रविवार, 9 जनवरी 2011

पता नहीं वो अकेले में क्यों सुबुकती है/रंजन जैदी


अजीब है कि मुहब्बत पे नाज़ करती है,
पता नहीं वो अकेले में क्यों सुबुकती है.      
गुज़र गई शबे-फुरक़त लो सुब्ह होती है,      
मेरे पड़ोस में दुल्हन अभी भी रोती है.        
मैं बर्फ था तो पहाड़ों ने कर दिया पानी,       
मेरी ज़मीं तो ज़माने से बोझ सहती है.        
वफ़ा का दीप भड़कता है छाई तारीकी,         
बड़े सुकून से फिर भी वो साथ रहती है       
बहुत से लोग हैं कश्ती में जिनसे रिश्ता है,
मेरी निगाह मगर माँ तलाश करती है.         
मैं अपनी आँखें उसे दे तो दूं मगर डर है,    
वो बात-बात पे रोती है, रोती रहती है.  
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. 'समग्र विचार मंच' से जुड़कर अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. --नीना गर्ग  (प्रबंध संपादक)

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