मंगलवार, 29 मार्च 2011

नाईंन इलेवन के हादसे के बाद-2/रंजन जैदी

यह है बद्दुआ कि जूनून-इ-जंग, तुम्हे चाहिए वो वसूल लो/हमें कुछ भी नहीं चाहिए, हमें इस अजाब से निकाल लो  
सोवियत यूनियन के बिखरने से अंतर्राष्ट्रीय सामरिक संतुलन का बिगड़ जाना स्वाभाविक था. अमेरिका अब नाटो के सहारे अपनी उन सामरिक योजनाओं को पूरा करने के उद्देश्य से अपने कदम बढ़ाने के लिए आजाद था. डिक्चेनी ने इसका फायदा उठाते हुए इराक, ईरान और उत्तरी कोरिया की ओर अपने प्रचार की तोपों के दहाने खोल दिए. प्रचारित किया जाने लगा कि ये तीनों मुल्क एटमी ताकत बनने के लिए यूरेनियम के ज़खीरे जमा कर रहे हैं. उत्तरी कोरिया एक गैर मुस्लिम देश है. अमेरिका ने इसे डिप्लोमेटिक पोलिसी को ध्यान में रखते हुए ही अपने एजेंडे में शामिल किया था. भविष्य में भी उसपर हमला करने का कोई इरादा भी नहीं था. एजेंडे में इराक पहले नंबर पर था. इराक के हुक्मरां सद्दाम हुसैन थे जिनसे बुश सीनियर की पुरानी दुश्मनी थी. सद्दाम एक सैनिक तानाशाह थे, इसमें कोई दो राय नहीं कि सद्दाम ने अपने शासनकाल में हजारों-लाखों बेगुनाह इराकियों के खून से होली खेली. इनमें ८६.०७ प्रतिशत शीया मुस्लिम थे. शीया बहुल ईरान से ८ वर्ष तक जंग की. बग़दाद स्थित पवित्र इमारतों की दीवारों को गोलियों से छलनी किया, जिनके निशान आज भी वहां देखे जा सकते है. वर्षों से ६० प्रतिशत से अधिक आबादी वाले देश पर सुन्नियों का जालिमाना शासन रहा. इन्कलाब-इ-ईरान के बाद इराक में इन्कलाब का आना स्वाभाविक था लेकिन इससे पहले कि वहां इन्कलाब आता, अमेरिका ने अपनी चाल चल दी. डिक्चेनी ने सऊदी अरब के शाह को अपने प्रभाव में लेकर राज़ी किया कि वह अमेरिकी वायुसेना के लिए अपने हवाई अड्डे उपलब्ध कराये और इस्लामी कट्टरपंथियों से न केवल सख्ती से निपटें बल्कि अमेरिकी सैनिकों से भी दूर रखें. डिक्चेनी की डिप्लोमेसी काम करने लगी थी. इसी के तहत मार्च,२००३ में अमेरिका अपने टैंक बगदाद में प्रवेश कराने में कामियाब हुआ. यही नहीं, टैंकों के साथ ही अमेरिका ने पहली बार अपनी किराये की सेना को भी बगदाद में दाखिल कर दिया जिसका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है. यह वह फ़ौज थी जिसने अफगानिस्तान में अपने जालिमाना जौहर दिखाकर डोनाल्ड रम्सफील्ड के हौसले बुलंद कर दिए थे. CIA के रिटायर्ड अधिकारी कोफर ब्लैक ने किराये की सेना के ख़ुफ़िया तंत्र का निदेशन अपने हाथ में ले लिया था. यहाँ विशेष महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका के पूर्व सीनियर-जूनियर राष्ट्रपति बुश अमेरिका के निजी सामरिक हितों को भूल कर डिक्चेनी की उन महत्वपूर्ण महत्वकांक्षाओं को नहीं समझ पाए या समझना नहीं चाहा जो इस्राईल को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में पनपते देखना चाहता है और अरब के मुस्लिम देशों को गुलाम बनाना चाहता है क्योंकि उनके पास तेल की अकूत दौलत है. अरब के मुसलमानों और यहूदियों के बीच शुरू से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. हालाँकि दोनों के पैगम्बर कुरआन का हिस्सा हैं. हजरत पैगम्बर सुलेमान अगर यहूदियों के पैगम्बर हैं तो वह मुसलमानों के भी हैं. लेकिन कुरआन यहूदियों पर यकीन न करने की हिदायत भी देता है. अमेरिका में ३६ प्रतिशत इकोनोमी पर यहूदियों की इजारेदरी है. वहां अनेक यहूदियों की संस्थाएं हैं. डिक्चेनी एक कट्टरपंथी यहूदी होने के कारण उनसे जुदा रहता है. बुश का पैत्रिक व्यवसाय तेल है. उसकी आयल रिफायनारीस इराक में भी रही हैं और उसमें यहूदियों की बड़ी हिस्सेदारी रही है. उन हिस्सेदारों में डिक्चेनी भी एक है. एक कमिटेड यहूदी होने के नाते उसने सत्ता में रहते हुए सदैव इस्राईल की सैनिक ढाल बने रहने का काम किया. वह नहीं चाहता था कि इस्राईल के आस-पास के इस्लामी मुल्क ताकतवर बनें. इराक और लीबिया फिलिस्तीनियों को आर्थिक और सामरिक मदद करते रहे हैं जिसमें सऊदी अरब भी एक है. फिलिस्तीनी मुजहिदिनी संगठन इस्राइली शासकों के लिए शुरू से सिर दर्द बने रहे हैं. यासिर अराफात की हत्या करने के बाद इसराइल अब फिलिस्तीनी संगठनों के सभी स्रोतों को समाप्त कर देना चाहता है. इसलिए बग़दाद पर कब्ज़ा करते ही मोसाद अमेरिका की ब्लैक फ़ोर्स के साथ मिलकर लगातार कार्यवाई करता रहा. यहाँ तक कि उसके सैनिक तक इराक में अपने मज़बूत ठिकाने बनाते रहे और हर उन ठिकानों पर हमले करते रहे जहाँ से इसराइल को खतरे महसूस हो रहे थे. इस योजना के पीछे का दिमाग डिक्चेनी का था. उनकी ताकत को तोड़ने और सदैव ऐसे मुस्लिम देशों को डिस्टर्ब रखने की योजना भी उसी की ही थी जिसमें स्पष्ट है कि अमेरिका के भी हित छुपे हुए हैं. सोवियत यूनियन के पतन के बाद अमेरिका भी अब अपनी भावी योजनाओं पर अमल करना चाहता था. बुश को जंग का जूनून पसंद था और डिक्चेनी को अपनी महत्वाकांक्षाए पूरी करनी थीं, इसलिए अमेरिकी जंगी सफ़र की शुरुआत अफगानिस्तान से हुई और इराक से होकर अब अमेरिका लीबिया  तक पहुँच गया है. ये वे देश थे जिनका अपना सामरिक महत्व था और इनके रहते इस्राइल कभी भी पनप नहीं सकता था. इसराइल को अब ईरान की ताकत ख़त्म करनी है क्योंकि ईरान एक ताकतवर मुल्क के रूप में उभरा है और उसपर आरोप है कि वह एक ऐटमिक पावर बनने की ओर अग्रसर है. अमेरिका की नज़र इरान के तेल के ज़खीरों पर है जबकि इस्राईल की नज़र उसके ऐटमिक ठिकानों पर.  इरान के पास निश्चय ही  तेल के ज़खीरे हैं और अमेरिका को अपनी इकोनोमी  मज़बूत रखने के लए तेल की बेपनाह दौलत की ज़रुरत है. वह अपने भविष्य को सुनिश्चित करना चाहता है. वह जनता है कि आने वाला समय उसके लिए नयी चुनौतियाँ से भरा होगा. वर्ड-मंडी में एक ओर चीन की उभरती हुई शक्ति है तो दूसरी ओर भारत की बढ़ती हुई इकोनोमिक ग्रोथ. भारत से अमेरिका को फ़िलहाल कोई बड़ा खतरा नहीं है क्योंकि वह उसके लिए महज़ एक  बड़ा बाज़ार और बेहतरीन दिमागों वाले सस्ते नौजवानों की मंडी है जिन्हें अमेरिका लाकर उनका दोहन किया जा सकता है. वह जनता है कि यहाँ का नौजवान अमेरिकी चकाचौंध से प्रभावित है और भ्रष्टाचार में लिप्त अवसरवादी राजनीति के रहते भारत उनकी प्रतिभा से लाभ उठाने योग्य नहीं है. इसलिए यह मंडी उसके कारोबारियों के लिए पूर्वत सक्रिय रहेगी. चीन उसके लिए बाज़ार से अधिक सामरिक चुनौती है. इसलिए उसने अफगानिस्तान  को अपना सामरिक ठिकाना बनाया जहाँ से वह चीन, रूस, भारत और उत्तरी कोरिया पर एक साथ निगाह रख सकता है. यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान और चीन के रिश्ते बेहद गहरे हैं, वह उससे विमुख नहीं होना चाहता क्योंकि सामरिक दृष्टि से गंदरबेल  के हवाई बेस और कराची का बंदरगाह उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.उधर इराक के तेल का दोहन जारी है, लीबिया पर नाटो की पकड़ मज़बूत होते ही ब्लैक वाटर के भाड़े के सैनिक वर्तमान में साथ दे रहे विद्रोही सैनिकों की कमर तोड़ने का काम शुरू कर देंगे और फिर वही दृश्य सामने आने लगेंगे जो इराक में दुनिया ने देखे थे. सऊदी अरब और कुवैत के तेल कुवें अभी आरक्षित ज़ोन में हैं, लेकिन देर-सबेर उनपर भी कब्ज़ा होना है. कारण यह है कि नाटो के देशों को युद्ध की यह शैली रास आ चुकी है. इसमें जानी नुक्सान कम होता है, लाभ अधिक. चूंकि एक ओर युद्ध का खर्च पराजित देश से हासिल की जाने वाली दौलत से वसूला जाता है तो तेल के जखीरों में (अनुबंध के तहत) उनकी हिस्सेदारी भी बाँट दी जाती है. यद्यपि यह व्यावसायिक युद्ध खतरों से रहित अब तक लाभ का ही रहा है इसलिए मित्र राष्ट्र ऐसे युद्धों से खुद को अधिक समय तक दूर  नहीं रखना चाहते, और देर-सबेर इसमें कूदपड़ते है. अमेरिका अब एक लम्बी योजना के सफ़र पर चल पड़ा है और वह अपनी सामरिक तैयारी के साथ एक-एक कर देशों को कब्ज़े में लेता जायेगा, इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार भी नज़र आता है. तो, मैं कह रहा था कि ब्लैक वाटर को डिक्चेनी ने जिस होशियारी से अमेरिकी सेना के सामानांतर ला खड़ा किया है, वही सेना कालांतर में क्या गुल खिलाएगी, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन उसकी ताकत से आप भी अनुमान लगा सकते हैं. (जारी...-/३)      ---------------------------------------------------------------------------------------विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक

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