निश्चय ही यह एक दुखद समाचार है. जो देश अपने साहित्य, संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर को सहेजकर नहीं रख सकता है, वह देश कितना ही प्रगति कर ले, ग़रीबी की तरफ बढ़ता जाता है. गरीबी अभिशाप है. चेखव से जब पूछा गया कि आपकी १०० कहानियों को प्रकाशक ने वापस कर दिया और यह १०१वी कहानी स्वीकृत कर ली तो आप क्या महसूस करते हैं? चेखव ने कहा, अब मैं आश्वस्त हूँ क्योंकि अब न हमारे देश का साहित्य कभी गरीब हो पायेगा और न देशवासी हमपर शर्मिंदा हो पाएंगे. दिनकर प़र देश को गर्व होना चाहिए और हमारे देश का साहित्य गर्व करता भी है किन्तु दुर्भाग्य से इस देश की हर धरोहर व्यवसाइयों के हाथों पहुँच गयी है. साहित्य और साहित्यकार का भविष्य और उसका मूल्य भी अब व्यवसाई ही तय कर रहा है. नए आर्थिक तंत्र और राजनीतिक समीकरण ने साहित्य को गैर ज़रूरी और लाभरहित मानकर उसे पत्र-पत्रिकाओं से भी बाहर कर दिया है. आईटी की दौड़ और रातो-रात अमीर बनजाने के सपने ने हमारी पीढ़ी को संस्कृतिविहीन बनाकर रख दिया है जो खबर पढ़ या सुनकर पूछ रहा है की 'हूज दिनकर?' यह देश के सामाजिक और सांस्कृतिक पतन की पराकाष्ठा है. मैं, डॉ. प्रणब बोस (कमलेश्वर जी के तत्कालीन सचिव और फिल्म निदेशक) कमलेश्वर जी के साथ नोएडा के एक बैंक में खड़े थे. कोई कमलेश्वर जी को नोटिस ही नहीं ले रहा था. बहुत देर हो गई थी. मैंने युवा मनेजर से कहा कि कमलेश्वर जी आये हैं, कुछ तो ख्याल करें. उसने पूछा,'वाट ही इज?' जब मैंने बताया कि वह जागरण के प्रमुख संपादक हैं और फिल्म आंधी की कहानी उन्होंने ही लिखी थी, तब वह उठकर आया और उनकी सहायता की. डेढ़ सौ फिल्मों, असंख्य कहानियों और हजारों लेखो का लेखक इस देश में कोई पहचान नहीं रखता है. दिनकर जी को तो गुज़रे हुए ज़माना बीत गया है. ग़ालिब की हवेली प़र लोगों ने कब्ज़ा कर लिया. दिल्ली की ऐतिहासिक इमारते लोगों की रिहायिशगाह बन गईं. आज भी करोलबाग मे तिबिया कालेज के निकट एक ऐसी इमारत है जिसपर ६० वर्षों से कब्ज़ा है लेकिन अदालत की आँखें बंद है. तो मालूम हुआ कि जो ताकतवर है, माफिया है, गुंडा-मवाली है, शरीफों को ज़लील कर सकता है, वह उससे फायदा उठा लेता है. इसके लिये यह ज़रूरी नहीं है कि वह मोदी का भतीजा है या भांजा. मोदी जब कमज़ोर पड़ेंगे तो दिनकर जी की दुकान भी ख़ाली हो जाएगी. मगर अफ़सोस यह है कि प्रशासन मौन बैठा है. क्या प्रशासन का भी ज़मीर इस हदतक मर चुका है?
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