ब्लैक वाटर के नए प्रबंध-निदेशक बोबी रे ने अमेरिका में उठ रही आवाज़ों को सुनकर और वहां की अदालतों में पूछे जा रहे सवालों की परदापोशी करने के उद्देश्य से इस यहूदी संगठन का नाम बदल कर अब इंटरनेशनल पीस आपरेशन एसोसियेशन रख दिया है. अफगानिस्तान में इस समय सिक्योरिटी कांट्रेक्टर्स की ५२ कंपनीज़ काम कर रही हैं. इनमें ज़ी सर्विसेज़ की बदनाम कंपनी ब्लैक वाटर का नंबर ९ है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई इस संगठन के सैनिकों को दिन के चोर, और रात के आतंकवादी कहते हैं. उन्होंने कई बार चाहा कि अफगानिस्तान से इंगित दहशतगर्द कंपनियों को हमेशा के लिए निकाल बाहर किया जाये लेकिन इसमें उन्हें मुंहकी खानी पड़ी. २०१० में भी उन्होंने उक्त आयातित निजी अमेरिकी कारोबारी कंपनियों पर पाबन्दी लगाने और उनके वीजे समाप्त कर देने की बात उठाई थी मगर उन्हें अमेरिकी सीनेट ने चुप करा दिया था. उन्हीं दिनों अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिक कमांडर डेविड पीटर यास को निर्देशित किया गया कि वह राष्ट्रपति करज़ई पर अंकुश लगाये. अमेरिकी कमांडर ने अपनी मुलाकात के दौरान करज़ई से साफ कह दिया कि अफगानिस्तान से निजी सुरक्षा कम्पनियाँ अमेरिकी मिशन को छोड़कर वापस नहीं जायेंगीं. हालाँकि कमांडर ने अमेरिकी गुप्त मिशन का खुलासा नहीं किया और न ही करज़ई ने उससे आगे कुछ पूछने का साहस किया. अलबत्ता उसने करज़ई को अरबों डालर की मदद का भरोसा अवश्य दिया जिसे आगे चलकर अमेरिकी सीनेट और सुरक्षा परिषद् ने तुरंत मंज़ूरी देदी. हामिद करज़ई शायद २८ जून २००९ को इराक से युद्ध के अंतिम पृष्ठ को बंद कर जब पाल ब्रेमर अमेरिका के लिए रवाना हो रहे थे तो उन्होंने साफ शब्दों में जो कहा था, उसे भूल गए थे. तब पाल ब्रेमर ने कहा था कि चूंकि ब्लैक वाटर ऑर्डर-१७ के अधीन है, इसलिए यह इराक में कहीं भी कार्यवाई करने के लिए स्वतंत्र है. यह स्थिति तभी आगई थी जब अमेरिका के रक्षा मंत्री डॉनालद्ज़ रम्सफील्ड का प्रभाव उनके पद-मुक्त होते ही नाटो की पकड़ कमज़ोर हो गई थी और बुश-प्रबंधन में ज़ी कंपनी के तत्कालीन मालिक एरिक प्रिंस के ब्लैक वाटर संगठन के पांव मज़बूत हो गए थे. स्थिति का लाभ उठाते हुए एरिक ने तुरंत बुश प्रबंधन के समक्ष कांट्रेक्टर-ब्रिगेड उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रख दिया. यह कान्ट्रेक्ट १४ अरब डालर का था जिसे तुरंत मंज़ूर भी कर लिया गया क्योंकि यह पेंटागन पर आ रहे खर्च का मात्र ३० प्रतिशत था. यही नहीं बल्कि २००४ में ज़ी कंपनी के ब्लैक वाटर संगठन ने गुप्त रूप से एक नए संगठन ग्रे-स्टोन डिविज़न लिमिटेड का रजिस्ट्रेशन भी अमेरिका के सेन्ट्रल कांट्रेक्टिंग कार्यालय में करा दिया. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह थी कि विदेशों में पेंटागन के साथ काम करते रहने के उद्देश्य से ज़ी कंपनी ने ग्रे-स्टोन डिविज़न लिमिटेड का रजिस्ट्रेशन बर्बडोज़ में कराया और अमेरिका के बुश प्रबंधन ने इसे टैक्स-मुक्त कंपनी भी करार दे दिया. इसके पैम्फलेट्स में बताया गया कि वह अमेरिकी हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार के आदेश पर एक पल में अपनी ब्रिगेड, इंटेलिजेंस और लड़ाकू बमों से लैस विमान दुनिया के किसी भी देश में उतार सकते हैं. उनमें यह भी प्रचारित किया गया कि उसकी ब्रिगेड में एल्सलवादोर,कोलंबिया, होंडूरास, एक्वाडोर और पेरू के प्रशिक्षित व प्रोफेशनल कमानडोज़ शामिल किये गए हैं और जो क्लाशिन्कोफ़ (एके-४७), ग्लोक-१९, एम्-१६ की सिरीज़ की रायफलों से लैस रहते हैं. यहाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि ब्लैक वाटर ग्रुप में अधिकतर सैनिक चिली के डिक्टेटर अगस्तोपनो की सेना में काम कर चुके प्रशिक्षित, विशेषज्ञ और बहादुर सैनिक हैं. ज़ी कंपनी के अध्यक्ष गेरी जेक्सन का कहना है कि वह अपनी इस नई कंपनी की ताकत बढ़ाने के लिए दुनिया के किसी भी देश से बहादुर और वफादार कमानडोज़ उठा सकते हैं.यानि यह एक ऐसी मुहिम की शुरुआत है जो अंतर्राष्ट्रीय सेना के महत्व की उपेक्षा कर अंतर्राष्ट्रीय निजी सैनिक कंपनियों को संगठित करने और भावी युद्धों से मुनाफा कमाने के कारोबार को बढ़ावा देगी. यह एक ऐसी खतरनाक माफियाई योजना है जो यदि कभी पूरी हो गई तो विश्व-शांति का सूरज सदैव के लिए अस्त हो जायेगा. संतोष इस बात का है कि अब अमेरिका में युद्धोन्मादी बुश की सरकार नहीं है लेकिन वह जीवित है. अमेरिका की नई ओबामा सरकार ने बुश के उन्मादी युद्ध-फोबिया पर कभी उचित बयान नहीं दिया कि बुश और उसके हाली-मवाली मित्र राष्ट्राध्यक्ष युद्ध-अपराधी है और उनपर पर मुकद्दमा चलाया जाना चाहिए. इसके बावजूद अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा मिस्र जाकर मुसलमानों को विश्वास दिलाते हैं कि अमेरिका मुसलमानों का दुश्मन नहीं है. कालांतर में लोगों ने देखा कि अचानक अमेरिकी प्रचार-तंत्र दुनियाभर में वैसे ही तेज़ हुआ जैसा अफगानिस्तान और इराक युद्ध से पूर्व तेज़ कर दिया गया था और सारी दुनिया मुसलमानों से अलाहिदगी बरतने लगी थी. यहाँ तक कि भारत में भी जगह-जगह ब्लास्ट होने लगे थे और पकडे जाने वाले लोग मुसलमान हुआ करते थे. यह अमेरिकी प्रचार का ही नतीजा था कि मिस्र में हुस्नी मुबराक का तख्ता पलट गया. मिस्र में सरकारे आती-जाती रहेंगीं लेकिन वहां अब कभी भी शांति नहीं आ पायेगी क्योंकि मोसाद, सीआईए और ब्लैक वाटर की ख़ुफ़िया फ़ोर्स वहां सक्रिय हो चुकी है. इस्राईल अब अपने पड़ोस में मिस्र को एक शक्तिशाली सैनिक देश के रूप में उभरते देखना नहीं चाहेगा जिसने उसे कभी युद्ध में पराजित किया था. लीबिया पर देर-सवेर अंतर्राष्ट्रीय सेना का कब्ज़ा होने ही वाला है. ब्लैक वाटर के सैनिक वहां सक्रिय हो चुके हैं और कई शहरों पर उन्होंने कब्ज़े कर भी लिए है. रिबेलियन के रूप में वहां ब्लैक वाटर के कमानडोज़ काम कर रहे हैं. लीबिया को गद्दाफी के चंगुल से छुड़ाकर वहां के नागरिकों को आज़ादी का हक़ दिलाने के नाम पर जो नाटक खेला जा रहा है, उसपर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं. यहाँ मिलिट्री प्राईवेटाइज़ेशन के बढ़ते रुझान और पैदा होते खतरों पर जब निगाह जाती है तो दुनिया शायद अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को माफ़ न कर पाए क्योंकि सेना में प्राईवेटाइज़ेशन की शुरुआत बिल क्लिंटन के शासनकाल में हुई थी. हिलेरी क्लिंटन आज भी वर्तमान सरकार में मंत्री हैं और उनके पति बिल क्लिंटन अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके हैं. चूंकि अमेरिका में प्राइवेटाइज़ेशन की शुरुआत का जुनून बिल क्लिंटन के ज़माने में ही हो गया था इसलिए डिक्चेनी ने अवसर का लाभ उठाते हुए राष्ट्रपति बुश के युद्धोन्माद के रंग को गाढ़ा बना दिया और धड़ल्ले के साथ पहली बार ब्लैक वाटर जैसे निजी सैनिक संगठन को इराक की ज़मीन पर उतार दिया हालाँकि इसके २५ हज़ार सशस्त्र सैनिक अफगानिस्तान में प्रयोग की दृष्टि से पहले ही उतारे जा चुके थे और पेंटागन के साथ उनकी कारकर्दिगी ने जो नतीजे बरामद कराये थे, उससे अमेरिका के दोनों राजनीतिक दल इस एजेंडे पर एकमत थे. ब्लैक वाटर जैसे संगठन का निजी कारोबार बिल क्लिंटन के समय में ही फलने-फूलने लगा था, बुश-प्रबंधन ने डिक्चेनी का ब्रेन पाकर इसे अरबो-खरबों डालर के ठीके दे दिए थे जिससे आज अमेरिका की आतंरिक और वाह्य सुरक्षा के बंकरों पर ब्लैक वाटर का कब्ज़ा हो चुका है. यह एक नई और दिल दहला देने वाली स्थिति है जिसपर इराक में अमेरिका के अंतिम सीनियर राजदूत (१९९१ में खाड़ी युद्ध शुरू होने से पूर्व) जो विल्सन की चिंता निश्चय ही नए सवाल खड़े कर देती है. उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह स्थिति बेहद खतरनाक है. वार-कंपनीज़ को अरबों डालर दे दिए गए, परिणाम स्वरूप अमेरिकी राजनीति में एक ऐसे स्वार्थमय-शक्ति-संपन्न समुदाय का उदय हो गया है जो शास्त्र-सम्पन्न है जिसपर कभी न कभी यह सवाल अवश्य उठेगा कि किराये की यह सेना किसके साथ वफादार रहेगी? सुरक्षा एजेंसियों के निजीकरण ने अनेक पेचीदा समस्याएं खडी कर दी है जो देश की आतंरिक सुरक्षा का ग्रहण बन सकती हैं. पेंटागन ने अमेरिकी अदालतों में चल रहे उदध-सम्बन्धी मुकद्दमों को ध्यान में रखते हुए ब्लैक वाटर संगठन को कानूनी रूप से यूनिफार्म कोड ऑफ़ मिलिट्री जस्टिस से आजाद बताना शुरू कर दिया और कहा कि यह एक स्वयंसेवी संगठन है जो युद्ध के दौरान पेंटागन के सैनिकों और अवाम के बीच सेवाभाव के काम करता है. लेकिन आम अमेरिकी नागरिकों के बीच पेंटागन यही प्रचारित करता है कि ब्लैक वाटर संगठन मूलतः पेंटागन फ़ोर्स की ही एक इकाई है. यह विरोधाभास ब्लैक वाटर की सैनिक शक्ति को देखकर और इराक में अमेरिकी वार-मिशन के क्रियान्वयन के दौरान आसानी से देखा जा सकता है. (क्रमशः जारी/-४) -------------------------------------------------------------------------------------------------------- विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक

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