लड़कियों की पढाई को लेकर आज की तरह पहले हमारा समाज न तो इतना गंभीर था और न ही वह शिक्षा की अहमियत को महत्त्व दिया करता था.
आज़ादी के बाद हम ६ दशक पार कर अनुभवों के उस महासागर को पार कर आये है जिसमें लड़कियों को उनके जीवन में कितने ही विषैले सर्पों, मगरमच्छों, शार्कों और ज्वालामुखियों से जूझते हुए हमारे समाज ने देखा और उन्हें बचाया है. आज परिस्थितियाँ बदली हैं. आज कानून ने भी उन्हें अनेक ऐसे अधिकार दिए हैं की वे खुले आसमान के नीचे बेख़ौफ़ होकर उड़ान भर सकती हैं. पहले लड़कियों को पराया धन मानते हुए यह समझा जाता था कि इन्हें पढ़कर क्या करना है. अंततः इन्हें अपने पति के घर जाकर चूल्हा-चौका ही तो संभालना है.
ससुराल में पहुँचते ही सास-ससुर की इच्छा जागृत हो जाती थी कि साल होते ही बहू के पांव भारी हो जाएँ. घर में कृष्ण कन्हईया आ जाएँ. यही उपलब्धि लड़कियों की खुशहाली का मीजान माना जाता था. जिन लड़कियों की संतान नहीं होती थी या देर से होती थी तो ऐसी लड़कियों का भविष्य खतरे में पड़ जाता था. यदि लड़की को मायके भेज दिया जाता तो मायके में भी उसका जीवन नर्क सा हो जाता था. शिक्षित न होने के कारण वह कहीं नौकरी भी नहीं कर पाती थी. जिन लड़कियों को सिलाई-बुनाई, कढाई का हुनर आता था, वे किसी न किसी रूप में एडजस्ट हो जाती थीं. ऐसी स्थिति मध्य और निम्न-मध्य-वर्ग में अधिक होती थी. उच्च-वर्ग में दो तरह की मानसिकता थी, एक-शिक्षा का स्टेटस से सम्बन्ध, दो-शादी तक की पढाई. बाकी मानसिकता वही कि लड़कियों को कौन सी नौकरी करनी है.
फिर स्थितियां बदलीं. कुछ सामाजिक कुरीतियों ने भी स्थितियों को और जटिल बना कर सामने ला रखा. बदलते हुए सामाजिक मूल्य, टूटते हुए संयुक्त परिवार और एकल परिवारों का जन्म. यही नहीं बल्कि बढती हुई आर्थिक ज़रूरतों ने दहेज़ जैसी कुरीति को आर्थिक मजबूती का आधार बना दिया.
दहेज़ पहले भी चुनौती की ही तरह रहा था, किन्तु औद्योगिक क्रांति के बाद एकल परिवारों की बढ़त ने दहेज़ को नयी ज़रूररत के रूप में देखा और लड़कों की खरीद-फरोख्त के कारण उन लड़कियों के सामने मुश्किलें पैदा कर दीं जो दहेज़ नहीं दे सकती थीं. ऐसी स्थिति में देश भर में सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाएं महिला जागरूकता शिविरों के माध्यम से यह बात प्रचारित करने में कहीं तक कामियाब हुई कि लड़कियों को स्कूल भेजना ज़रूरी है.
थोड़ी सी पढाई और व्यावसायिक हुनर ने चमत्कारिक परिणाम दिए. लडकियां जो स्कूल गयीं और पढ़कर अच्छे ओहदों तक जा पहुँचीं तो समाज मे मानो शैक्षिक क्रांति सी आ गयी. यह मुट्ठी भर बाजरे जैसा था. फिर भी प्रगति का वह पहिया था जो अभी तक जाम पड़ा था, अब चल पड़ा था. अब समस्या ड्रॉप-आउट की थी.
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| नीना गर्ग, प्रबंध-संम्पादक:SVM |
लडकिया स्कूल जाने लगीं तो स्कूल में सीमायें खड़ी हो गयीं. आगे कैसे पढाई की जाए? गाँव-कस्बों में स्कूल आठवीं के बाद विराम लगा देते हैं. दूर जाने के लिये लड़कियों को अनेक खतरों का सामना करना पड़ता था, ऐसे में स्वयंसेवी संस्थाओं ने आगे बढ़कर रास्ते निकाले. शैक्षिक संस्थाओं ने अपनी क्षात्राओं के लिये होस्टलों का निर्माण कराया और जो प्रोफेशनल कोर्सेज़ करने वाली क्षत्राएँ थीं, उनके लिये गर्ल्स-होस्टल्स का भी प्रबंध किया गया. इसमें kendr aur राज्य-सरकारों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. शिक्षा के प्रति बढ़ते इस रुझान से अभिभावकों की रुचियाँ भी बढ़ने लगीं. वे अपनी बेटियों को उनके पैरों प़र खड़ा करने में मदद देने लगे. सरकार ने उनके विकास से सम्बंधित योजनाओं में आरक्षण का बंदोबस्त किया और आर्थिक सुविधाएँ भी देनी शुरू कीं. लड़कियों की बढती रूचि और शिक्षा में उनके रिज़ल्ट्स के ऊंचे चढ़ते ग्राफ से एक बात साफ़ हुई कि यदि उन्हें सहयोग दिया जाए तो वे हर क्षेत्र में आगे आ सकती हैं. यह वो दिशा थी कि आज लडकियां लगभग हर क्षेत्र में आगे बढ़ चुकी हैं. इसके बावजूद आज भी गाँव-कस्बों या दूर-दराज़ के इलाकों से अभिभावक अपनी बेटियों को शहर तक भेजने में संकोच से काम लेते हैं. इसका कारण है मार्ग-दर्शन का अभाव. उनकी चिंताएं गलत भी नहीं हैं. लड़की को वह अनजान शह्र में अकेला छोड़ भी नहीं सकते हैं. जबकि वे चाहते हैं कि उनकी बेटी भी दूसरों की तरह पढ़े. नगरों या महा-नगरों में (जहा शैक्षिक केंद्र हैं) वहां आज लडकियां पेयिन्गेस्ट के रूप में रह सकती हैं. पयिन्गेस्ट के रूप में लड़कियां जहां रहेगी, वहां उसे रहने और खाने का किराया देना होगा. चूंकि ऐसे गेस्ट हाउसेस की संचालिकाएं वृद्ध महिलाएं ही होती हैं, अतः बेझिझक लड़की को वहां दूसरी लड़कियों के साथ रखा जा सकता है. ऐसे हाउसेस में अनुशासन की कमी नहीं होती है जो दूसरे प्राईवेट गर्ल्स-होस्टल्स में भी पाया जाता है. सुरक्षा के एतबार से भी लडकियां यहाँ सुरक्षित रह सकती हैं. लेकिन ऐसे होटल्स या गेस्ट हाउस वहीं हों जहा से यातायात की सुविधा हो, कोचिंग सेंटर्स करीब और सुरक्षित हों तथा विवाद से परे वीराने में न हों.बेटियों को चाहिए कि वे अपने उद्देश्यों प़र खरी साबित हों. उन्हें याद रखना चाहिए कि माँ-बाप जिस मेहनत और लगन के साथ उसके लिये अपनी ज़रूरतों को काट कर उसके भविष्य को बनाने का स्वप्न देख रहे हैं, वह अगर पूरा नहीं हुआ तो उन्हें मानसिक अघात पहुंचेगा. उन्हें अपने लक्ष्य से नहीं हटना चाहिए. इसी में उनका अपना भविष्य छुपा हुआ है. यदि वह पढ़ कर योग्य हो जायेंगीं तो वह न केवल एक अच्छे जीवन की शुरुआतकर सकती हैं बल्कि अपने माता-पिता के स्वप्न को साकार भी कर सकती हैं. माता-पिता को इस बात प़र भी नज़र रखनी होगी कि उनकी बेटी शहरी चकाचौंध की भूलभुलय्या में तो नहीं फँस गयी है. उसके दोस्तों का सर्किल कैसा है? जहाँ वह रहती है, उसका अपने साथियों के साथ व्यवहार कैसा है, वह पढाई को लेकर कितनी सेरिअस है? उसकी कोचिंग सही चल रही हैं या नहीं? क्या वह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित है? अपनी सेहत को लेकर वह कितनी गंभीर है? उसकी सुबह-शाम कैसी गुज़रती हैं? यह ऐसी ज़रूरत भरी मालूमात की टिक्नामेंटरी है जो बेटी के फ्यूचर के मैथ का अध्यन कराती है. अभिभावकों को इस मैथ प़र गंभीरता से विचार करना चाहिए.
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