अच्छा लगता है जब भीड़ जुटती है और साधारण आदमी सुपर स्टार बन जाता है. अच्छा लगता है जब आज के दौर में कोई ईमानदारी की बात करता है. लेकिन कुछ लोगो को जब क्लाइंट खुद आकर नजराने का पैसा देता है तो अच्छा लगता है. जब दुकानदार सस्ती चीज़ महंगे दाम पर बेच लेता है तब उसे अच्छा लगता है. जब पुलिस उगाही करती है, फुटपाथों पर अवैध तरीके से मंदिरों का निर्माण कराकर भू-माफिया से पैसे वसूलती है,जिसका घूँट-घूँट भ्रष्टाचार की लार से सना रहता है, कोर्ट, कचेहरी, अस्पताल, सरकारी महकमे, नगरपालिका, आयकर विभाग, गरज येकि कहाँ भ्रष्टाचार नहीं है. व्यापारी टैक्सेज की चोरी करता है, नेता नोटों के बिस्तर पर सोता है, बाबू ठेके पर दारू पीता है, कारण यह कि हमारा कोई अपना चरित्र नहीं रहा है. आज़ादी के बाद की भ्रष्ट बूढी सियासत ने हमें इतना कायर बना दिया है कि जब सारा देश अन्ना हजारे को समर्थन देने के लिए जंतर-मंतर की तरफ उमड़ रहा था, दूकानदारों ने धड़ल्ले से जंतर-मंतर पर स्टाल लगा लिए थे. तब पुलिसवालों को भी कुछ नहीं देना पड़ा था. मानो यह कोई त्यौहार हो. हर-तरफ चहल-पहल. मीडिया द्वारा पैदा कराया गया क्रिकेट जैसा जुनून बिलकुल ऐसा ही लगा जैस तपती हुई ज़मीन पर बारिश ने पानी भरकर बगूले भर दिए हों. पानी केरा बुलबुला.....मीडिया को मुद्दे चाहिए. कभी यह कि अन्ना केसरिया सोच के प्रभाव में हैं. महिला कथित साधुनी उमा भारती मिलने आयीं तो मीडिया को मुद्दा मिल गया. वह तो इस लिए आयीं थी कि उसे एक प्लेटफोर्म और मीडिया का प्रचार मिलेगा, पर....? अन्ना हजारे परिवारवाद का समर्थन करते हुए स्वामी रामदेव से विनती करते नज़र आये कि वह शांति भूषण प्रकरण का विरोध न करें. शांति भूषण परिवार रातों-रात दुनिया भर में इतनी पब्लिसिटी पा गया कि अब उसे कई पीढ़ियों तक प्रचार की ज़रूरत ही नहीं होगी. मैं नहीं जानती कि इसके पीछे अन्ना का क्या उद्देश्य रहा होगा. लेकिन यह अन्ना जी से एक बड़ी चूक हो गयी है जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी. शायद इतिहास इसे माफ़ भी न करे. कांग्रेस ने जो आननफानन में समझौता किया, उसके पीछे की राजनीति समझ में आती है. फ़िलहाल उसपर विशेषज्ञों को गहरी निगाह रखनी होगी. क्योंकि बाबू जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन की आग की तपिश के मुकाबले अन्ना के सत्याग्रह की आग में तपिश कम आन्दोलन के उत्सव की गर्मी अधिक रही है.. किरण बेदी को आगे नहीं आने दिया गया.आने दिया जाता तो शायद कुछ बात माने रखती लेकिन नीति-नियंताओं ने एक पूर्व आईपी.एस अधिकारी के आगे घुटने टेकना मुनासिब नहीं समझा क्योंकि वह ईमानदारी से आज भी सरकार के खजाने से पेंशन लेती है. भीड़ जुट गयी, मीडिया की टीआरपी बढ़ गयी, कुछ लोग आगे आ गए, कुछ ने काकस बनाना शुरू कर दिया. चुनाव भी नज़दीक है. कांग्रेस भी चुप है. लेकिन प्रशासनिक चुप्पी ने कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या अब समूह, संगठन, समुदाय, वर्ग भीड़ जुटा कर या आमरण अनशन कर सरकार से अपने हित मनवाते रहेंगे? क्या अन्ना के आन्दोलन से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायगा? विचार, व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होते हैं. इन्हीं से पहचान होती है. आइये! समग्र विचार मंच से जुड़कर इसका मर्म जानिए, अपने विचारों को साझा कीजिये. सदस्य बनिए और अपने विचार-प्रधान-लेखों का ई-लेखन के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने का प्रयास कीजिये. यह मंच आपका स्वागत करता है. -प्रबंध संपादक

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