बोली बदली, भाषा बदली,
बदले आँचल और परिवार.
पगडंडी ने सड़क पकड़ ली,
गावों ने खोये आकार.
चौपालों और गलियारों में
पसर गए सन्नाटे,
छोड़ो लोकाचार,
पहन लो नए मुखौटे.
अब जंगल में शोर बहुत है,
आवाजाही का मौसम,
बूढा बरगद ठूंठ बना है,
दीमक करती है बेदम.
दादी खाट-खंखार में जीती,
बाबा चिट्ठी-पाती में,
बाबू ने पढ़ देहरी लांघी,
छोटू पढता बाती में.
नीम की छत प़र कव्वा चीखे,
बहना हिचकी से बेज़ार,
पहुने आये रिश्ता बनकर,
भैया-भाभी नदियों पार.
नए गणित को परिभाषा दो,
उचित यही है समीचीन,
समीकरण भी बदल रहे हैं,
खुद्दारी है अर्थहीन.
बदले आँचल और परिवार.
पगडंडी ने सड़क पकड़ ली,
गावों ने खोये आकार.
चौपालों और गलियारों में
पसर गए सन्नाटे,
छोड़ो लोकाचार,
पहन लो नए मुखौटे.
अब जंगल में शोर बहुत है,
आवाजाही का मौसम,
बूढा बरगद ठूंठ बना है,
दीमक करती है बेदम.
दादी खाट-खंखार में जीती,
बाबा चिट्ठी-पाती में,
बाबू ने पढ़ देहरी लांघी,
छोटू पढता बाती में.
नीम की छत प़र कव्वा चीखे,
बहना हिचकी से बेज़ार,
पहुने आये रिश्ता बनकर,
भैया-भाभी नदियों पार.
नए गणित को परिभाषा दो,
उचित यही है समीचीन,
समीकरण भी बदल रहे हैं,
खुद्दारी है अर्थहीन.
खुद्दारी है अर्थहीन (वेब पत्रिका अपनी माटी से साभार)
