यज़ीद अपनी यज़ीदी पे फख्र करता रहा, झुका सका न यकीं को, झुके न बदरे-हुनैन / वो ज़ुल्म करता रहा और इमाम सहते रहे, हर इक सदी की दुआ बन गए इमाम हुसैन / हुसैनियत की बक़ा को न फिर भी आंच आई, यज़ीद हार गया,ये थे ज़ुल्क़रनैन./ हुसैन क़त्ल तो होते रहेंगे बरसों-बरस, हुसैनियत कभी पामाल हो नहीं सकती / हरेक ज़ुल्म के पीछे छुपा है एक यज़ीद, यज़ीदियत को कहीं भी जिला नहीं मिलती / छुआ नमाज़ में खाके-शिफ़ा तो इल्म हुआ, खुदा गवाह कि कर्बोबला पे क्या गुजरी/ ये शाम शामे-गरीबां है आओ मिल-बैठें / न जाने फिर कभी हम हों, न हों कि ये हिजरी / दुआ करो कि हमेशा मुहब्बतें बरसें, मुहब्बतें हैं इबादत की कीमती गठरी / न कोई ज़ुल्म न ज़ालिम हमारे बीच रहे, ज़मीं पे अम्न का रुतबा हो, खुश हो हर बशरी. --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग (प्रबंध संपादक) .
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