा जगाती है। तेजेन्द्र शर्मा की ग़ज़ल कुछ खास प्रभावित नहीं कर सकी है। जितने अच्छे वे कहानीकार हैं, उतना अच्छा प्रभाव ग़ज़ल में नहीं छोड़ सके हैं। राजीव रंजन गिरि, विनोद अनुपम एवं अरविंद श्रीवास्तव के लेख स्तरीय हैं व पत्रिका के विविधतापूर्ण स्वरूप को दर्शाते हैं। निर्मला सिंह की लघुकथा सहित पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।
मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का नया अंक
पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डा. वि. रामसंजीवैया, डा. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 60), ई मेल:brsmhpp@yahoo.co.in , फोन/मो. 08023404892, सम्पर्क: 58, वेस्ट आफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर (कर्नाटक)
इस साहित्यिक पत्रिका का स्वरूप हिंदी साहित्य की सभी विधाओं  के साथ समान रूप से न्याय करता है। अंक में एस.पी. केवल, रामचरण यादव, डा. महेश चंद्र शर्मा, प्रो. सुनीता विवेक, डा. एम. शेषन, हितेष कुमार शर्मा, विजय राघव रेड्डी, डा. परमानंद पांचाल, प्रो. बी. बै. ललिताम्बा, डा. टी. जी. प्रभाकर प्रेमी, श्रीमती प्रेमलता मिश्रा, नंदकिशोर शर्मा तथा चतुर्भुज सहाय के लेख प्रभावित करते हैं। देवेन्द्र कुमार मिश्रा की कहानी तथा स्तरीय है। सदाराम सिन्हा, डा. रामनिवास मानव, नरेन्द्र सिंह सिसोदिया, रमेश चंद्र शर्मा चंद्र, लालता प्रसाद मिश्र, रामचरण यादव, त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कविताएं अच्छी हैं। बी. गोविंद शेनाय तथा रामनिवास मानव की लघुकथाएं समयानुकूल हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी अपेक्षित स्तर के हैं।
साहित्य सागर
पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: जनवरी2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 250),फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161 बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, भोपाल म.प्र.
साहित्यिक पत्रिका साहित्य सागर का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार प्रियदर्शी खैरा पर एकाग्र हैं. पत्रिका में उनके व्यक्तित्व पर अखिलेश कुमार चतुर्वेदी, ओम मिश्रा, कांतिकुमार जैन, वैभव कोठारी व महेश श्रीवास्तव के विचार स्वागत योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाओं में नर्मदा प्रसाद मालवीय, गिरिमोहन गुरू, लालबहादुर  चैहान की कविताएं प्रभावित करती है। डा. शरद नारायण खरे, मालती शर्मा गोपिका, अर्चना प्रकाश, सतीश चतुर्वेदी की रचनाएं अच्छी व समयानुकूल हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि स्तरीय बन पड़े हैं।
समावर्तन
पत्रिका: समावर्तन, अंक: जनवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संस्थापक: प्रभात कुमार भट्टाचार्य, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय, कार्यकारी संपादक: श्रीराम दवे, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: अक्षय आमेरिया, मूल्य: 25रू. (वार्षिक 250), ई मेल: samavartan@yahoo.com फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य जगत की स्थापित इस पत्रिका का समीक्षित अंक आंशिक रूप से ख्यात सौन्दर्य कवि शमशेर बहादुर पर एकाग्र है। उनकी कविताओं व अन्य रचनाओं के साथ-साथ पत्रिका के संपादक रमेश दवे, अखिलेश शुक्ल, प्रेम शशांक, रंजना अरगड़े, कृष्ण दत्त पालीवाल, ख्यात आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय, कृष्णगोपाल मिश्र, वरिष्ठ आलोचक प्रो.रमेश चंद्र शाह के आलेख शमशेर बहादुर की कविताओं के साथ-साथ उनके समग्र जीवन पर भलीभांति प्रकाश डालते हैं। पत्रिका के संपादक निरंजन श्रोत्रिय द्वारा बुद्धिलाल पाल की कविताओं का चयन व प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली है। राजी सेठ, नरेन्द्र दीपक, नरेन्द्र गौड़ एवं महेन्द्र गगन की कविताएं समय असमय में न उलझकर सीधे तौर पर अपनी बात पाठकों के सामने रखती हैं। राजेन्द्र परदेसी की कहानी गृहस्थी एक आम मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार की कहानी है। सतीश राठी एवं प्रद्युम्न भल्ला की लघुकथाओं में लघुकथात्मकता की कमी खटकी। एन्तोन चेखव की कथा का रूपांन्तरण ब्रजेश कृष्ण द्वारा पर्याप्त सावधानी से किया गया है। रंगशीर्ष के अंतर्गत सचिदा नागदेव पर उपयोगी व ज्ञानवर्धक सामग्री का प्रकाशन पत्रिका द्वारा किया गया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्थायी स्तंभ व समीक्षाएं भी रूचिकर हैं।
आसपास
पत्रिका: आसपास, अंक: जनवरी2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 32, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com , वेबसाईट:http://www.dharohar.com/ , फोन/मो. 9425007710, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहेता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र.
संवाद पत्रिका आसपास के इस अंक में नवीनतम समाचार प्रकाशित किए गए हैं। अंक में उल्लेखनीय कार्य के लिए पत्रिकाओं को पुरस्कार प्रदान करने का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। समाचार में समावर्तन सहित अन्य पत्रिकाओं के पुरस्कार समाचार सचित्र प्रकाशित किए गए हैं। ख्यात कथाकार उदयप्रकाश  को मिले  साहित्य अकादमी पुरस्कार का विस्तृत समाचार अच्छा व जानकारीपरक है। इसके अतिरिक्त साहित्य अकादमी सिखाएगी हिंदी, गालिब ने पूछा था कि क्या बर्फी हिन्दू है? स्पंदन का सम्मान समारोह, दिव्य समारोह की जानकारी नये विषयों के उपयोगी संदर्भो से साक्षात्कार कराती है। कथाकार संतोष चैबे व कवि आलोक श्रीवास्तव को मिले पुरस्कारों का समाचार जानकर लगता है कि यह पत्रिका का पुरस्कार पर एकाग्र विशेषांक है। ख्यात कवि व आई.ए.एस. अधिकारी पंकज राग को मीरा स्मृति सम्मान का समाचार पत्रिका की अन्य अच्छी व उपयोगी सूचना है। अन्य समाचार भी रचनाकारों को आपस में संवाद स्थापित करने का अच्छा माध्यम बने हैं।
सरस्वती सुमन
पत्रिका: सरस्वती सुमन, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कुंवर विक्रमादित्य सिंह, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100), ई मेल: saraswatisuman@rediffmail.com ,  फोन/मो. 0135.2740060, सम्पर्क: 1, छिब्बर मार्ग, आर्य नगर, देहरादून 248001
उत्कृष्ट साहित्य के लिए समर्पित सरस्वती सुमन का समीक्षित अंक अच्छी रचनाओं से युक्त है। अंक में चंद्रकुंवर बत्र्वाल की 36 कविताएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई हैं। विज्ञान व्रत, बी.पी. दुबे, कुंदन सिंह सजल, शम्मी शम्स वारसी, मेहमूद हमसर अब्बासी, अर्जुन प्रसाद सिंह, सरला भटनागर, नरेश निसार, एम.वसीम अकरम, डा. नलिन तथा शरीफ कुरेशी की ग़ज़लें प्रभावित करती हैं। सत्यनारायण सत्य, अब्बास खान, कंवर विक्रमादित्य सिंह, कमल कपूर, मुकुल सक्सेना, बलजीत सिंह, मनोज अबोध, की कविताएं प्रभावित करती हैं। प्रभुलाल चैध्री, शैलजा अरोड़ा, आकांक्षा यादव, पुष्पपाल सिंह, कृष्ण कुमार यादव, लेख उल्लेखनीय हैं। संजय जनागल, प्रेमचंद्र गोस्वामी, शबनम शर्मा, श्रीमती शुक्ला चैधरी, सत्यनारायण भटनागर की कहानियां आज के समाज व परिवेश पर विचार करती दिखाई पड़ती हैं। रामसहाय वर्मा व आनंद दीवान के व्यंग्य नयापन लिए हुए हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी प्रभावित करती हैं।
अभिनव बालमन
पत्रिका: अभिनव बालमन, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: निश्चल, पृष्ठ: 64, रेखा चित्र/छायांकन/कला सज्जा: दिलीप, पल्लव, मूल्य: 15रू. (वार्षिक 60),फोन/मो. 9719007153, सम्पर्क: शारदायत, 17/238, जेड 13/59, अलीगढ़ 202001 उ.प्र.
बच्चों के लिए निरंतर उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित कर रही पत्रिका के समीक्षित अंक में उपयोगी व ज्ञानवर्धक सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में कुलदीप, विभूति भारद्वाज, अदिति शर्मा तथा अन्य बाल रचनाकारों की अच्छी रचनाएं प्रकाशित की गई हैं। वरिष्ठ रचनाकारों में अभिमेष शर्मा, डा. शंभूनाथ तिवारी, ब्रजनंदन वर्मा, डा. कुलभूषण लाल की रचनाएं बालोपयोगी है। मुकुल व मानव उपाध्याय की कहानियां सच्चे अर्थो में बाल कहानियां कहलाने योग्य हैं। भगवत प्रसाद पाण्डेय की कहानी बच्चों के साथ साथ अधिक उम्र के लोगों के लिए भी उपयोगी है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व पत्र आदि भी बच्चों के समग्र विकास में सहायक हैं।
‘समकालीन अभिव्यक्ति’
पत्रिका: समकालीन अभिव्यक्ति, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ: 64, रेखा चित्र/छायांकन/कला सज्जा: सुनीता वर्मा, मूल्य: 15रू. (वार्षिक 50),फोन/मो. 011.26645001, सम्पर्क: फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली 30
विविध विधाओं के लिए समर्पित पत्रिका समकालीन अभिव्यक्ति का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से स्मृद्ध है। अंक में अशोक प्रजापति, अकबर लाहोरी, चंद्रभान राही, मनीष कुमार सिंह की समकालीन कहानियां प्रकाशित की गई हैं। पत्रिका के लेख साहित्य, समाज तथा कला के लिए समर्पित हैं। विश्वमोहन तिवारी, अनिता एच. भट्ट, नवलकिशोर भट्ट तथा डा. सुरंगमा यादव के लेख विविध विषयों की विवेचना अच्छी तरह से कर सके हैं। राजीव कुमार त्रिगति एवं ऋषिवंश की कविताएं पत्रिका के काव्य स्वरूप को स्पष्ट करती हैं। अनिल डबराल, बुद्धि प्रकाश कोटनाला, कृष्णा श्रीवास्तव की विविध विधाओं की रचनाएं व्यापकता लिए हुए हैं। अनिल शर्मा तथा के.एल.दिवान की लघुकथाओं सहित अन्य रचनाएं भी स्तरीय व विचारणीय है।
शुभ तारिका का मध्यप्रदेश अंक
पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: दिसम्बर 10, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 105, रेखा चित्र/छायांकन: संतोष जडिया , मूल्य: 25रू. (वार्षिक 120),फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी 133001 हरियाणा
ख्यात मासिक पत्रिका शुभ तारिका का समीक्षित अंक मध्यप्रदेश पर एकाग्र है। अंक में मध्यप्रदेश की विरासत के साथ-साथ यहां के रचनाकारों की श्रेष्ठतम रचनाओं का पत्रिका के इस अंक में प्रकाशन किया गया है। बढ़ते कदम मध्यप्रदेश के अंतर्गत महेश श्रीवास्तव, स्वाति तिवारी, सुनीता दुबे, प्रलय श्रीवास्तव व सुरेश गुप्ता के आलेख मध्यप्रदेश की विरासत तथा कला-संस्कृति पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। संजय पतारे, ऋषि कुमार मिश्र, भालचंद्र जोशी, अजातशत्रु, युगेश शर्मा, सच्चिदानंद जोशी, दिलीप चिंचालकर, रामचरण यादव, रुखसाना सिद्दीकी, शैलेन्द्र कुमार शर्मा एवं कृष्णशंकर सोनाने के लेख मध्यप्रदेश की जमीन तथा उसकी सोंधी खुशबू से देश भर के पाठकों का परिचय कराते हैं। निर्मला मांडवीकर, अर्जुन सिंह अंतिम, एवं पदमा राजेन्द्र की रचनाएं सरसता लिए हुए हैं। कांतिलाल ठाकरे, मालती जोशी, डाॅ. रमेशचंद्र की रचनाओं से पाठक लगाव महसूस करता है। शिवदत्त डोगरे, प्रमीला गुप्ता व जगदीश चंद्र जैन की लोक चरित्र की रचनाएं नए पाठकों को हमारे अतीत से परिचित कराती हैं। चंद्रभान राही, मालती बसंत, सीमा शाह जी की कहानियां व अंजना सबि, अखिलेश शुक्ल, अमर गोपालानी, मंगला रामचंद्रन, संतोष सुपेकर, रामशंकर चंचल की लघुकथाएं प्रभावशाली हैं। राम तेलंग, गिरिजा कुलश्रेष्ठ, ऋषिवंश, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, गार्गीशंकर मिश्र, आनंद बिल्थरे, आलोक नेगी तथा महेश श्रीवास्तव की कविताएं मध्यप्रदेश की रचनाशीलता के विविध रूप को सामने लाने के लिए किया गया एक सफल प्रयास है। मध्यप्रदेश के हरदा नगर में उर्मि कृष्ण जी का जन्म हुआ है। उस स्थान का वर्णन बहुत ही मार्मिक व आत्मसात करने योग्य है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि भी स्तरीय व सहेज कर रखने योग्य हैं।
कादम्बिनी क्लब हैदराबाद का ‘पुष्पक’
पत्रिका: पुष्पक, अंक: 16, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डा. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ: 118, रेखा चित्र/छायांकन: , मूल्य: 75रू. (वार्षिक 300), ई मेल:mishraahilya@yahoo.in ,फोन/मो. 040.23703708, सम्पर्क: 93सी, राजसदन, बेंगलराव नगर, हैदराबाद 500038 सी-7, आंध्रप्रदेश
दक्षिण से प्रकाशित प्रमुख साहित्यिक पत्रिका पुष्पक के समीक्षित अंक में विविध साहित्यिक सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित कहानियों में स्नेह स्पर्श (शांति अग्रवाल), बुरे दिन (श्याम कुमार पोकरा), सोच (मधु भटनागर), रिमोट कन्ट्रोल (पवित्रा अग्रवाल) प्रमुख हैं। लघुकथाओं में स्थापना (अखिलेश शुक्ल), काला आखर (आकांक्षा यादव) तथा कुलदीपक (सत्यपाल), लातों के भूत (पंकज शर्मा), प्रेम विवाह (विनोदिनी गोयनका) प्रभावित करती है। डा. अहिल्या मिश्र, ज्ञानेन्द्र साज, रमा द्विवेदी, सुधाकर आशावादी, भानुदत्त त्रिपाठी, ठाकुर खिलवाणी, ज्योति नारायण, रामशंकर चंचल, उमाश्री, सरिता सुराना जैन, पंकज शर्मा, डा. नकवी, कृपाशंकर शर्मा अचूक, मीना गुप्ता, सुरेश चंद्र, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, राजेन्द्र बहादुर सिंह राजन, करण सिंह उढ़वाल, हीरा प्रसाद हरेन्द्र, कुंदन सिंह सजल, ओम रायजादा, कृष्ण कुमार, अशोक अंजुम, साहिल, भगवान दास जैन, सुषमा भण्डारी, मदन मोहन उपेन्द्र, प्रेमलता नीलम, साक्षी भारती, मीना मुथा, सुरेश उजाला की कविताएं, ग़ज़लें, गीत आदि भी उल्लेखनीय हैं। केशव शुक्ला का व्यंग्य अच्छा बन पड़ा है। लेखों में डा. अहिल्या मिश्र, राजकुमारी भटनागर, संपत देवी मुरारका, सीता मिश्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी स्तरीय व पढ़ने योग्य हैं।
‘सनद’
पत्रिका: सनद, अंक: 09, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मंजु मल्लिक मनु, संस्थापक: फजल इमाम मल्लिक पृष्ठ: 128, रेखा चित्र/छायांकन: N.A. , मूल्य: 50रू.यह अंक(वार्षिक 100), ई मेल: manumallick@rediffmail.com ,sanadpatrika@gmail.com , वेबसाईट: http://www.sanad.in/ , फोन/मो. 9868018472, सम्पर्क: 4-बी, फ्रेन्डस अपार्टमेंट, मधु बिहार गुरूद्वारा के पास, पटपड़ गंज, दिल्ली 110092
ख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘सनद’ का समीक्षित अंक प्रभाष जोशी स्मृति अंक के रूप में प्रकाशित किया गया है। स्व. प्रभाष जी के समग्र व्यक्तिव पर पत्रिका ने संग्रह योग्य सामग्री प्रकाशित की हैं। प्रभाष जी ख्यात पत्रकार, संपादक, खेल विशेषज्ञ व साहित्यकार थे। उनके विभिन्न क्रियाकलापों पर पत्रिका में प्रकाशित लेख भलीभांति प्रकाश डालते हैं। जनसत्ता तक उनके अनवरत सफर को लेखों में अच्छे विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया गया है। हरिकृष्ण पाठक, जवाहर लाल कौल, अच्युतानंद मिश्र, रूपेश पाण्डेय, शुभु पटवा, राम बहादुर राय, अनिल बंसल, अंबरीश कुमार, फजल इमाम मल्लिक, जितेन्द्र ठाकुर, संजय सिंह, मेघा पाटकर, नंदिता मिश्रा, डा. सुनीलम, संजय स्वतंत्र, सुरेश कौशिक, संदीप जोशी, मन चतुर्वेदी, जाहिद खान, आशीष गौतम, बनवारीलाल शर्मा, गोविंदाचार्य, विजयन एमजे के लेख संग्रह योग्य व शोध छात्रों के लिए उपयोगी हैं। राजकुमार कुम्भज व प्रेमिला सिंह की कविताएं प्रभाष जी के व्यक्तिव पर पूरी शिद्दत के साथ प्रकाश डालती हैं। पत्रिका के संपादक ने सटीक बात कही है। उनके अनुसार, ‘प्रभाष जोशी का जाना हमारे बीच से एक गांधीवादी चिंतक का जाना है।’ स्व. प्रभाष जोशी जी भारत ही नहीं विश्व पत्रकारिता जगत में वर्षो याद रखे जाएंगे।
‘विश्व हिंदी समाचार’
पत्रिका: विश्व हिंदी समाचार, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र , पृष्ठ: 12, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: उपलब्ध नहीं , ई मेल: whsmauritus@intnet.mu , sgwhs@innet.mu , फोन/मो. 230.6761196 प्रसिद्ध समाचार पत्रिका विश्व हिंदी समाचार के समीक्षित अंक जानकारीपरक व ज्ञानवर्धक समाचारों को स्थान दिया गया है। अंक के मुखपृष्ठ पर मॉरिशस में हिंदी दिवस के आयोजन का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। हिंदी दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में श्री मधुसूदन गणपति ने अपने उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, ‘हिंदी भारत में तथा भारत के बाहर भारतवंशियों को एकता और स्नेह के सूत्र में बांधती है।’ मॉरिशस के कला एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि कुछ ही समय में हिंदी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन जाएगी। इस अवसर पर मॉरिशस के शिक्षा एवं मानवसंसाधन मंत्री माननीय श्री वसंत कुमार बनवारी ने स्पष्ट किया, ‘हिंदी बहुत तेजी से वैश्विक भाषा का रूप ले रही है।’ इंदिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र की निदेशक श्रीमती अनीता अरोड़ा ने अतिथियों की सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया। एक अन्य समाचार के अनुसार, लंदन में हिंदी पुस्तकों का लोकापर्ण कार्याक्रम आयोजित किया गया। यह लोकापर्ण कैलाश बुधवार एवं डॉ. अरूणा अजीतसरिया द्वारा किया गया। भारत नार्वे लेखक सेमिनार का समाचार अच्छा व रूचिकर है। इससे नार्वे में हिंदी के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यो की झलक मिलती है। लंदन में आयोजित सम्मान समारोह में बिहार (भारत) के रंगकर्मी व नाटककार हषिकेश सुलभ को वर्ष 2010 का अंतर्राष्ट्रीय इंदु वर्मा कथा सम्मान से सम्मानित किया गया है। इस कार्यक्रम में महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति व वरिष्ठ साहित्यकार श्री विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया की विश्वविद्यालय विदेशों की हिंदी से संबंधित संस्थाओं के मध्य समन्वय का कार्य करेगा। लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान 2010 तथा ख्यात कथाकार चित्रा मुदगल को मिले दो प्रमुख पुरस्कारों को समाचार पत्रिका ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। अंक में राजस्थान प्रगतिशील लेखक मंच तथा जवाहर कला केन्द्र की पहल पर जयपुर में आयोजित कार्यक्रम का समाचार विस्तृत रूप से प्रकाशित किया गया है।
पत्रिका ने इसे कार्यक्रम की रपट के रूप में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रकाशित किया है। 31जुलाई व 1 अगस्त 10 को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में ख्यात कवि नंद भारद्वाज, जितेन्द्र भाटिया, आदिल रजा मंसूरी, सीमा विजय, दिनेश चारण ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस अवसर पर अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक व कवि श्री नंद भारद्वाज ने कहा, ‘आज पढ़ी गई कहानियों से राजस्थान की समकालीन रचनाशीलता का पता चलता है।’ नई दिल्ली स्थित भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के आडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार श्री मानिक वछावत द्वारा रचित इस शहर के लोग को दिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री रत्नाकर पाण्डेय ने की। प्रो. शिवकुमार मिश्र ने एक कार्याक्रम के दौरान स्पष्ट किया है कि मनुष्यता के लिए साहित्य से जुड़ा रहना होगा।
यह समाचार विचारणीय जानकारी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त मॉरिशस में अनुवाद पर कार्यशाला, अब अ से अनार पढ़ेंगे अमरीकी तथा पोर्टबलेयर में प्रेमचंद जयंती के समचार पत्रिका ने आकर्षक ढंग से विस्तार के साथ प्रकाशित किए हैं। पत्रिका के संपादक राजेन्द्र प्रसाद मिश्र का संपादकीय हिंदी दिवस की धूम के मध्य पाठकों से कुछ अपेक्षा करता है। उनके अनुसार, ‘हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की 7वीं आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी के प्रचार प्रसार से जुड़ी विश्वव्यापी संस्थाएं अपने अभियान को और तेज करे। जिससे संयुक्त राष्ट्र संघ के ज्यादा से ज्यादा सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त करना सहज हो सकेगा।’
‘हिमप्रस्थ’ बाल साहित्य विशेषांक
पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 96, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चौकी, शिमला .4
पत्रिका का स्वरूप व सामग्री देखकर यह कहीं से नहीं लगता है कि यह पत्रिका किसी प्रदेश के प्रकाशन विभाग की होगी। पत्रिका की सामग्री व स्तर प्रभावित करता है। समीक्षित अंक बाल साहित्य पर एकाग्र किया गया है। अंक में बालोपयोगी रचनाएं व विश्लेषणात्मक आलेख प्रकाशित किए गए हैं। समय के साथ बदलता बाल साहित्य (प्रकाश मनु), बाल साहित्य की प्रासंगिकता (जया चौहान), शिशुगीत एवं बाल कविताएं (डॉ. परशुराम शुक्ल), साहित सभी आलेख अच्छे व जानकारीपरक हैं। प्रो. आदित्य प्रचंडिया, ओमप्रकाश गुप्ता, सुशील कुमार फुल्ल, डॉ. दिनेश चमोला, डॉ. अदिति गुलेरी, डॉ. आशु फुल्ल, प्यार सिंह ठाकुर तथा योगराज शर्मा के लेख बाल साहित्य व उसकी वर्तमान उपयोगिता, उपलब्धता पर प्रकाश डालते हैं। रमेश चंद्र पंत, राजेन्द्र परदेसी, साधुराम दर्शक, प्रमिला गुप्ता, डॉ. रामसिंह यादव, डॉ. श्याम मनोहर व्यास, श्याम सिंह घुना, केशव चंद्र, रणीराम गढवाली, द्विजेन्द्र द्विज, नरेन्द्र भारती एवं बालशौरि रेड्डी की बाल कहानियों में बच्चों के लिए अच्छी व मनोरंजक शैली में लेखन कार्य किया गया है। कविताओं में शबाब ललित, रामनिवास मानव, जगदीश चंद्र, ओम प्रकाश सारस्वत, महेन्द्र सिंह शेखावत, पीयूष गुलेरी, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, प्रतापसिंह सोठी, प्रत्यूष गुलेरी, नरेश कुमार उदास, मीना गुप्ता, अरूण कुमार शर्मा, तेजराम शर्मा, हिमेन्द्र बाली, हेमलता गुप्ता, राजकुमार कुम्भज, राजीव कुमार एवं डॉ. रीना नाथ शरण की बाल कविताएं बच्चों के साथ साथ प्रबुद्ध वर्ग को भी अच्छी लगेगी। साथ ही बानो सरताज की एकांकी, प्रेम पखरोल व श्रीनिवास श्रीकांत का चिंतन, प्रदीप कंवर का यात्रा वर्णन अच्छे व रूचिकर हैं।
डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव से पत्रिका के संपादक रणजीत सिंह राणा की बातचीत बाल साहित्य व उसकी प्रासंगिकता पर गंभीरता से विचार करती है। अशोक गौतम व दादुराम शर्मा के व्यंग्य बच्चों को अवश्य ही पसंद आएंगे। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी इसकी लोकप्रियता के संबंध में काफी कुछ कहते हैं।
बाल पत्रिका ‘सुमन सागर’
पत्रिका: सुमन सागर, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: श्याम बिहारी आलोक, संजवी बिहारी आलोक, पृष्ठ: 22, मूल्य: 10रू. (वार्षिक 80), ई मेल:skalok_25dec@rediffmail.com ,फोन/मो. 0983505365, सम्पर्क: विनीता भवन, सवेरा सिनेमा चौक, काजी चक्र , बाढ़ बिहार 803.213
बाल पत्रिका सुमन सागर के समीक्षित अंक में बच्चों के लिए शिक्षाप्रद तथा ज्ञानवर्धक रचनाओं का प्रकाश किया गया है। अंक में राकेश कुमार सिन्हा, पुष्पेश कुमार पुष्प, उमेश कुमार साहू, कंचन सिंह, स्वरूप सिंह, पारस दासोत, सुषमा भण्डारी, तारासिंह, ख्याल नारायण, गाफिल, कृष्णा, ब्रजेश, जमुआर, ईश्वर, नयन कुमार राठी, सहित सभी लेखकों की रचनाएं नयापन लिए हुए हैं।
‘समावर्तन’
पत्रिका: समावर्तन, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ: 114, रेखा चित्र/छायांकन: अक्षय आमेरिया , मूल्य: 25रू.(वार्षिक 300), ई मेल: samavartan@yahoo.com , फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी129, दशहरा मैदान, उज्जैन (म.प्र.)
साहित्य एवं कला पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रभावशाली रचनाओं का समावेश किया गया है। यह जानकार सुखद लगा कि अंक ख्यात लेखक, संपादक व समालोचक विजय बहादुर सिंह पर एकाग्र है। उनके समग्र पर इतनी अच्छी व विविधतापूर्ण सामग्री बहुत दिनों बाद पढ़ने में आयी है। पत्रिका के संपादक रमेश दवे के उन के व्यक्तित्व पर विचार सारगर्भित है। ख्यात कवि अशोक वाजपेयी, कथाकार उदयप्रकाश, कहानीकार जयशंकर  व दिनेश कुशवाहा के विचार एकदम सटीक व संतुलित हैं। पहली बार किसी पत्रिका ने किसी व्यक्तित्व पर बिना किसी पूर्वाग्रह के संतुलित सामग्री का प्रकाशन किया है। उनसे बातचीत व अन्य रचनाएं भी संग्रह योग्य है। लोकप्रिय आलोचक धनंजय वर्मा का लेख, हरि मृदुल की कविताएं समाज का अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करती है। राजकुमार कुम्भज, आशा पाण्डेय, ओम नागर, की कविताएं तथा सिम्मी हर्षिता की कहानी पत्रिका के स्तर में वृद्धि करती है। रंगशीर्ष के अंतर्गत गुन्देचा बंधु के कृतित्व पर नए सिरे से विचार किया गया है। चांदमल गुन्देचा, रमाकांत गुन्देचा के लेख व साक्षात्कार उपयोगी हैं। पत्रिका के अन्य सभी स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं व रचनाएं स्तरीय हैं।
पत्रिका: प्रोत्साहन, अंक: 76 वर्ष2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक:कमला जीवितराम सेतपाल, पृष्ठ: 32, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 60), ई मेल:arts@hotmail.com ,फोन/मो. 022.26365138, सम्पर्क: ई-3/307, इन्लैक्स नगर, यारी रोड़, वर्सोवा अंधेरी पश्चिम मुम्बई 400061
स्व. श्री जीवितराम सेतपाल  द्वारा स्थापित व वर्षो से संपादित पत्रिका प्रोत्साहन का समीक्षित अंक अब पुनः उसी रूप व साज-सज्जा के साथ प्रकाशित हो रहा है, जैसा वह पूर्व में था। अंक में सुदर्शन शर्मा का व्यंग्य, लक्ष्मी यादव की कहानी एवं रामदलाल, नरेन्द्र धड़कन, जसप्रीत कौर जस्सी, हीरालाल जायसवाल एवं रामचरण यादव की कविताएं उल्लेखनीय हैं। डॉ. पूरन सिंह, अशोक मनवानी, सुधा भार्गव की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। शिवशंकर चतुर्वेदी, मिर्जा हसन नासिर एवं बेताब अलीपुरी के गीत अच्छे बन पड़े हैं। स्व.श्री जीवितराम सेतपाल की रचना नेता पुराण आज के संदर्भ पर सटीक बैठती है।                                वाणी प्रकाशन समाचार
पत्रिका: वाणी प्रकाशन समाचार, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अरूण माहेश्वरी, पृष्ठ: 30, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 60), ई मेल:vaniprakashan@gmail.com ,वेबसाईट:http://www.vaniprakashan.in/, फोन/मो. 011.23273167, सम्पर्क: 21ए, दरियागंज, नयी दिल्ली 110002
वाणी प्रकाशन की नवीनतम जानकारी प्रदान करने वाला यह समाचार बुलेटिन साहित्य जगत को नए प्रकाशनों के संबंध में उपयोगी जानकारी प्रदान करता है। समीक्षित अंक में चांद आसमान डाट काम (विमल कुमार), तीसरी ताली (प्रदीप सौरभ), ज़ख्म हमारे(मोहनदास नैमिशराय) उसी शहर में उसका घर(धु्रव शुक्ल), पह-दोपहर (असगर वजाहत), वह जो घाटी ने कहा (पुन्नी सिंह) एवं मुमताज महल (सुरेश कुमार वर्मा) जैसे उत्कृष्ट प्रकाशनों की जानकारी बहुत ही सुन्दर  दर ढंग से प्रकाशित की गई है। अज्ञेय साहित्य की विस्तृत जानकारी एवं आलोचना पुस्तक ‘उत्तर छायावाद काल, दिनकर और उर्वशी’(सं. गोपेश्वर सिंह) इन पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। भील इतिहास के रोमांचकारी एवं मार्मिक उपन्यास ‘मगरी मानगढ़’(राजेन्द्र मोहन भटनागर) की समीक्षा इस उपन्यास को शीघ्र प्राप्त कर पढ़ने की इच्छा जाग्रत करती है। राजस्थान के मेवाड़ इलाके में मोहन गिरि आदिवासियों के मसीहा रहे हैं। उनके साथ (लेखक के अनुसार) लगभग 1500 निहत्थे भील आदिवासियों पर अंग्रेजों ने गोलियां बरसाई थीं। उनमें से 379 आदिवासी मारे गए थे। कर्नल शटन के इस गोलीकांड़ की लोमहर्षक कहानी पाठक की आंखें नम कर देगीं। राघेय राघव के उपन्यास प्रतिदान व कल्पना की जानकारी अच्छी व प्रभावशाली है। अन्य पुस्तकों की जानकारी पाठकों का ज्ञानार्जन करती है।

   --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --प्रबंध संपादक

रंजन जैदी की ३ कविताएँ


वो अमरीकी लड़की

वो नाज़ुक सी अमेरिकी लड़कीज़ुनैन्न कैम्प के दरवाज़े पर खड़ी            
इस्राएली बुलडोजरों कों रोकना चाहती है            
कैम्प में फिलिस्तीनी शरणार्थी हैं       
सभी हैरत में हैं     
बुश प्रशासन में ये कैसा चमत्कार?  
इसाई धर्म में आस्था रखनेवाले          
टॉम हार्न की डायेरी के पन्ने फडफडाते हैं       
जालिम हुक्मरानों पर युध्ध -अपराध का मुक़दमा चले  
बुश-ब्लेअर अपराधी हैं         
ब्रिटेन और अमेरिका हमारा है             
अपराधियों का नहीं              
रेतीली हवा तेज़ है               
इस्राएली बुलडोज़र अमरीकी लड़की की परवाह न कर    
उसे रौंदते हुए       
फिलिस्तीनियों की ओर बढ़ जाते हैं   
संस्कृतियों का लहू               
फिर रेत से लिपट जाता है
गर्म हवा में हिटलर के अट्टहास गूँज उठते है
गैस-चेंबर की लाशें चलने लगती है  
हवा की सरसराहट में कोई पुकार रहा है           
ओह ओदल्फ़ ऐश्मन            
तुम कहाँ हो?                        
      
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त्तुम नहीं जानते       
ताम हार्न दाल कौन था ?  / वो न फिलिस्तीनी था न अरब   
वो न कौम का लीडर था न मीडिया रिपोर्टर    
वो फूलती साँसों के बीच भाग रहा था    
रफा के फिलिस्तीनी कैम्प के एक बच्चे को गोद में लिए हुए         
लाऊडस्पीकर पर चीखता हुआ       
आग मत बरसाओ   
यहूदियो ! आग मत बरसाओ       
प्लीज़ , डोंट शूट       
लेकिन वो लहू -लुहान होकर गिर पड़ा
उसने आसमान पर देखा    
धूप की चादर ने उसे ढ़क लिया था        
वो उठा , बच्चे को गोद में लिए कैम्प पहुँचा    
वो फिर गिरा और माँ को आवाज़ दी      
मैम ! मैंने दूध का हक अदा कर दिया 
अंग्रेजों को शर्मिंदा नहीं किया        
मैं जानता हूँ            
एक दिन कोई अँगरेज़ आएगा      
फिलिस्तीनियों को बतायेगा की धूप की उम्र नहीं होती है ।

फिलिस्तीन का कबूतर

वो कबूतर था             
मेरे ख्वाब में रोज़ आता था  
मेरे कन्धों पे, मेरे सर पे        
वो चढ़ जाता था         
बारहा चोंच से वो गाल को छू लेता था         
मैं समझता था के पैगाम-ऐ-मोहब्बत लेकर  
वो किसी देस से उड़कर मेरे पास आता है   
मेरे अहसास को गर्माता है
रफ्ता-रफ्ता वो मेरी रूहका हिस्सा बनकर    
मेरी हर साँस में खुशबू की तरह घुलता गया
और मैं रेत के सहरा में बिखरता गया                     
एक दिन वो मेरे आँगन में गिरा खू बनकर  
दौड़कर मैंने उसे बढ़ के हथेली पे लिया         
उसने हसरत से मुझे देख के बस इतना कहा          
माँ मेरी आग के सहरा में बहुत रोती है       
रोज़ वो खून से बिस्तर की हिना धोती है    
उससे कहना के तेरा बेटा एक दिन   
एक दिन आएगा अमन का परचम लेकर     
वादिये-रेग पे फिर आग न लगने देगा                       
और परिंदों को न जलने देगा          
उसके पैगाम को अब हमने कलमबंद किया            
उसके खू-आलूदह बदन को भी सहेज लिया            
है ये उम्मीद के एकदिन वो नज़र आएगा     
शाख-ऐ-जैतून मेरे हाथ पे रख जायेगा।--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

Moharram is not festival to celebrate


Moharram is an annual reminder to mankind to learn the art of defeating mightiest misrule, by humble self sacrifice.
Moharram is not festival to celebrate but an annual reminder to learn the art of defeating mightiest misrule by humble sacrifices. Late Dr. Radha Kishan our former president, and great thinker & philosopher said “ Arms are needed to fight against oppression and injustice, if we are prepared to offer sacrifice like Imam Husain.
Since the start of the history of mankind there had always been confrontation between Dharma(Truth) and Adharma(Falsehood). It may be Ramayana or Mahabharata in which Lord Rama and Pandava attained victory ultimately when Lord Rama  killed Ravana and Pandava killed Kaurava.
However, Imam Husain(A.S) the beloved grandson of  Prophet  Mohammad (P.B.U.H) redefined the concept of victory. Imam Husain fought a battle against Yazeed at Karbala and apparently he was martyred along with his 71 companions. But he won the battle against injustice and oppression. His battle was not to attain any kingdom but was a demonstration against injustice and oppression. And he was successful in setting an example of how to and how much to sacrifice while fighting against injustice. Till the end of mankind any nation who wants to rise against injustice will derive courage from the exemplary martyrdom of Imam Husain.
The list of martyrs of Karbala ranges from a 62 year old Habib ibne Mazahir (companion of Imam Husain) to a toddler, Ali Asghar, the six month old son of Imam Husain. They were surrounded by 30,000 strong army of Yazeed, the tyrant ruler of Arab. The water and food supply routes were cut off and they were subjected to extreme hunger and thirst for three days. Yazeed was confident that Imam Husain will succumb under pressure when his companions will leave him alone due to intensity of thirst and hunger. On the contrary the number of martyrs kept on increasing till the last day. In the night 9th Moharram, Imam Husain gathered all his companions and put off the lights in his camps. He advised his companions to leave him alone since Yazeed was only after his head. He told them that they can use the darkness to hide their faces while leaving if they are feeling ashamed. Yet not a single companion left him but vowed to sacrifice their lives on him. His companions has full faith in him (Imam Husain). Therefore, stuck to him. For Imam Husain cause was supreme, whereas for his companions Husain was the cause
After the martyrdom of Imam Husain and his companions, the camps of Imam Husain were set ablaze and the women and children of his household were arrested. The heads of entire 72 martyrs were raised over spears. They were made to march from Karbala in Iraq to Damascus in Syria. They were presented before Yazeed in his court who had misled his courtiers that he had crushed uprising against a rebel. Zainab, sister of Imam Husain was a courageous daredevil lady inspite of being tortured and oppressed throughout the journey from Karbala to Damascus, rebuked Yazid for his dastardly act in front of his courtiers. Imam Zainul Abideen, the only remaining son of Imam Husain who was sick and in chains introduced his father as the grandson of Prophet Mohammed. Learning this fact the entire court became furious with the action of Yazid. To handle the situation Yazeed shifted the responsibility of Karbala massacre over others, who were directly involved. This was the first victory of Imam Husain over Yazid.
 To give a brief background of this tragedy, Yazeed took over the throne on 22nd Rajab, 60 Hijri, after the death of his father Muaviya and immediately sent his messenger to Medina, ordering Waleed, the Governor of Medina to take allegiance (unconditional approval) from Imam Husain. He was an alcoholic tyrant ruler who wanted to undo the reformations brought by Prophet Mohammed. Imam Husain declined allegiance and left Medina in order to wake up the nation which was silent in the face of injustices of Yazid. He was forced to land at Karbala, Iraq on 2nd Moharram along with his small band of companions and family. From 7th Moharrum, the food and water supply was cutoff and
on 10th Moharrum, Imam Husain was martyred along with his companions and relatives.
 Lord Krishna said I take birth on the earth whenever Adharma reaches to its climax. Holy Quran says God has sent His messengers to every nation. Holy books were revealed in different periods in different parts of World for the reformation of mankind. Ved and Purans maybe are among Holy books sent to mankind. It cannot be denied that Almighty must have sent messengers to India as well.
The message of Imam Husain is for the whole mankind. He has shown us way to fight for our honor and freedom. Graceful death is better than disgraced life. He is torch bearer for freedom movement till this world exists. His message reverberates in this world: “Say No to Humiliation”. Father of the Nation Mahatma Gandhi said, “ Mai Bharat ki azadi ke liye apne deshwasio ke liye koi nai cheez leke nahi aya. Mai ne Karbala ke 72 Janbazo se  jo seekha hai use pesh kar diya”. (I did not come with any thing new for the fight for the freedom for our Nation, but took lesson from 72 martyrs of Karbala.--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)