शनिवार, 29 जनवरी 2011

रंजन जैदी की ३ कविताएँ


वो अमरीकी लड़की

वो नाज़ुक सी अमेरिकी लड़कीज़ुनैन्न कैम्प के दरवाज़े पर खड़ी            
इस्राएली बुलडोजरों कों रोकना चाहती है            
कैम्प में फिलिस्तीनी शरणार्थी हैं       
सभी हैरत में हैं     
बुश प्रशासन में ये कैसा चमत्कार?  
इसाई धर्म में आस्था रखनेवाले          
टॉम हार्न की डायेरी के पन्ने फडफडाते हैं       
जालिम हुक्मरानों पर युध्ध -अपराध का मुक़दमा चले  
बुश-ब्लेअर अपराधी हैं         
ब्रिटेन और अमेरिका हमारा है             
अपराधियों का नहीं              
रेतीली हवा तेज़ है               
इस्राएली बुलडोज़र अमरीकी लड़की की परवाह न कर    
उसे रौंदते हुए       
फिलिस्तीनियों की ओर बढ़ जाते हैं   
संस्कृतियों का लहू               
फिर रेत से लिपट जाता है
गर्म हवा में हिटलर के अट्टहास गूँज उठते है
गैस-चेंबर की लाशें चलने लगती है  
हवा की सरसराहट में कोई पुकार रहा है           
ओह ओदल्फ़ ऐश्मन            
तुम कहाँ हो?                        
      
Vke gkWuZ MkWy
त्तुम नहीं जानते       
ताम हार्न दाल कौन था ?  / वो न फिलिस्तीनी था न अरब   
वो न कौम का लीडर था न मीडिया रिपोर्टर    
वो फूलती साँसों के बीच भाग रहा था    
रफा के फिलिस्तीनी कैम्प के एक बच्चे को गोद में लिए हुए         
लाऊडस्पीकर पर चीखता हुआ       
आग मत बरसाओ   
यहूदियो ! आग मत बरसाओ       
प्लीज़ , डोंट शूट       
लेकिन वो लहू -लुहान होकर गिर पड़ा
उसने आसमान पर देखा    
धूप की चादर ने उसे ढ़क लिया था        
वो उठा , बच्चे को गोद में लिए कैम्प पहुँचा    
वो फिर गिरा और माँ को आवाज़ दी      
मैम ! मैंने दूध का हक अदा कर दिया 
अंग्रेजों को शर्मिंदा नहीं किया        
मैं जानता हूँ            
एक दिन कोई अँगरेज़ आएगा      
फिलिस्तीनियों को बतायेगा की धूप की उम्र नहीं होती है ।

फिलिस्तीन का कबूतर

वो कबूतर था             
मेरे ख्वाब में रोज़ आता था  
मेरे कन्धों पे, मेरे सर पे        
वो चढ़ जाता था         
बारहा चोंच से वो गाल को छू लेता था         
मैं समझता था के पैगाम-ऐ-मोहब्बत लेकर  
वो किसी देस से उड़कर मेरे पास आता है   
मेरे अहसास को गर्माता है
रफ्ता-रफ्ता वो मेरी रूहका हिस्सा बनकर    
मेरी हर साँस में खुशबू की तरह घुलता गया
और मैं रेत के सहरा में बिखरता गया                     
एक दिन वो मेरे आँगन में गिरा खू बनकर  
दौड़कर मैंने उसे बढ़ के हथेली पे लिया         
उसने हसरत से मुझे देख के बस इतना कहा          
माँ मेरी आग के सहरा में बहुत रोती है       
रोज़ वो खून से बिस्तर की हिना धोती है    
उससे कहना के तेरा बेटा एक दिन   
एक दिन आएगा अमन का परचम लेकर     
वादिये-रेग पे फिर आग न लगने देगा                       
और परिंदों को न जलने देगा          
उसके पैगाम को अब हमने कलमबंद किया            
उसके खू-आलूदह बदन को भी सहेज लिया            
है ये उम्मीद के एकदिन वो नज़र आएगा     
शाख-ऐ-जैतून मेरे हाथ पे रख जायेगा।--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

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